Friday, October 21, 2022

नफरत का ज़हर - The Resplendence of Friendship

दोस्ती अपनी कभी टूटे न
हम है एक देश 
रिश्ते न जाने अनेक
ये अपनापन कभी छूटे न 
साथ अपनों का कभी छूटे न

मज़हब को न लाओ दरमियां
दूरियों को बड़ाओ न
नफरत का ज़हर मिलाने से
होगा न कुछ हासिल 
मिल बैठ सब मुद्दे सुलझाओ 
गर संग है हम हर खुशी है संग
फिज़ा को जहनुम्म बनाओ न

वो त्यारोहों का समा रंगीन
कभी होली, दिवाली तो कभी ईद
मिठाई बांटने की वो रीत
संग सवेयां की वो प्रीत
क्या रंगो की फुहार
बारात रोशनियों की 
मिलना गले वो जोश के साथ
संग मंदिर की घंटियों की खनक
अजान की वो सुरीली आवाज़

ये भारत है अपना
अपनेपन में दूरी लाओ न
दूर है गर कोई 
कदम बड़ा उसे संग लाओ
दिल से रहो क़रीब
अपनाओ सब को
तमाम दूरियां मध्य से हटाओ  
वो पहले सा प्यारा 
अपना हिंदोस्तान वापिस लाओ न

रजनीश राय
०२/०८/२०२२
१८:१६

बचपन के पल - The Resplendence of Friendship

बचपन के पल संग वो दोस्ताना 
खुशियों का संसार जैसे ग़म से कोसों दूर 
हर खुशी लगे अपने लिए आयी हो 
चाँद दूर रह के भी पास लगे 
जैसे चाँदनी सिर्फ मेरे लिए आयी हो 

वो संग जुगनू को रात में 
पकड़ने की होड़ यूं हाथ में 
रखना संग काँच में 
रौशनी झिलमिल सी 
देखते रात भर एकटक 
नींद सपनो में भी न आयी हो 

काँच की बोतल यूं झिलमिलाते जुगनूँ  
दोस्ती निभाती एक रात संग मेरे 
तो दूसरी रात संग मित्र को 
जुगनुओं के रूप में भी 
जैसे खुशियाँ समायी हो 

वह डब्बा और लंच का समय 
तकते यूं बेताब से एक दूसरे के डब्बे 
यूं बाँट लेना झटपट  
गर कुछ स्वादिष्ठ या 
माँ ने सहज रख दिया संग कोई मिठाई को 
सिर्फ तुम ही खाना यह कह कर 

अध्यपिका क्रोध में 
किया कोई गृहकार्य दोष में 
संग मित्र का भी छुपाना अपनी पुस्तक को 
कक्षा बाहर होते संग
फिर वो मुँह छुपा हँसना साथ में 

त्योहारों के दिन 
हँसती यादों के दिन 
पतंग कटने 
और पतंग पकड़ने के दिन 
पटाखों के संग 
चिल्लाने के दिन 
छुप छुपा कर संग 
मिठाई चुराने 
और फिर संग खाने के दिन 

चोरी से तोड़ना 
कच्चे आम या अमरूद का पेड़ों से 
वह सीटी की सूचना 
माली को देख कर 
एक दोस्ती ऐसी 
निभाते हर शरारत पर 

बारिश में भीगना संग 
कपड़े को कर गन्दा 
बहाने वह अनसुने से 
झूठ की पैरवी 
करते बेख़ौफ़ से 

तालाब के निकट 
प्रतिस्पर्धा न भूलने वाली 
कंकर को फेक 
टकराना पानी की सतह पर 
कूदना हर्ष से उस जीत पर 
ऐसी खुशी की न बयाँ करने वाली 

रूट जाना किसी बात पर 
कोई पुरानी बात कह कान में 
फिर हॅसना खिलखिला कर 
मासूमियत भरे वह पल 
ना आते क्यों लौट कर 

आज न जाने क्यों 
वह दिन आये याद 
बस बैठे बैठे सोच बहुत हुए उदास 
यो याराना बचपन का 
बहुत कुछ दे गया 
समय था सिमित 
असीमित खुशियाँ दे गया। .. 

