Saturday, July 30, 2022

मुसीबते ऐ दौर - Mere Humrahi

दिन नया रात नयी  
वक्त चले अपनी गति 

आया एक ऐसा दिन 
लगे सब गया छिन्न 
दरार पड़ी कुछ मीठे रिश्तो में 
हम भी जा बटे कुछ हिस्सों में 

संग खड़े हमदम 
सूझ बुझ के संग 
हाथ से पकड़ हाथ 
संग किया मुसीबते ऐ दौर पार 

नया शहर नया घर 
नयी नौकरी ढूंढ 
जीविका को समृद बनाते 
मेहनत से न कदम डगमगाए 
खुशियों की रूप रेखा फिर सजाये 

फिर आया ख़ुशी का दिन 
बहुत मुद्दतों के बाद 
महकता सूरज सा नन्हा कदम 
घर आंगन किलकारी की गूंज 
प्रतीत एक सुकून 
समय भागे सरपट सरपट 
हर पल महकता फूलों सा 
कानो में आये जैसे मधुर कोई धुन 

बाल की शिक्षा का पहला अध्याय 
संग माँ का प्यार पाए 
पुत्री और पत्नी का धर्म संग निभाए 
हम हर पल उनको संग पाए 

कदम बड़े कुछ इस जीवन रूपी बंधन में
प्यार होता है क्या जाना कुछ ही लफ्ज़ों में

रजनीश राय 
१३/०५/२०२२ 
१८:०० 

प्रथम पृष्ट - Mere Humrahi

सहगामी या हमराह 
हमसफ़र कहो या साथी
आज हंसते मन में कुछ सोचते
याद आए वो दिन लड़कपन के 

निहारना वो एकटक 
करना घंटो आने का इंतज़ार 
देख बालों में अपने हाथ फिराना 
और उनका भी लटो को झटकना 
तोड़ कच्ची इमली उनको रिझाना 
गहरी झील के मटमैले पानी से कमल लाना 
तोता कुतरे अमरुद का लाना 
गहरे जंगल में कच्चे बेरों का लाना 
बिन बात मुस्कराहट चेहरे पे 
बस याद आये वो पहले दिन मोहब्बत के 

मिलना हुआ दस्तूर 
नियम सा लगता जरूर 
वह बातों के दिन
लम्हातों के दिन 
अस्त न हो सूर्य ऐसी आशाओं के दिन 
प्यार सी मीठी बातों के दिन 
याद आते बिन बात रूठने मनाने के दिन 

बीती शिक्षा संग परवान प्यार का 
करते नौकरी उच्च पद आसीन 
शिक्षिका बन वह बांटे ज्ञान   
लिए संग मातृ पिता के सहमिति 
सोच समझ लेकर सबका आशीर्वाद 
हुए हमराह बन एक दूसरे के प्यार के
ये है वह हसीं अध्याय बना प्रथम पृष्ट जो हमारे प्यार का

रजनीश राय 
१३.०४ .२०२२ 
१४:०७ 



सँकरी गली - Mere Humrahi

समय की करवट 
रिश्ता लगा और गहराने 
बन ख़ुशी हम साथ चले 
हर कर्तव्य को संग निभाते चले 
प्यार और फर्ज को संग मिलाते चले 

वक्त की सौगात 
चमन में एक और गुल खिला 
प्रतीत ईश्वरीय असीमित कृपा 
प्यार के जैसे पंख असीम 
पागल पवन सा उड़ चला 

कभी हुए उदास या 
कुछ काम का भारी एहसास 
प्यार भरी बात और बैठ कर पास 
किया हर लम्हे को खास 

देखते कनखियों से वो कभी हमें 
और हम देखते बस उन्हें 
मुस्कुराते अन्दर से 
न हो कभी ये प्यार कभी कम उनसे 

सुबह की धुप हो चाहे 
या घनघोर रात 
बारिश के दिन 
या वह सर्द जाड़ों की रात 
हुई जब रिश्तो की गहरायी की बात  
हर मौसम सुनाते बस हमारे दिल की बात 

