Friday, October 21, 2022

नफरत का ज़हर - The Resplendence of Friendship

दोस्ती अपनी कभी टूटे न
हम है एक देश 
रिश्ते न जाने अनेक
ये अपनापन कभी छूटे न 
साथ अपनों का कभी छूटे न

मज़हब को न लाओ दरमियां
दूरियों को बड़ाओ न
नफरत का ज़हर मिलाने से
होगा न कुछ हासिल 
मिल बैठ सब मुद्दे सुलझाओ 
गर संग है हम हर खुशी है संग
फिज़ा को जहनुम्म बनाओ न

वो त्यारोहों का समा रंगीन
कभी होली, दिवाली तो कभी ईद
मिठाई बांटने की वो रीत
संग सवेयां की वो प्रीत
क्या रंगो की फुहार
बारात रोशनियों की 
मिलना गले वो जोश के साथ
संग मंदिर की घंटियों की खनक
अजान की वो सुरीली आवाज़

ये भारत है अपना
अपनेपन में दूरी लाओ न
दूर है गर कोई 
कदम बड़ा उसे संग लाओ
दिल से रहो क़रीब
अपनाओ सब को
तमाम दूरियां मध्य से हटाओ  
वो पहले सा प्यारा 
अपना हिंदोस्तान वापिस लाओ न

रजनीश राय
०२/०८/२०२२
१८:१६

बचपन के पल - The Resplendence of Friendship

बचपन के पल संग वो दोस्ताना 
खुशियों का संसार जैसे ग़म से कोसों दूर 
हर खुशी लगे अपने लिए आयी हो 
चाँद दूर रह के भी पास लगे 
जैसे चाँदनी सिर्फ मेरे लिए आयी हो 

वो संग जुगनू को रात में 
पकड़ने की होड़ यूं हाथ में 
रखना संग काँच में 
रौशनी झिलमिल सी 
देखते रात भर एकटक 
नींद सपनो में भी न आयी हो 

काँच की बोतल यूं झिलमिलाते जुगनूँ  
दोस्ती निभाती एक रात संग मेरे 
तो दूसरी रात संग मित्र को 
जुगनुओं के रूप में भी 
जैसे खुशियाँ समायी हो 

वह डब्बा और लंच का समय 
तकते यूं बेताब से एक दूसरे के डब्बे 
यूं बाँट लेना झटपट  
गर कुछ स्वादिष्ठ या 
माँ ने सहज रख दिया संग कोई मिठाई को 
सिर्फ तुम ही खाना यह कह कर 

अध्यपिका क्रोध में 
किया कोई गृहकार्य दोष में 
संग मित्र का भी छुपाना अपनी पुस्तक को 
कक्षा बाहर होते संग
फिर वो मुँह छुपा हँसना साथ में 

त्योहारों के दिन 
हँसती यादों के दिन 
पतंग कटने 
और पतंग पकड़ने के दिन 
पटाखों के संग 
चिल्लाने के दिन 
छुप छुपा कर संग 
मिठाई चुराने 
और फिर संग खाने के दिन 

चोरी से तोड़ना 
कच्चे आम या अमरूद का पेड़ों से 
वह सीटी की सूचना 
माली को देख कर 
एक दोस्ती ऐसी 
निभाते हर शरारत पर 

बारिश में भीगना संग 
कपड़े को कर गन्दा 
बहाने वह अनसुने से 
झूठ की पैरवी 
करते बेख़ौफ़ से 

तालाब के निकट 
प्रतिस्पर्धा न भूलने वाली 
कंकर को फेक 
टकराना पानी की सतह पर 
कूदना हर्ष से उस जीत पर 
ऐसी खुशी की न बयाँ करने वाली 

रूट जाना किसी बात पर 
कोई पुरानी बात कह कान में 
फिर हॅसना खिलखिला कर 
मासूमियत भरे वह पल 
ना आते क्यों लौट कर 

आज न जाने क्यों 
वह दिन आये याद 
बस बैठे बैठे सोच बहुत हुए उदास 
यो याराना बचपन का 
बहुत कुछ दे गया 
समय था सिमित 
असीमित खुशियाँ दे गया। .. 

