Friday, June 15, 2018

सुबह शाम की चिंता.. - post-13

चला सूर्य अपनी राह
दे अंधकार को नयोता
यूं पंछी तकते अंधकार को
सोचे कुछ समय और होता
न दाना पर्याप्त बाल भूख में सोता
बस रात्रि पहर की चिंता
दिन उगता और बस यूं ढलता
तार कंटीली सा पहर लगे 
बस रहे शाम की चिंता
कुछ सुबह शाम की चिंता.....


अशांति की चादर ... उम्र तमाम

ह्रदय वेदन। ...

कराहता दिन निकला बीती दर्द में साँझ।
सूर्य चला अस्त को अंधकार सौंप सब काम। 
आँख हुई नम देख हुआ हृदय परेशान।
रात्रि आँख रोये सुबह तक न करे आराम।

सोचते क्योँ समय लाया एक चौराहे गुमनाम।
पल पल हृदय पूछे क्या हुआ कुछ अपराध अनजान।
खुशियाँ सिर्फ मांगी न माँगा जग तमाम।
हर क्षण उदासी मिली या ह्रदय परेशान।

नयन तकते है जिन्हे चले किस धाम।
प्रत्येक पंछी घर लौटे संध्या कर कार्य तमाम। 
जब आये घर अपने लगे सब अशांत।
पर अपने न आये तकते नयन सुबह शाम।
सब चेहरे कुछ ढूंढे कहते यह नयन अंजान

स्वपन नहीं दुस्वपन सच्चाई अब तो कहा मान।
वर्तमान को न माने सत्य यह ह्रदय अनजान 
प्रत्येक प्रसनता अस्त हुई यूं जीवन निष्प्राण।
अशांति की चादर ओढे निकले उम्र तमाम 
उम्र तमाम सब अशांत, अशांत। .... 

रजनीश राय 
१५ जून २०१८ 

Friday, June 1, 2018

बस पुत्रशोक मिला उधार........

ह्रदय वेदन  (माँ /पिता )
बस पुत्रशोक मिला उधार।

हर चहरे में एक चेहरे को तलाशती आँखे।
आँखों में है नीर भरा दिखती सिर्फ नम आँखे।
दुःख दर्द सहज अत्यंत कुछ न कहती आँखे।
अपना दुःख सिर्फ सिमित रख बस यूं सहमी आंखे।
दस्तक गर हुई द्वार तो पल पल कुछ तकती आँखे।
शायद आया पुत्र माँ यह आस लगाती आँखे।

नयन तकते राह एक तेज से प्रवाह को।
गति के गतिमान प्यारी सी मुस्कान को।
चेहरे में एक नूर माँ के दुलार को।
नयन से छुप कर हॅसने वाले लाल को।
चलते गिरते बालपन के उस मस्तचाल को।
सब कुछ माँ से कहने वाला ऐसे गोपाल को।
 
मित्र पग पग चले अब क्यों नहीं आते मिलाने को।  
जवान कद या एक निखरे रंग के नज़रने को।
आसमान निगला या राह के बने निवाल को।
हम ने खोया जग ने छिना या ईश की चाह को।
सब कुछ हुआ यूं शांत हम मिले अशांत को।  
क्या प्रश्न क्या उत्तर  मिले एक अंधकार को। 

रास्ते तकते उस मस्त को गालियां हुई उदास।  
हवाएं भी हुई शांत लगे प्रकृति करे अट्हास। 
दिन भी रोये मुझ संग अब रात करे पुकार।
संग है सब मेरे बस पुत्रशोक मिला उधार। 

रजनीश राय 
१ जून २०१८