रजनीश राय 
२८/०७/२०२२ 
१९:३९ 






भावनात्मक रिश्ता - The Resplendence of Friendship

आज कलम कहे 
चलें शब्दकोष से बाहर 
मित्रत्रा को रख आधार 
एक ऐसा घनिष्ठ रिश्ता 
ज्ञानी विद्वान् न पा सके पार 

आज के उलझते रिश्तों मे 
सच का एक प्रतिरूप 
प्रतीत एक सच्ची सुलझन 
एक ऐसी मजबूत डोर 
समहित हो जैसे अपनी धड़कन 

जख्म हो चाहे कितना भी गहरा 
हर दर्द मिटाते बन कर दवा 
दौरे ए मुसीबत संग ठहरते 
जैसे बिन इब्बादत मिले दुआ 

क्या नगद तो क्या उधार 
हुए न कभी बंद द्वार 
हर किस्से जीवन संवारते आये 
हर मुसबित में सिर्फ दोस्त याद आये 
अनजाने हो कर भी 
जीवन का हिस्सा बन जाएँ 

आज भी याद है वो एक एक लम्हा 
बीते न जाने कितने वर्ष 
प्रत्येक वर्षों  के अनगिनित दिन 
दिनों के यूं पल हजार
न थी कभी इच्छा 
क्या जीत और क्या हार 
भावनात्मक रिश्ता जैसे एक प्यार 

रजनीश राय 
२८/०७/२०२२ 
१७:३६ 



संग न कोई आज - The Resplendence of Friendship

खूबियों से न की रखी नींव दोस्ती की 
अनजान से मिले बस ख़ास हो गए  
हो चाहे अपूर्णता का भंडार 
बस जिगरी यार हो गए 

आज याद की सीमा बेइंतहा हो गयी 
कुछ उदासी भी संग हो गयी 
याद आयी वह टोली हॉस्टल की
कुछ नोट्स वालों की 
संग चाय की चुस्की
कुछ कश धुंए के 
संग बनाते वह छल्ले 
वह बन लीडर 
अपने मुहल्ले के  
कहीं लड़कियों की सुरक्षा 
कहीं छोटो के बनते भाई 
कहीं देते गालियाँ 
कहीं बेशर्मी से खाये 
कहीं वह जोश भरी लड़ाई 
कहीं मिले दिल भी 
कहीं मिली तन्हाई 
कहीं माँ बाप संग शिकायतों के दौर 
कहीं टांग खिचाई 
कहीं रंग होली के 
कहीं कृष्णा की मटकी 
कहीं शादी में बिन न्यौता बाराती 
वह हंसी, मज़ाक,  
संग दोस्ती की गहराई  

कभी ग़लतफ़हमी का दौर 
वह रूठना मनाना पुरजोर 
आज यादें के संग आँखे हुई नम 
जो आये याद वादे फिर मिलने के 
पर कोई न निभा पाए 
अपनी राह सब गए आगे 
संग न कोई आज 
फ़िर भी लगे सब साथ आये हैं   

पास रह कर हुए दूर 
दूर हुए पर न भूला जाये 
लिखी है न जाने कितनी कवितायेँ 
चाह कर यारों तुम्हे न सुना पाए  ... 

रजनीश राय 
१२/०८/२०२२ 
१५:५८ 

ग़लत नहीं है - The Resplendence of Friendship

आज बैठे थे कुछ और लिखने 
की सहसा एक एहसास आया 
बात चली मित्रता की आज 
नारी और पुरुष पे सवाल आया 
मित्रता के है इतने दायरे 
समाज इस को कभी न समझ पाया 

नारी पुरुष की मित्रता को 
अधूरी कल्पना सा 
अतृप्त इच्छा के रूप सा 
वासनाएँ छुपाने के नक़ाब सा 
संबध को ढकने के प्रयास सा 
सिमित सोच में बंधा पाया 