रजनीश राय 
२८/०७/२०२२ 
१९:३९ 






भावनात्मक रिश्ता - The Resplendence of Friendship

आज कलम कहे 
चलें शब्दकोष से बाहर 
मित्रत्रा को रख आधार 
एक ऐसा घनिष्ठ रिश्ता 
ज्ञानी विद्वान् न पा सके पार 

आज के उलझते रिश्तों मे 
सच का एक प्रतिरूप 
प्रतीत एक सच्ची सुलझन 
एक ऐसी मजबूत डोर 
समहित हो जैसे अपनी धड़कन 

जख्म हो चाहे कितना भी गहरा 
हर दर्द मिटाते बन कर दवा 
दौरे ए मुसीबत संग ठहरते 
जैसे बिन इब्बादत मिले दुआ 

क्या नगद तो क्या उधार 
हुए न कभी बंद द्वार 
हर किस्से जीवन संवारते आये 
हर मुसबित में सिर्फ दोस्त याद आये 
अनजाने हो कर भी 
जीवन का हिस्सा बन जाएँ 

आज भी याद है वो एक एक लम्हा 
बीते न जाने कितने वर्ष 
प्रत्येक वर्षों  के अनगिनित दिन 
दिनों के यूं पल हजार
न थी कभी इच्छा 
क्या जीत और क्या हार 
भावनात्मक रिश्ता जैसे एक प्यार 

रजनीश राय 
२८/०७/२०२२ 
१७:३६ 



संग न कोई आज - The Resplendence of Friendship

खूबियों से न की रखी नींव दोस्ती की 
अनजान से मिले बस ख़ास हो गए  
हो चाहे अपूर्णता का भंडार 
बस जिगरी यार हो गए 

आज याद की सीमा बेइंतहा हो गयी 
कुछ उदासी भी संग हो गयी 
याद आयी वह टोली हॉस्टल की
कुछ नोट्स वालों की 
संग चाय की चुस्की
कुछ कश धुंए के 
संग बनाते वह छल्ले 
वह बन लीडर 
अपने मुहल्ले के  
कहीं लड़कियों की सुरक्षा 
कहीं छोटो के बनते भाई 
कहीं देते गालियाँ 
कहीं बेशर्मी से खाये 
कहीं वह जोश भरी लड़ाई 
कहीं मिले दिल भी 
कहीं मिली तन्हाई 
कहीं माँ बाप संग शिकायतों के दौर 
कहीं टांग खिचाई 
कहीं रंग होली के 
कहीं कृष्णा की मटकी 
कहीं शादी में बिन न्यौता बाराती 
वह हंसी, मज़ाक,  
संग दोस्ती की गहराई  

कभी ग़लतफ़हमी का दौर 
वह रूठना मनाना पुरजोर 
आज यादें के संग आँखे हुई नम 
जो आये याद वादे फिर मिलने के 
पर कोई न निभा पाए 
अपनी राह सब गए आगे 
संग न कोई आज 
फ़िर भी लगे सब साथ आये हैं   

पास रह कर हुए दूर 
दूर हुए पर न भूला जाये 
लिखी है न जाने कितनी कवितायेँ 
चाह कर यारों तुम्हे न सुना पाए  ... 

रजनीश राय 
१२/०८/२०२२ 
१५:५८ 

ग़लत नहीं है - The Resplendence of Friendship

आज बैठे थे कुछ और लिखने 
की सहसा एक एहसास आया 
बात चली मित्रता की आज 
नारी और पुरुष पे सवाल आया 
मित्रता के है इतने दायरे 
समाज इस को कभी न समझ पाया 

नारी पुरुष की मित्रता को 
अधूरी कल्पना सा 
अतृप्त इच्छा के रूप सा 
वासनाएँ छुपाने के नक़ाब सा 
संबध को ढकने के प्रयास सा 
सिमित सोच में बंधा पाया 