वक्त न रहे कभी सामान 
हुआ हादसा कुछ दर्द भरा 
जैसे सँकरी गली आये सामने
उलझा जैसे रास्ता न कोई पाए
इस उलझन को हमराही ने सरल बनाया 
कुछ भी हो हालात न हटें पीछे 
मुश्किल राह को सरल पाया

काल की गर्त में क्या 
कभी जो हुए हम गुम 
उस सोच की भवर से हम बाहर आये 
लगता हम सिर्फ ठोस शरीर से 
पर ह्रदय से स्थिर हमराह
कांधे पर रख हाथ 
प्यार का वचन कहते 
थोड़ा संभले हम 
थोड़ा संभाले आप 

हुआ प्रतीत या आज जाना 
साथ है गर कोई प्यार अपना 
रास्ता चाहे हो लाख कठिन
मूंद आँख कट जाना 

रजनीश राय
१८ /०५ /२०२२
१८:१६ 

लगा समय बीतने अपनी दशा 
प्रारम्भिक से शिक्षा माध्यमिक 
फुर्सत हुई सिमित 
पुत्र कद मात पिता का 
क़दम युवा युग में 
हँसते हँसते न जाने 
थामा कौन रास्ता
सब तरफ रोष 
माँ,भाई सब बदहवास 
न कोई मशवरा न सोच    
लगे आज कौन परीक्षा 
हुए हम असफल 
सोच सोच हुए हम विफल 
अश्रुयों को नेत्रो संग दबा

बस सकून आया - mere humrahi

कैद वक्त की रफ्तार   
सेवा निवृत्त हुए हम भी
दिन बदले महीनों में
बदले साल पे साल
देख जी रहे आज हम ज्यादा 
था जैसे पहले वक्त के आभाव का तकाज़ा 

हुए कुछ स्वास्थ्य से हताश 
प्यार में न हुए कभी निराश 
आज हम साथ लगे हर खुशी साथ 
जैसे मिट्टी के संग बरसात 

उम्र के इस पड़ाव पर हम 
खुशकिस्मत है आज 
प्यार की जैसे उम्र नहीं होती 
जब भी हो संग  
सिर्फ अपनों सी प्रतीत होती 

माँ का क़िरदार 
करते करते न भूले हमें 
आदत को हमारी 
न किया नज़रअंदाज उन्होंने  

वक्त बिता कुछ करें इस उम्र में 
संग किया विचार
एक वृद आश्रम जेहन में आया 
लगे बस मोहब्बत बाटने 
जो हम ने संग कमाई थी 
आज जैसे परीक्षा की घड़ी आयी थी 
घड़ी के कांटे या पंचांग के पन्ने
लगे दौड़ने संग साथ हो अपने
हम हुए गुम खुशी के इस दौर में


आज सोचते होते ह्रदय हर्षित 
की हम ने ऐसा जीवन साथी पाया
जीवन के इस दौर में हमने
न खुद को किसी पे निर्भर पाया
रास्ता था चाहे कितना भी कंटीला
हमे तो बस सकून आया सकून आया

आज भी सुबह की चाय 
संग पीते है 
शेष कितने दिन उम्र के 
बस संग जीते है 

रजनीश राय
१८/०५/२०२२
१९:३५ 

समय संग हर सुख दुख के
समुंद्र को करते पार
खुशियां आई संग द्वार
पुत्र की नौकरी विदेश में
हुआ हर्षित मन सोच बार बार
चला विदेश आशिषो का ले भंडार 
मां हृदय तकता राह
कब हो पुत्र दीदार
जब साथ हो 

लगता गए सब कुछ गए हार
जमा पूंजी हुई तमाम
आज घर भी था खड़ा नीलाम

मन में आशा की ज्योत जला 
हर मोह को दिया मिटा
दोनो की नई सोच

वो हँसी पल - Mere Humrahi

चेहरे पे मासूमियत
जैसे हया को रखा हो कैद कर
नूर चेहरे का बना क्यामत, 
होती बैचन घुंगराली जुल्फें लटक कर
लाल हुई मेहंदी गोरे गोरे हाथों पर
बिंदिया दिखे घूंघट की आड़ 
जैसे देखे बदली में चांद झांक कर 
दिखती पैरो की पायल कभी
जैसे आलते संग घनिष्ठता बड़ाकर
लाल रंग साड़ी  
संग खनकती चूड़ियां 
क्या दे नाम इन सब को 
बोलती खामोश दिल की बैचैनियाँ

