यूँ धरती को खो दिया
कदम क्या उठे की
आसमान भी लुप्त हो गया...
जीवन रूपी इस पगडंडी पे कुछ समेटने की कोशिश में
रास्ते को ही खो दिया
कुछ कदम क्या बड़े हम आगे
पीछे सब कुछ सिमट गया....
क्या है ग़म और क्या है खुशी समझने की कोशिश में
सब नजर अंदाज किया
पल भर नेत्र किये बन्द
देखा ग़म ही गले लग गया...
याद ना करेंगे यूँ एक नाकाम कोशिश में
क्या देखा पलट वक़्त को
आंसूओं नें जज्बाती कर दिया
कुछ नाकाम कर दिया
वक़्त को फिर आँखों संग रख दिया....
रजनीश राय
©rajnishrai
07.09.2020
18:20 hours