मित्रता के रूप हज़ार  
पुरुष और नारी संग दोस्ती 
आज समाज का महत्वपूर्ण अंग 
हर कदम जब नारी संग 
क्यों मित्रता पर हो तंज 
हर क़दम लो सबका साथ
समाज,और देश सब का हो विकास 
अब आना इस मानसिकता से बाहर 
कर इस सामाजिक त्रुटि का बहिष्कार 

इस सामाजिक कुरूप सोच को 
सिर्फ मित्रता समझने का वक्त आया 
इस रूढ़िवादी विचार को 
अलविदा कहने का समय आया 
स्वस्थ मैत्री और सिर्फ स्वस्थ सोच 
समझने का अवसर आया 

आज कहने का साहस किया मैंने 
शायद कल्पना तो करते होंगे सभी 
ग़लत नहीं है  
बोलने का उचित वक़्त आया 

रजनीश राय 
१६/०८/२०२२ 
२०:०४ 



क्या शिक़ायत क्या गिला - The Resplendence of Friendship

दुनिया के मोह में कुछ इस क़दर खोये 
इतराते थे जिस दोस्ती पर वक्त बेवक़्त 
कल की ही बात है शायद 
आज क्यों सिर्फ याद बन रह गए 

वक्त का पहिया चलता रफ़्तार 
हम सोच रह गए इस न जाने किस पार 
कल तक थी हजारों कस्मे 
आज कौनसे पल में हुए गिरफ्तार

वो हंसी वह ठहाकों की भरमार 
हर सुख दुःख में बेधड़क 
संग जीने मरने की ललक 
किधर हुई वह खुद से ज्यादा हमारी फ़िक्र 

यक़ीन नहीं क्या हालात यूं बदल जाते है  
दोस्त क्या सिर्फ याद बन रह जाते है 
क्या शिक़ायत क्या गिला ज़िंदगी से
भूले ही सही किंतु ये भर्म पाले बैठे है
याद आये गर कभी यारों की
मिल बैठ वही पुरानी यादें संग दोहराना 
कभी खुद को तो कभी दोस्तों को संग पाते है

रजनीश राय
३०/०७/२०२२
२०:०८

कुछ याद आया होता - The Resplendence of Friendship

क्यों जिंदगी हर हसीन पल को नहीं दोहराती
याद आज भी है कहकशों के पल
पर न जाने क्यूं आज आंखें नम 
जेहन में उदासी न होती कम
वो दोस्ती के लम्हात की जब जब याद आती 

वक्त के भंवर में खो गए से लगते है सब
हर बात लगे अब हुई पराई 
मोड़ भी हुए हरजाई
रास्ते हुए लंबे
हर लम्हे यादों के बन परिंदे
न जाने किस दिशा 
या बन घनघोर काले बादलों में हुए लुप्त

किसी न किसी को तो कुछ याद आया होता
वो खुशियों के मेले संग पुराना एतबार
दीवानगी को ले संग, बंदिशों से पार
कुछ तो यादों में उनके कभी आया होता

हर वक़्त सिर्फ एक प्रश्न न अब भुलाया जाता 
क्या पास रह कर भी कोई रहता यादों में
या कुछ दूर रह कर भी न भुलाए जाता..

रजनीश राय 
०२/०८/२०२२
१९:११

क़िरदार ढूंढता हूँ - The Resplendence of Friendship

आज भी याद है 
सफ़र एक दिन कुछ ख़ास  था 
संग एक ऐसा दोस्ताना 
जो न भूले बस बहुत ख़ास था  
 
मध्यवर्ती शिक्षा में हुए उत्तीर्ण
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की प्रवेश परीक्षा 
आयी चिट्टी सरकारी 
परीक्षा केंद्र गुवाहाटी लिखित देख  
झटपट तमाम कार्य की सम्पूर्ण तैयारी 

आया दिन सफ़र का 
बैठे ट्रैन मैं संग परीक्षा हेतु 
छात्र तमाम न कोई मित्र उनमे 
करते सफर सब अकेले संग तैयारी 

पहुंचे परीक्षा केंद्र 
न जाने कितने छात्रों के संग 
हम भी लगे सोचने अपना भविष्य 
बनते एक सैन्य अधिकारी    