प्रथम दिन या रात आज शादी के बाद
कहे कोई सुहाग रात तो कोई शर्माए
क्या हुआ आज इस दिल को
क्यों है धड़कने बेचैन
मिला संगी हमे ऐसा 
जिसको तरसते थे नैन
हमारा पहला प्यार जिसको आज समाज से पाया
कह संगनी हमने और मान बढ़ाया
रात गुजारी कुछ खट्टी मिठी बातों में
हुई सुबह पता न चला मीठी यादों के आगोश में

हम हुए जैसे ऋणी ऐसे बंधन में उनको पाकर
पिछले जन्म के अच्छे कर्म हमको मिले यहाँ पर
हर पल बना हंसी हर पल महकाए
महकती सी हंसी जैसे खिलकलाता पुष्प
आवाज प्रतीत पहली बारिश के बूंदों की झलक
चलने पर आए पायल की घुंगरू की खनक
पास से गुजरे तो आए हवा संग फूलों की महक

ये जीवन लगे अब अति सुंदर
मोह के धागे में बन्दते हर पल
कभी वो गुस्सा और कभी प्रेम 
रूठना मानना लगे जैसे एक खेल

नजर न लगे कहीं खुद की
सोचते डरते बस हर पल
प्यार को बांध रहा प्यार 
इज्जत और इज़ाजत सब को समेट कर
हंसते हंसते कटें बस ये हँसी पल

रजनीश राय
१९/०५/२०२२
१२:०२

पुत्री मां पिता की दुलारी आए सब छोड़ के
कितना विशाल हृदय रख कदम नए दौर में 
विश्वास रूपी बंधन पे विश्वास की आजमाइश
निभाना होता है कैसे सोचते बन ख्वाइश 

कभी हो भ्रमित कही कुछ खेल तो नही
हंसते चेहरों के पीछे कोई भेद तो नहीं
सब आशंकांओं को धकेलते कोसों दूर
खुशबू की तरह सब को ले अपना बना लेते जरुर
हर पल हम देते सिर्फ वक्त को दुआएं

Thursday, July 21, 2022

आत्मविश्वास - Atmavishwas

जीवन के अनेक पहलू 
करता नियंत्रित विश्वास 
विश्वास गर खुद पे रखो 
बढ़ता आत्मविश्वास 

हर मोड़ जीवन का 
देता अनेको अनेक राहें 
हम चलते किस राह पर 
वह आत्मविश्वास सिखलाये 

आपका व्यव्हार और विचार 
संग जुड़ाव आत्मविश्वास का 
रहें हर मुश्किल में सहज 
हर उत्तर हो आश्वस्त से सराबोर 

जीवन लाये मुश्किल भरपूर 
प्रस्थितियाँ तो बदलता मौसम 
आज नहीं कल अवशय होंगी दूर 
बस आत्मविश्वास न हो कमजोर 

आलस्य, निराशा और भय को त्याग 
आज नहीं तो कल रुख बदलेगा 
चन्दन देता तभी खुशबु 
घिसाई हो जब बार बार 
आत्मविश्वास की उत्पति में 
आये जैसे श्वास शब्द हर बार 

रजनीश राय 
२३/१२/२०२१ 
१६:५९


सर्द परदे आंखो के # आत्मविश्वास

दोष नहीं पर्दा ही इन आंखों पे सर्द है 
रहते है महफूज साए हिंदुस्तान में 
दुखी दिखें हर पल खुश दूसरों के साए में
दोष देते हर पल जिन्हे
वो देश की उन्नति के सहाय है

कोई किसी का गुलाम नहीं होता
भारतवर्ष में कोई हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई नहीं होता
गुजराती बिहारी पंजाबी या तमिलियन नहीं होता
होता है तो सिर्फ भारतवासी होता है
आज है हम महफूज बनो शुक्रगुजार खुदा के
उसका कोई भी इंसान एक दूसरे से जुदा नहीं होता

