Sunday, September 19, 2021

न कोई उधार - Meri Bebaq kalam - 6

एक पल हुआ चोरी न जाने कहाँ 
जैसे बंद होंठो की छिपी मुस्कराहट हो 
जल खेलता नदियों की चंचलाहट में 
भँवरे फूलों की खुशबू में हो के मगन 
हवा की सरसरहाट में है कुछ तो है गुम 
क्यों मेघों से बरसता पानी लगे दुश्मन 


कांच पार ओस की बूंदो की फिसलन 
क्यों पक्षियों की उड़ान आज रही थम  
पगडंडियाँ की सीध कर रही भ्रमित 
चाह कर भी क्यों न उठे कदम 
क्यों मेघों से बरसता पानी लगे दुश्मन 

बीते दिन की स्मृति हुई समक्ष नयन 
नयनों ने जब देखा उस पार 
समक्ष पाया अपना खोया प्यार 
मृगनयन वह मुस्कराहट खुले हुए बाल
वह खुशबू और फूलों से प्यार 

कुछ पूछती 
पुकार कर हमें बार बार 
हम मूर्छित से मन के 
कानो पर भी लगा द्वार 
कंपन सा हाथों में 
थमा वक़्त हमें कुछ कहे बार बार 

आप कैसे हो, कहाँ थे कब आये 
तमाम प्रश्न यूं खड़े मन के द्वार 
कुछ बोलने को होंठो ने की हिम्मत 
तभी आवाज पीछे से आयी कुछ उस पार  
प्रिये चले जिद में है ऋषभ 

हम जागे यूं स्वपन से लगे एक बार 
तकते उस चेहरे कभी नयनो को 
छुप कर बार बार 
रास्ता भी तकते जाते झुक झुक कर
हम बार बार  
सोचते प्यार हमारा क्यों रहा उधार 

जाते जाते पलट देखा मुस्करा कर 
जब उस मृगनयनी ने 
फिर झटक कर बालों को लिया सवांर 
खुशियां गम सब संग ले किया विचार 

मुस्कराहट भी दबी दबी हमसे कहे
हुआ बची आधी जिंदगी का विस्तार 
जीवन जीने का आधार  
अब न मुस्कराहट, प्यार का, बीते लम्हों 
का रहा कोई उधार
न कोई उधार। .... 

रजनीश राय 
९ सितम्बर २०२१


चेतन मन फिर क्यों अशांत। - Meri Bebaq kalam - 5

हर दिशा प्रतीत रुदान।
कुछ भूतकाल कभी वर्तमान।
भविष्य का प्रत्येक पृष्ट अनजान।
कुछ स्वपन लगे सत्य वर्तमान। 
चेतन मन फिर क्यों अशांत।

ज्ञानी मत सब एक है प्राण।
न पिता न माँ न भाई सब अनजान।
जीवन सार मनुष्य मन न सहमत।
मोह के दर्पण चले संग क्यों प्राण।
मुक्ति जीवन यूं  कमजोर डोर।
प्रत्येक कथन प्रतीत अनजान।
चेतन मन फिर क्यों अशांत।

मूक दर्शक हम बैठे क्यों।
क्या अभिनय करना जीवन सार।
सार अभिनय तो फिर क्यों न दुःख सुख समान।
कोई लम्बी आयु क्योंकर जीते होते परेशान।
कोई नन्ही आयु प्रसन्न फिर क्यों सिमित प्राण।
प्रत्येक प्रश्न एक प्रश्न बना।
हर क्षण चुभन मस्तिष्क अनजान
चेतन मन फिर क्यों अशांत।

कहे गीता सार दुःख मेरा या तेरा समान।
फिर क्यों मध्य न आते दुःख में भगवान्।
माँ को एक रूप में भगवन कहलाया।
न आता दिखे संतान दुःख 
न मन में कुछ परेशान।
कहते है लोग होता एक आभास 
दुःख में जब संतान।
हारे इन कथनो के हम बस रहे अनजान।  
विशाल तख्त न बिठायो बस रहने दो इंसान।
माँ जननी संतान दुःख असिमित, 
सिमित हर अल्पविराम।

रजनीश राय 
१९ सितम्बर २०२१

क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया - Meri Bebaq kalam - 4

मीठा सा बचपन यादों में।
न भूले सी मुस्कराहटों में।
एक सुंदरता की छवि में।
कोमल ह्रदय सा कवि में। 
शरारतों के भोलेपन में अव्वल।
कभी न हो दुखी एक ऐसा पागल।
न थकने वाला ज्यों एक सागर।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

आंख बंद तो आये चेहरा सामने।
खुली आंख सोचे पुत्र को आप में।
ह्रदय समझाना प्रति पल बना जटिल।
क्या कहें किससे कहे अति मुश्किल।
चुन चुन खुशियां ले गया।
ग़मो की कड़ियाँ सौंप गया।
आंसुओं से दामन प्रतिपल जोड़ गया।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

खुशियों से दामन भरना था हमें।
मिला प्यार तोहफा अटूट।  
हर खुशी जी रहे न था कोई दुःख रूप।
स्वपन न सोचा कभी हारे यूं खुद से।
मिला आँसू जीवन तोहफा स्वरूप।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