चलते चलते परीक्षा केंद्र को 
कुछ ही दुरी पर 
पाँव जा अटका घाँस में छुपी 
एक पक्की पानी की नाली पर 
दर्द का वह रूप 
आज भी नहीं भूलता 
कौन था संग किसने थामा जब 
कुछ होश न था 

संध्या को जब मूर्छा आयी वापिस 
खुद को पाया ट्रैन में वापिस 
संग एक दोस्त या रूप सुदामा 
न पहचाना न जाना  
सफर तमाम सहलाता रहा पैर को मलहम  
पानी की प्यास या कोई दवा 
खाना या पेय दिया बिना कोई ध्येय 
बिना कोई परिचय देता रहा सिर्फ सेवा

आया गंतव्य दे विदा चला वह गया किधर 
आज भी वह अनसुलझा 
सा क़िरदार ढूंढता हूँ 
न पूछा नाम न  शहर न पता 
कोसता हूँ बस खुद को क्यों न सब जान सका 
जब भी ये दिन याद करता हूँ 
काश वह पढ़ ले और एक बार तो सिर्फ मिल ले 
उस दोस्ताने तो सिर्फ सलाम करना चाहता हूँ 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१९:३४ 
 
 


प्रेम और अपनापन - The Resplendence of Friendship

आज न जाने क्यों मन उदास 
सोच क्यों करते है दोस्त ऐसे 
हम जिन्हे हमेशा सोचते साथ 
फिर न जाने क्या सोच 
क़दमों को कर साथ 
चले पार्क में अकेले 
बैठे वह पुराने बेंच के साथ 

देख तभी एक बुजुर्ग को 
लगा जैसे सुबह की सैर को 
कुछ वक़्त समय पारित को 
बैठ कुछ सुस्ताते 
उस पुराने बेंच के साथ 

तभी देख आये कुछ पक्षी 
यूं जोर जोर चहचहाना 
आये कुछ बंदर 
वृक्षों को हिलाते  
न जाने कुछ कुत्तों भी संग 
आये दुम हिलाते 

दाना डाला पक्षियों को 
कुछ चने बंदर खाते 
कुत्तों को रोटी के टुकड़े खिलाते 
हँसते रहे फिर एक टक निहारते  

मन की उदासी हुई काफ़ूर 
नए रंग दोस्ती के देख कर 
न उदासी इसमें 
न कोई गिला शिकवा 
न कोई कस्मे वादे 
न झूट का कोई आडंबर 
न रईसी की महानता 
है तो सिर्फ एक भोलापन 
और संग पवित्रता 
स्तब्ध दोस्ती के इस 
मेल को जान कर 

परिभाषा प्रेम की समझे 
या समझे एक दूसरे के विचार को 
न रखो कोई मतलब
रखो मघ्य सिर्फ मेल मिलाप को 

पक्षी या जानवर क्या इंसान संग 
क़िस्सा ये भूख का न समझो 
लाख कोशिश की हमने भी 
पक्षियों को खिलाने की 
न हुए क़ामयाब  
वह प्रेम और अपनापन 
की अनुभूति 
उन्हें न मिली हो शायद। .. 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१५:४७ 





चंद वाक्यां दोस्ती के - The Resplendence of Friendship

चंद वाक्यां दोस्ती के 

दोस्ती के पल जी लो हर घड़ी
क्या पता किस रोज़ जाना है बिछड़
चंद लम्हात कब सिमट जाएं 
कौन जाने किस मंजिल को पाना है

आसमां के तारे ले आओ जमीन पर
गर मिले एक मुस्कुराहट बदले में
खुशियों की बदौलत ही
हर दोस्ती की कीमत चुकाना है 

हर सुख दुख की पहचान सिर्फ दोस्ती
हर चेहरे की मुस्कान सिर्फ दोस्ती
न लेना दिल पर रूठे हो गर अपने
दोस्ती संग अक्सर नादानी निभानी पढ़ती है