मुद्दा नहीं काले धन का
या कोई घराने की ऊंचाई का
हम हुए कितने मुफ्तखोर 
आज इस की भरपाई का
न जाने कितने वादे मुफ्त के
पर मुफ्त नहीं संग मेहनत के ही लेंगे
बस अंदर के इस लोभ को मिटाना है

कौन नहीं चोर ये कहते है हम
गर एक उंगली उनकी तरफ तो चार उंगली पे है हम
पैसा न आया ना साथ जायेगा
रहो बस एक हो कर सब 
यही सबक मुदत्तों तक दोहराया जायेगा,,

अब बस करें जीना भूतकाल में
वर्तमान और भविष्य में है बस जीना
इसे कहो चाहे मेरा स्वार्थ या आपका नफा
लिख तो रहा हूं पर गवाह है 
गूंजती कान में अजान की सुरमई पक्तियां
वक्त से वक्त मिला लो यारो 
झूठ से न है दूर की नजदिक्यां

खुद पे रखो विश्वास 
भारत को समृद्ध बनाना है
एक एक इंसान के अंदर आत्मविश्वास जगाना है
अपने मुल्क के हर इंसान को अपने अंदर बसाना है
इन सर्द पर्दो को आंखो से हटाना है
हटाना है...

रजनीश राय
२७/०५/२०२२
१९:४५

जियो जिंदगी भरपूर - आत्मविश्वास

बढ़ता हर तरफ सिर्फ हाहाकार 
इंसानियत को कर शर्मसार 
मंदिर मस्जिद बनता जा रहा 
राजनीति का द्वार 

लुभावने वादे, प्रतिज्ञा क्या करार 
वचनो की बस लगी भरमार 
खोखली करते आशाओं को 
समाज के आपसी अनुराग 
या होते रिश्तो के बंद द्वार 

हुआ चलन धर्म के ठेकेदारों का 
धर्म से धर्म को उलझाने का
ज्ञान नहीं तानिक जिन्हे 
कहते खुद को गुरु
कार्य करते दीक्षा दिलाने का
मान अखंड अभिमान सा
भिक्षा में चलन सिर्फ नकदी का 

विश्वास नहीं पर धोखा पुरजोर 
हर इंसान लगे ठगा सा 
शिकायत की राह अति कमजोर 
उलझे सब जीवन रुपी चक्रव्यूह में 
लड़ते हर पल 
एक नयी उलझन का मोड़
प्रति पल द्वंद विचार में विचार
प्रतीत जैसे बंद सब मस्तिष्क द्वार 
 
वक्त आया जागो 
और जगाओ समाज को
न बहको न डरो
बस दूर हटाओ 
इन काल रात्रि के सौदागरों को
रात्रि के बाद की रोशनी सिर्फ सुबह की 
न बहक जाओ दिखते उजालों को 

होड़ न रखो सिर्फ पैसे की
जियो जिंदगी भरपूर
हंसी के सायों में 
इंसानियत हो सिर्फ प्रथम अभियान सी 

रजनीश राय
१८/०७/२०२२
११:३२

रिश्ता दुर्बलता का - आत्मविश्वास

लड़खड़ाते कदमों को आते देख पास
सहम गई हुई वो बदहवास
रात आज सुहाग की
वर्तमान और भविष्य क्या 
सब समक्ष आंखो के पास 

सपने थे जो संग क्या हुए चकनाचूर
अब रात दिन क्या बस रहेगा संग
शायद वो सुना सुना सा अत्याचार 
पल में लगे किस मोड़ पे आ खड़े 
संग चलना हो जाये मुश्किल 
तो छोड़ना भी होगा नामुमकिन 

कुछ सोच मन में जागा एक विश्वास
पिता के कहे शब्द 
उस मासूम मस्तिष्क में गूजँते बार बार
"साहसी को ही मिले सिर्फ कठिन राह"

कर के प्रण लिया संग पति का विश्वास
मात पिता की दे दुहाई 
प्रेम की भाषा को शूल बनाए
क्या कमजोर आप
या मजबूर ये मद्य मोह सताए
ऐसी कुछ प्रेरणा कुछ संगत देती
संग संग गुजारे हर क्षण
प्यार से कुछ वचन कहलाती 
कभी ईश को रख संग भक्तिमय कहलाए
जरूरत पर पुनर्वास केंद्र भी आए
हो कुछ भी अंजाम
पर मन में ये ठान 
सब को दिया चौका 
मद्यपान की आदत को भुला  
दुर्बलता से दृढ़ता का रिश्ता बना 
वह इंसान एक प्रगति की राह चला 

