एक पल हुआ चोरी न जाने कहाँ
जैसे बंद होंठो की छिपी मुस्कराहट हो
जैसे बंद होंठो की छिपी मुस्कराहट हो
जल खेलता नदियों की चंचलाहट में
भँवरे फूलों की खुशबू में हो के मगन
हवा की सरसरहाट में है कुछ तो है गुम
क्यों मेघों से बरसता पानी लगे दुश्मन
कांच पार ओस की बूंदो की फिसलन
क्यों पक्षियों की उड़ान आज रही थम
पगडंडियाँ की सीध कर रही भ्रमित
चाह कर भी क्यों न उठे कदम
क्यों मेघों से बरसता पानी लगे दुश्मन
बीते दिन की स्मृति हुई समक्ष नयन
नयनों ने जब देखा उस पार
समक्ष पाया अपना खोया प्यार
मृगनयन वह मुस्कराहट खुले हुए बाल
वह खुशबू और फूलों से प्यार
कुछ पूछती
पुकार कर हमें बार बार
हम मूर्छित से मन के
कानो पर भी लगा द्वार
कंपन सा हाथों में
थमा वक़्त हमें कुछ कहे बार बार
आप कैसे हो, कहाँ थे कब आये
तमाम प्रश्न यूं खड़े मन के द्वार
कुछ बोलने को होंठो ने की हिम्मत
तभी आवाज पीछे से आयी कुछ उस पार
प्रिये चले जिद में है ऋषभ
हम जागे यूं स्वपन से लगे एक बार
तकते उस चेहरे कभी नयनो को
छुप कर बार बार
रास्ता भी तकते जाते झुक झुक कर
हम बार बार
सोचते प्यार हमारा क्यों रहा उधार
जाते जाते पलट देखा मुस्करा कर
जब उस मृगनयनी ने
फिर झटक कर बालों को लिया सवांर
खुशियां गम सब संग ले किया विचार
मुस्कराहट भी दबी दबी हमसे कहे
हुआ बची आधी जिंदगी का विस्तार
जीवन जीने का आधार
अब न मुस्कराहट, प्यार का, बीते लम्हों
का रहा कोई उधार
न कोई उधार। ....
रजनीश राय
९ सितम्बर २०२१