टुटा सब कुछ पल में हुई खुशियां यो तार तार।
लगती नज़र क्या दामन में सोचे हम बार बार।
माँ से बढ़कर कोनसी नज़र रोये माँ ज़ार ज़ार।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

रजनीश राय
१९ सितम्बर २०२१

अल्फाज कोरे कागज़ पर - Meri Bebaq kalam -3

लकीरे हाथ की न जाने कब लगी रास्ता बदलने 
या हम हुए किस राह में गुम 
फिर दिए अपनेपन ने भी इतने गम 
काश होते हम भी कुछ मतलबी से 
बेवफाई क्या दुश्मनी भी झेल जाते हरदम
काश कह पाते हर जज्बात हंस के 
पर जज्बातों के तले हुए दफ़न 

आईनो की दुकान पर खड़े 
तकते हर एक आइना 
अंदर छुपा के एक अम्बार 
फिर भी हँसता सा रूप दिखे क्यूं हर बार 

जिए जा रहे हैं हम यहाँ 
आइना सा प्रतिरूप ले 
थामे जिगर पे रुसवाई का पहाड़ 
मुस्कुराते चेहरे क्या दोस्त क्या बाजार 

रहे वो धरती पर तो गरुर है इतना
मजार में तो लगे हर शक्श एक सा 
यूं आयी खुद पे हंसी कुछ सोच कर 
जब हमने खुद तो बनाया इतना कमजोर
लो आज हुए हम उस दिल के हाथों मजबूर 

अल्फाजों को लिखते कोरे कागज़ पर
हम न जाने कितने बार
देखें जब भी उन्हें पास से जाते
कदम रखती हिम्मत यूं पीछे 
नैना कहे हम न दोषी
दिल चला दूसरी राह 
हर शिकवा खुद को समझाकर
हमको समझा कर।।।।

रजनीश राय
१९ सितंबर २०२१

दुआ कबूल हो जाने की - Meri Bebaq kalam -2

खुली किताब सी जिंदगी में
बेबाकी से ढोते रिश्तों की 
गम की ओढ़ के चादर
टूटी माला पिरोते यू खुशियों की 

खुशियों का अनंत गहरा सागर 
मोती सीप क्या शंख से प्रतीत 
इक  पल लगे सब है अपने साथ 
दूसरे पल कब बने जाते अतीत 

फिर एक मोड़ आये  चार कदम पे 
चले हंस के हम आँखे नम लेके 
पसीने की बूदों को ललाट से हटा के
यादों के उस बोझ को सिमटा के 

बालपन की यादों को रखा संजो कर 
उम्र कटे सिर्फ उसकी ही हो कर 
आये न याद वह लड़कपन उसका 
जिसमे रहा में बस सब खो कर 

कभी लगे स्वपन में एक और स्वपन 
नींद में कुछ यूं ढूंढती बंद आखें
कभी राह तो कभी रहगुजर से
रास्ता पूछती यह थकी आंखे 
आदत हो गयी कुछ शाम के 
बाद रात फिर सुबह तक जागने की 

लम्बी उम्र की दुआ न मांगे 
कुछ मांगे तो उम्र जल्द बीत जाने की 
इल्तज़ा करें तुमसे यारों 
करो दुआ हमारी दुआ कबूल हो जाने की 
कबूल हो जाने की। ..... 

रजनीश राय 
१७ सितम्बर २०२१ 

कुछ गमगीन हो कर - Meri Bebaq Kalam 1

अपनी सुगंध सा स्वपन में कोई उठाए झंझोड़कर 
बारिश की बुंदो सा स्पर्श आंखो को भिगो कर 
कोहरे में दिखे यूं रोशनी अंधेरे को चीर कर
कंबल ओढ़े सिर्फ जिस्म हाथ तपते अग्नि पर
चित्र कुछ अधुरा लगे आंसू या हंसी बिन लबों पर
आंसू सा ज़िद्दी न हो अलग खारेपन से जुड़कर
कुछ एहसास सा कराएं अपना न समक्ष होने पर

मरुस्थल की मृगतृष्णा सा करे बेचैन हर डग पर
अश्रु बह चले सर्द लहर मे भी गर्म बूंद बन कर
लहरों को तकते सोच रुके संग अपने से हो कर
हर दिशा देखें कुछ तो मिले अपना सा हो कर
क्या क्या सोच बैठे हम भी कुछ गमगीन हो कर
अपनी सुगंध सा स्वपन में कोई उठाए झंझोड़कर

सोचते हम बैठे प्यार की उम्र क्या करे नापकर
जीवन खुशी कभी गम कटे राह सिर्फ चलकर
माना पथ है पथरीला क्या करे सिर्फ सोचकर
याद वो एहसास, प्रयास कभी हंसी सब देखकर
बस कुछ एहसास कराएं अपना न समक्ष होने पर
क्या क्या सोच बैठे हम भी कुछ गमगीन हो कर
कुछ तो गमगीन होकर। .. 
या कुछ ग़मगीन होकर। ..

रजनीश राय 
९ सितम्बर २०२१