चाहे कहो स्वार्थ इसे 
चाहे कहो आत्मविश्वास 
चाहे कहो प्यार 
चाहे हो संगिनी का साथ 
हुए सब मुश्किलों से पार  
अंतत एक सुखमय परिवार 


रजनीश राय 
३१/०५/२०२२ 
१४:१७ 


वक्त को बांटो - क्यारी क्यारी - आत्मविश्वास

चुनौतियों से भरे इस जीवन में 
हम आये बन एक परिंदा 
कभी दबे कुछ बोझ तले 
कभी उठना तो कभी गिरना 
फिर स्वछंद सा इस आसमान में उड़ना 
हो जीवन ऊँचा जैसे अम्बर अपना 

हुई शादी की बात पक्की 
सोच हर पल मस्तिष्क
ब्याह एक दिन 
फिर संग बाल गोपाल भी 
हमारा जीवन  
सिर्फ गृह धर्म 
क्या चार दीवारी तक सिमित 

आज इस सोच को बदलना 
पहली जरुरत हर नारी की  
गर है आत्मविश्वास 
हम भी रचेंगे इतिहास 

हर क्षेत्र में आज स्पर्धा 
क्या पुरुष क्या नारी
सोच को करो विकसित
सिर्फ इतनी सी है जिम्मेदारी 
संग रखो सूझ बुझ का 
वक्त को बांटो 
क्यारी क्यारी 

दायित्व का अनुभव संग 
फिर क्यों डरे हम 
कार्य गृह से या हो दफ़्तर 
करो कोई व्यवसाय या 
कुछ ऑनलाइन या कंप्यूटर 
कर्तव्य को बाटना 
सिर्फ हो पहल हमारी 

इस कोरोना रुपी भय ने 
न जाने कितने 
नारियों के व्यवसाय खाये 
समय बदला अब 
क्यों न कुछ करें ऐसा 
लाख कोरोना भी न हमें हटा पाए 

सब को संग ले चलना 
एक उदारहण बन बताना है 
सब में अचूक नारी शक्ति 
देश को यह विश्वास दिलाना है 

पंक्तियाँ लिखता सँजोता हूँ   
आज नारी संग देश खड़ा 
देश को संजोये हर नारी 

रजनीश राय 
०१/०६/२०२२ 
१९:१७ 

सोचें किस डगर ले पार - Atamvishwas

चले सब मित्र कुछ अलग मन में ठान 
हम हुए संग सोच करे कुछ ऐसा काम 
हुई शिक्षा समाप्त अब जुड़ने का आया 
समय इस समाज संग उम्र तमाम 

खुशी का आलम एक आज़ाद पंछी सा 
ह्रदय की तह में उमंग आपार
हर एक मित्र सोचे किस डगर ले पार 
असमंजस माहौल स्थिर सब करें विचार 

मित्र ने लिया निश्चय चिकित्सक बन, स्वस्थ बनने को दे अपना योगदान 
कुछ मित्रों ने व्यवसाय किसी ने अभियंता को लिया थाम 
किसी ने नौकरी को समझा उचित, कोई संग सरकारी विभाग 
तो कोई सोचे राजनीति महान 

सब को देखा सब कुछ सोचा, आज खड़े हम वह रास्ते 
जिसको थामना उम्र तमाम, क्यों है सोच गहरी क्यों मन अशांत 

आया जहन में प्रेम देश का, हममें जो प्रति दिन है जीवंत प्राण 
राष्ट्रगान करते रोम रोम में, भक्ति से अपने भारत को प्रणाम 
सोचा न द्वितीय क्षण भर, लिया सैन्य बल को थाम 
हो सुरक्षित हर शख्स, बस मन ले एक यही अरमान 
अंदर सुरक्षित तो सोचे सभी, आज सिर्फ उनकी बदौलत हम 
हमको भी बनना है ढाल, क्यों न हम भी इस डगर को ले थाम 