मित्रता के रूप हज़ार  
पुरुष और नारी संग दोस्ती 
आज समाज का महत्वपूर्ण अंग 
हर कदम जब नारी संग 
क्यों मित्रता पर हो तंज 
हर क़दम लो सबका साथ
समाज,और देश सब का हो विकास 
अब आना इस मानसिकता से बाहर 
कर इस सामाजिक त्रुटि का बहिष्कार 

इस सामाजिक कुरूप सोच को 
सिर्फ मित्रता समझने का वक्त आया 
इस रूढ़िवादी विचार को 
अलविदा कहने का समय आया 
स्वस्थ मैत्री और सिर्फ स्वस्थ सोच 
समझने का अवसर आया 

आज कहने का साहस किया मैंने 
शायद कल्पना तो करते होंगे सभी 
ग़लत नहीं है  
बोलने का उचित वक़्त आया 

रजनीश राय 
१६/०८/२०२२ 
२०:०४ 



क्या शिक़ायत क्या गिला - The Resplendence of Friendship

दुनिया के मोह में कुछ इस क़दर खोये 
इतराते थे जिस दोस्ती पर वक्त बेवक़्त 
कल की ही बात है शायद 
आज क्यों सिर्फ याद बन रह गए 

वक्त का पहिया चलता रफ़्तार 
हम सोच रह गए इस न जाने किस पार 
कल तक थी हजारों कस्मे 
आज कौनसे पल में हुए गिरफ्तार

वो हंसी वह ठहाकों की भरमार 
हर सुख दुःख में बेधड़क 
संग जीने मरने की ललक 
किधर हुई वह खुद से ज्यादा हमारी फ़िक्र 

यक़ीन नहीं क्या हालात यूं बदल जाते है  
दोस्त क्या सिर्फ याद बन रह जाते है 
क्या शिक़ायत क्या गिला ज़िंदगी से
भूले ही सही किंतु ये भर्म पाले बैठे है
याद आये गर कभी यारों की
मिल बैठ वही पुरानी यादें संग दोहराना 
कभी खुद को तो कभी दोस्तों को संग पाते है

रजनीश राय
३०/०७/२०२२
२०:०८

कुछ याद आया होता - The Resplendence of Friendship

क्यों जिंदगी हर हसीन पल को नहीं दोहराती
याद आज भी है कहकशों के पल
पर न जाने क्यूं आज आंखें नम 
जेहन में उदासी न होती कम
वो दोस्ती के लम्हात की जब जब याद आती 

वक्त के भंवर में खो गए से लगते है सब
हर बात लगे अब हुई पराई 
मोड़ भी हुए हरजाई
रास्ते हुए लंबे
हर लम्हे यादों के बन परिंदे
न जाने किस दिशा 
या बन घनघोर काले बादलों में हुए लुप्त

किसी न किसी को तो कुछ याद आया होता
वो खुशियों के मेले संग पुराना एतबार
दीवानगी को ले संग, बंदिशों से पार
कुछ तो यादों में उनके कभी आया होता

हर वक़्त सिर्फ एक प्रश्न न अब भुलाया जाता 
क्या पास रह कर भी कोई रहता यादों में
या कुछ दूर रह कर भी न भुलाए जाता..

रजनीश राय 
०२/०८/२०२२
१९:११

क़िरदार ढूंढता हूँ - The Resplendence of Friendship

आज भी याद है 
सफ़र एक दिन कुछ ख़ास  था 
संग एक ऐसा दोस्ताना 
जो न भूले बस बहुत ख़ास था  
 
मध्यवर्ती शिक्षा में हुए उत्तीर्ण
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की प्रवेश परीक्षा 
आयी चिट्टी सरकारी 
परीक्षा केंद्र गुवाहाटी लिखित देख  
झटपट तमाम कार्य की सम्पूर्ण तैयारी 

आया दिन सफ़र का 
बैठे ट्रैन मैं संग परीक्षा हेतु 
छात्र तमाम न कोई मित्र उनमे 
करते सफर सब अकेले संग तैयारी 

पहुंचे परीक्षा केंद्र 
न जाने कितने छात्रों के संग 
हम भी लगे सोचने अपना भविष्य 
बनते एक सैन्य अधिकारी    

