हम है एक देश
रिश्ते न जाने अनेक
ये अपनापन कभी छूटे न
साथ अपनों का कभी छूटे न
मज़हब को न लाओ दरमियां
दूरियों को बड़ाओ न
नफरत का ज़हर मिलाने से
होगा न कुछ हासिल
मिल बैठ सब मुद्दे सुलझाओ
गर संग है हम हर खुशी है संग
फिज़ा को जहनुम्म बनाओ न
वो त्यारोहों का समा रंगीन
कभी होली, दिवाली तो कभी ईद
मिठाई बांटने की वो रीत
संग सवेयां की वो प्रीत
क्या रंगो की फुहार
बारात रोशनियों की
मिलना गले वो जोश के साथ
संग मंदिर की घंटियों की खनक
अजान की वो सुरीली आवाज़
ये भारत है अपना
अपनेपन में दूरी लाओ न
दूर है गर कोई
कदम बड़ा उसे संग लाओ
दिल से रहो क़रीब
अपनाओ सब को
तमाम दूरियां मध्य से हटाओ
वो पहले सा प्यारा
अपना हिंदोस्तान वापिस लाओ न
रजनीश राय
०२/०८/२०२२
१८:१६