नौजवानो रखो सोच आप भी, देश को चार क़दम आगे है लाना 
आना आपका फ़ौज में, मुमकिन सब को सुरक्षित है रख पाना 

हर मां बाप की दुआ में शामिल
वादे में बहनों के हमेशा काबिल
निकले जिधर से मिले सलाम
जिए जब तक रहे शान
गर हुए शहीद तो बने देश की शान।

रजनीश राय 
१३/१२/२०२१ 
१७:२७ 



खोखली हंसी - Atamvishwas

आज बैठे कुछ सोचते हम 
देख मित्र के पिता की खोखली हंसी 
दिन याद अभी भी न भूले 
विदेश को भेजने का प्यार और खुशी
 
शब्दों को रख मन में जस के तस 
अंतरात्मा मित्र को टटोलती कुछ बोलती  
क्या रखा इस देश में बेटा 
जाओ जा कर तुम भी दौलत कमाओ 

आया वह दिन था जिसका इंतज़ार 
चला मित्र विदेश उमड़ा जन अपार 
बधाई का लगा ताँता, मात पिता हर्ष फुले न समाये 

वक़्त बिता उम्र से भला कौन जीता 
किन्तु माँ का ह्रदय सिर्फ माँ ही जाने 
लगी तलाशने पुत्र वापिस आने के बहाने 
थामे विवाह की जिद, आया पुत्र खुशी अनंत 
हमको भी दिन याद आये पुराने याराने 

समय की करवट या दिल में  
कौन या क्या छुपाने की आहट 
शब्दों को तोल वादा जल्द आने का 
नव विवाहिता को लिया संग 
करके अभिनन्दन सबको चले विदेश द्वार   

वक़्त चला माँ ने खोयी आस 
आस की राह खामोश भी हुई साँस 
नवजात शिशु से विदेश में खिली किलकारियाँ 
पिता अकेला यहाँ, संग सिर्फ तन्हाईयाँ 

आया संदेश पुत्र का आ जाओ आप भी इस पार
बेच तमाम घर द्वार पिता खुश चला पाने को प्यार
अंचभित सा पाया खुद को वहां 
सब है वहां पर वक्त है कहां, न दोस्त न रिश्ते
सिर्फ फ़ोन पर दोस्तों संग वह खोखली हंसी 

ढूंढता खुशी के पल हर लम्हा कहीं संग सिर्फ है तो फिर वही तन्हाई 
सोचते क्या दौलत संग है तो खुशी या खुशी दौलत से बढ़कर कहीं 

आज देते सलाह नयी पीढ़ी को 
पैसा भी जीवन का चक्र, रहो संभल कर 
हावी न होने दो कभी खुद पर 
दौलत हो आपार, हो संग अपनों का प्यार
दुगना हो जीवन का आधार

माँ बाप है ख़फ़ा - आत्मविश्वास

आज के बच्चे या युवा
क्यों हर माँ बाप है ख़फ़ा 
वह संग विश्वास का क्यों है जुदा 

बहता नीर यूं नदियों का 
बनता संग रास्ता स्वयं उन लहरों का 
न रहती कभी नदी या कभी सागर विचलित 

इच्छा है  कुछ अलग पाने की 
कुछ अलग कर जाने की 
जैसे हर सोच नयी
फिर हममे क्यों विश्वास की कमी   

करते बात इक्सवीं सदी की 
सोच बीते समय की  
दोनों का मिश्रण
पाए सिर्फ मायूसी 

करो विश्वास हर युवा पर 
बच्चों की सोच पर 
खुला मैदान 
या खुला आसमां
दो मौका हर खूबी को 

दौर आज विश्वास का 
दो सबक सिर्फ आत्मविश्वास का 
फ़र्ज़, प्यार के संग 
बच्चे क्या हर युवा के संग जुड़ जाओ   

रजनीश राय 
०३/०६/२०२२ 
१४:३१ 
  

देश का वर्तमान - Atmavishwas

उठाते ही समाचार पत्र आज का 
झोंका निकला एक मूर्छा का 
महिला खेल योद्धा, थामा आँचल मौत का 
प्रसिद्धि की न कोई कमी, शौर्य था कूटकूट कर भरा 
क्या था कारण न जाने, क्या कमजोर या बहादुर संज्ञा कोई 