जिंदगानी में अक्सर दोस्ती नाक़ाम होती है 
होते है दोस्त सच्चे 
पर न जाने क्यों दोस्ती 
अक्सर बदनाम होती होती है। .. 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१४:५१ 

Tuesday, August 30, 2022

कशमश हर लम्हा - शब्दों के उस पार

अनजान से रास्ते संग हमारे तकते एकटक
दूर से आती रोशनी बने आशा की झलक 
आज चांद भी प्रतीत चला कह अमावस
कुछ बूंदे भी लगी गिरने जैसे दिल की तड़प

रास्ता हुआ लम्बा कटे यूं उम्र सब खो कर 
रात की स्याही सा कुछ दिखे न आंख खोलकर
आवाज सन्नाटे की जैसे रिश्ते टूटते बनते पलभर  
कुछ वहम आहट का सा जीवन बना हर पल पृथक

स्मृतियाँ पटल पे छायी मोह के धागे बनकर 
पास हो कर भी न हो कोई मृगतृष्णा सा होकर 
संग रह जब न बन पाया अपना सा कोई बनकर 
आज नहीं है संग पर ह्रदय तो विचलित हर पल 

प्यार करते थे हर लम्हा जिन्हे हम दिल खोलकर 
संग रह कर भी न क्या दे पाए हम उन्हें 
कुरेदते हर पल खुद को उलझाकर  
खुशियों की चाहत तकते लम्हा लम्हा 
हर एक दिन कुछ झलक पाने को तत्पर 

मोह की नगरी इस दुनिया में सोचते हर पल 
हमको ही सिर्फ क्यों मिले मोह के धागे बुनकर 
लगाव दिया तो मिले सबको परस्पर 
एकांगी मोह जैसे शापित उम्र न्यूनतर

हँसते हम रहे फिर भी 
या हँसता हम पे समय कभी 
कभी रात को दिन समझकर 
आया दिन तो कहें कब आये रात 
कशमश हर लम्हा हर दिन क्या रात 
बस चलते अंधकार में रोशिनी को समेटकर 

रजनीश राय 
०३/०१/२०२२ 
१८:४४ 

यादें बेपरवाह - शब्दों के उस पार

काश हम कुछ कह पाते
रिश्तों की डोर पकड़ कुछ कदम चल पाते
हर पल बंधे रहे उन बंधनों से
जो शायद हमे कुछ समझ पाते
प्यार की ख्वाइश थी जिनसे
वो बिना कुछ कहे हमे जान जाते

हंसते तो है हर पल
पर खोखली हंसी नही सह सकते
राह न मिले कभी
पर उनके घर का रस्ता नहीं बदल सकते
प्यार से उठ गया भरोसा
लेकिन उन्हे प्यार करना नही छोड़ सकते

आ के यूं पास क्यों मुंह मोड़ लिया
कुछ तो कहा होगा 
कुछ तो सुना होगा
हम देते यूं खुद को इल्जाम
क्या उनके काबिल हमे न पाया होगा..

गम की बारिशों में या करवटों की आहोंं में
इस कदर बदले वो आज हम खड़े राहों में
अश्रु क्या दिखते आंखों में 
ढूंढते सब जिन्हे बरसातो में
लो हम भी बन गए अब अनजान 
यूं मिले वो जब भी राह में

यादें कुछ बेपरवाह हो जाती है
हवा जो ले रुख हमारी तरफ
खुशबू भी उनकी संग ले लाती है
जिक्र जो हो कभी उनका 
जेहन में सलवटे सी पड़ जाती है
कशिश में है उनकी कुछ जादू
दिल का जख्म फिर हरा कर जाती है

रजनीश राय
१५/०६/२०२२
१७:२१

दूर छुपा रखा है - शब्दों के उस पार

जिक्र होता है जब जब
यादें गहरा जाती हैं
गर्म बूंदों सी 
आंखो के कोने से 
बन आंसू बह जाती है
न करेंगे उजागर ये गम 
इसलिए यादें अंदर दफना रखी है

