धुंधलाते से रिश्ते
समय की गति कुछ निराली है
कभी हो प्रतीत पगडंडी पथ भ्रमित वाली है।
क्या सोचे, क्या जाने या क्या कहे
या रात्रि सिर्फ अमावस्या वाली है।
प्यार के रिश्ते प्यार में, मोह या ममता मे
कभी हो प्रतीत सिर्फ मृगतृष्णा वाले है।
संतान प्रेम, क्या मात पिता तक सीमित हो
मोह ममता की इच्छा इक तरफा क्यों पाते हैं।
क्या दोष अच्छे संस्कारों, विचारों का
या समय करवट बदल छोड़ हमे आगे निकल जाते है।
रिश्तों की परिभाषा कुछ तो पथ भ्रमित है।
कुछ रिश्ते हुए धुंधले या नेत्र नीर धुंधला कर गया।
रिश्ते है धुंधलाते से लगा वक्त चुपके से कानो में कह रहा ।
कभी प्रतीत लौह सा हृदय कुछ सहम गया बस सहम गया ।।।
©rajnishrai
30.06.21
17:45 hours