खेल जगत में या मनोंरजन पट में  
शिक्षा क्षेत्र या और कुछ प्यार में 
न जाने कितने युवाओं ने 
लगाया असमय गले मौत को 
अधूरा जीवन क्या अधूरे सपने 
सब कुछ अधूरा, खुद हारे हिम्मत 
न बन पाए किसी के सहारे कोई 

क्या सोच जो बनाती कायर 
निडर जवां बनते इतने कमजोर 
अवसाद, खिन्नता, या डिप्रेसन 
एक गहरा अंधकार 
राह न दिखती कोई और 
कुछ न सोच थामे बस मृत्यु की डोर  

आज बहुत व्यथित मन, सोच देश का वर्तमान
युवा है आज भारत की शक्ति, खुद क्यों है आज युवा परेशान 

देश को आगे लाने की कितनी योजनाएं 
आये हम प्रथम हर होड़ में 
लो युवाओं की भी सुध, ये देश से बड़ी प्राथमिकताएं
इस विषय पे शोध कर युवाओं को चेताये 

नौजवानों से करे प्रार्थना, न थामे इस राह को 
मन में रखो खुद्दारी, और देश से प्यार  
उपकार मात पिता का, भविष्य को ढालना शिक्षक का  
हर अंधकार के बाद रौशनी का 

मृत्यु तो अटल 
अंतिम पड़ाव जीवन का 
आरंभ को न लगाओ विराम 
छूटे आरंभ को करो प्रारंभ 
मन से त्याग हर मोह अंधकार का 

रजनीश राय 
२०/१२/२०२१ 
१९:०७  

आजाद पंछी सा - Atamvishwas

हुआ समापन विद्यालय अंश का 
प्रसन्न ह्रदय उल्लास में, खुशियां ऐसी की छुपे न छुपे 
मुक्ति विद्यालय पोशाक से, होगा संग नए दोस्तों का 

यूं होगा एक अलग समां, आजाद पंछी सा प्रतीत 
सोच कर ही मन हो प्रफुल्लित, बजे वाद्य दिल में अनगणित 
पहला दिन कदम कॉलेज में, तकते गलियारे असमंजस  
आयी आवाज एक पीछे से जोरदार, पाँव रुके असंख्य विचार 

पलट देखा पाया वरिष्ठ छात्रों को 
इशारा करते हाथ से पास बुलाया 
हम डरे सहमे आवाज में कम्पन 
क्या है माजरा कुछ समझ न आया 

क्या नाम क्या जाति, क्या शौंक कितना है ज्ञान
हम भौच्चके से बस सोचते सुन यूं प्रश्नों की कतार तमाम 

नहीं है पता तो इधर आइये, सामने आती छात्रओं से 
माफ़ी मांग कर बताइये, नहीं मिली गर माफ़ी तो 
सजा के पात्र बन जाइये 

हम ने सोचा चलो क्या कसूर 
जो हम डरे, क्यों न माफ़ी मांग 
इस दुविद्या को करें दूर  
मुस्कुराते आती छात्राओं को 
किया अभिवादन संग माफ़ी मांग  
जवाब में गुस्से में दुत्कारा हमे
हम देखते शर्मसार, कभी उनको तो कभी दोस्तों को  
५ दफा पांचवी मंजिल की सजा की याद करती पसीने में तरबतर 

हम चले कक्षा में, मुख पे अनजाने भाव 
हँसता हर एक चेहरा, हालत देखकर 
आये घर कमरे में खुद को एक कोने में समेट कर 
लगा बहुत समय खुद को वापस पाने की जंग 
कहीं ऐसे छात्र भी जो हुए आत्महत्या के संग 

सोचते हम क्या है यह सजा, क्या अपराध किये हम 
शिक्षा के लिए विद्यालय से, क्यों रुख महाविद्यालय का किये हम 

विनती आज के वरिष्ठ छात्रों से, ये खेल रैगिंग का करो बंद 
शिक्षा का केंद्र है विद्यालय, रहने दो इसे सिर्फ शिक्षा का केंद्र 


रजनीश राय 
१५/१२/२०२१ 
१९:१७