चलते चलते परीक्षा केंद्र को 
कुछ ही दुरी पर 
पाँव जा अटका घाँस में छुपी 
एक पक्की पानी की नाली पर 
दर्द का वह रूप 
आज भी नहीं भूलता 
कौन था संग किसने थामा जब 
कुछ होश न था 

संध्या को जब मूर्छा आयी वापिस 
खुद को पाया ट्रैन में वापिस 
संग एक दोस्त या रूप सुदामा 
न पहचाना न जाना  
सफर तमाम सहलाता रहा पैर को मलहम  
पानी की प्यास या कोई दवा 
खाना या पेय दिया बिना कोई ध्येय 
बिना कोई परिचय देता रहा सिर्फ सेवा

आया गंतव्य दे विदा चला वह गया किधर 
आज भी वह अनसुलझा 
सा क़िरदार ढूंढता हूँ 
न पूछा नाम न  शहर न पता 
कोसता हूँ बस खुद को क्यों न सब जान सका 
जब भी ये दिन याद करता हूँ 
काश वह पढ़ ले और एक बार तो सिर्फ मिल ले 
उस दोस्ताने तो सिर्फ सलाम करना चाहता हूँ 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१९:३४ 
 
 


प्रेम और अपनापन - The Resplendence of Friendship

आज न जाने क्यों मन उदास 
सोच क्यों करते है दोस्त ऐसे 
हम जिन्हे हमेशा सोचते साथ 
फिर न जाने क्या सोच 
क़दमों को कर साथ 
चले पार्क में अकेले 
बैठे वह पुराने बेंच के साथ 

देख तभी एक बुजुर्ग को 
लगा जैसे सुबह की सैर को 
कुछ वक़्त समय पारित को 
बैठ कुछ सुस्ताते 
उस पुराने बेंच के साथ 

तभी देख आये कुछ पक्षी 
यूं जोर जोर चहचहाना 
आये कुछ बंदर 
वृक्षों को हिलाते  
न जाने कुछ कुत्तों भी संग 
आये दुम हिलाते 

दाना डाला पक्षियों को 
कुछ चने बंदर खाते 
कुत्तों को रोटी के टुकड़े खिलाते 
हँसते रहे फिर एक टक निहारते  

मन की उदासी हुई काफ़ूर 
नए रंग दोस्ती के देख कर 
न उदासी इसमें 
न कोई गिला शिकवा 
न कोई कस्मे वादे 
न झूट का कोई आडंबर 
न रईसी की महानता 
है तो सिर्फ एक भोलापन 
और संग पवित्रता 
स्तब्ध दोस्ती के इस 
मेल को जान कर 

परिभाषा प्रेम की समझे 
या समझे एक दूसरे के विचार को 
न रखो कोई मतलब
रखो मघ्य सिर्फ मेल मिलाप को 

पक्षी या जानवर क्या इंसान संग 
क़िस्सा ये भूख का न समझो 
लाख कोशिश की हमने भी 
पक्षियों को खिलाने की 
न हुए क़ामयाब  
वह प्रेम और अपनापन 
की अनुभूति 
उन्हें न मिली हो शायद। .. 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१५:४७ 





चंद वाक्यां दोस्ती के - The Resplendence of Friendship

चंद वाक्यां दोस्ती के 

दोस्ती के पल जी लो हर घड़ी
क्या पता किस रोज़ जाना है बिछड़
चंद लम्हात कब सिमट जाएं 
कौन जाने किस मंजिल को पाना है

आसमां के तारे ले आओ जमीन पर
गर मिले एक मुस्कुराहट बदले में
खुशियों की बदौलत ही
हर दोस्ती की कीमत चुकाना है 

हर सुख दुख की पहचान सिर्फ दोस्ती
हर चेहरे की मुस्कान सिर्फ दोस्ती
न लेना दिल पर रूठे हो गर अपने
दोस्ती संग अक्सर नादानी निभानी पढ़ती है

जिंदगानी में अक्सर दोस्ती नाक़ाम होती है 
होते है दोस्त सच्चे 
पर न जाने क्यों दोस्ती 
अक्सर बदनाम होती होती है। .. 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१४:५१