आज हर खुशी में भी 
वो दुख कहीं छुपा रखा है
हो न कभी कोई 
देख हमे उदास 
बस एक ऐसा मन बना रखा है
दुख को कहीं दूर छुपा रखा है

एक एक दिन 
एक एक पल सब है 
आज भी संग यादों का काफ़िला
रहेंगे हम ही सिर्फ संग
न देने कभी उदासी की कोई भनक 
दिल को मज़बूत बना रखा है
दुख को कहीं दूर छुपा रखा है

रास्ता है बहुत लंबा 
हर पल को क्यों कोसे
जब गम को दिल में छुपा रखा है
हर पल बीतते क्या रात क्या दिन
हम लाए न जाने कितने दिन
खुद को भी कुछ यूं समझा रखा है
दुख को कहीं दूर छुपा रखा है

बस बहुत अकेले पाते हैं हम - शब्दों के उस पार

आज भी याद आए जब 
खुद को बहुत अकेले पाते है हम
न जाने क्या सोचकर 
बस खामोश हो जाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

आज न जाने क्यों आती उसकी याद 
दिखे वह हमें हर तरफ 
हम जब आँख मूंदे हर बार 
समय अति गतिशील 
लगा छूट गए अपने कुछ उस पार 
यूं कुछ सोचकर खामोश हो जाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

वह हँसी वह मुस्कारहट  
संग संग जीवन मोह की मीठी आहट  
पर अब रास्ते हुए अंजान 
यूं तकते हम उन राहों को 
बन एक जीवंत पाषाण 
यूं कुछ सोचकर निष्प्राण हो जाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

मुस्कारहट ने छोड़ा साथ कब का 
हुए मतलबी नेत्र संग अश्रु भी 
हँसे कभी तो गिर जाते है 
रोए तो आँखों में टिक जाते है 
हर पल आंखों में चुभन सी पाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

हुआ सूर्य अस्त लगे कम्पन  
लगता अब डर रात से 
हर एक एक लम्हा आगे बड़े
हम खड़े डरते अपनी परछाई से 
यादों को खुद से जुदा न कर पाते है हम 

खुद को बहुत अकेले पाते है हम
आज भी याद आए जब 
बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

रजनीश राय
०१/०१/२०२२
२३:४५

न जाने क्यों आज बहुत याद आए - शब्दों के उस पार

शीत लहर ने जैसे दी दस्तक 
 खुली खिड़की की ओट से
आज अपने याद आए सहसा 
जैसे सरकती रेत पल में हाथ से 

बैचनी हर पल अनदेखे अंजाम से
साथ रहकर चला पल में हाथ छुड़ा के
याद आते वो बीते लम्हे
भोली हंसी संग प्यार दुलार के
आती हर ऋतु संग नए मौसम में
पर आंखे ढूंढती अपने से एक चेहरे को

आज न जाने क्यों वो बहुत याद आया
क्या कोई भुला रास्ता उसका में देख आया
लगे हवा भी उसकी महक को दोहराए
वृक्ष भी दे गवाही कुछ सूखे पत्ते को गिराए
हर मोड़ से कोई अपनी सी आहट आए

भय लगे अब रात के आगमन का
वह अनजानी रात के आगमन का
भय सा हर पल कुछ पाकर खोने का

सर्द है आज मौसम बड़ा
जैसे मिजाज़ कुछ बिगड़ा बिगड़ा
हवा भी लगे जिस्म को काटती
संग बूंदों की कुछ आहटें 
बैठ किनारे अग्न के ताप को सेकते
क्यों कब और कैसे के 
प्रश्नों में बस खुद को समेटते 
उत्तर न मिला अब तक कोई 
चल दिए तालाश में फिर 
मन कुछ बुदबुदाते

रजनीश राय
१५/०६/२०२२ 
१७:०३

Tuesday, August 9, 2022

दुआ करते है - Unsaid Feelings

दुआ करते हैं

गलियारे प्रेम के एहसास से 
कुछ अपनेपन की मिठास से 
यादों के झूलों से
बैठे बिन पतवार वाली नाव पर 
गए जब वह पास से कुछ मुस्करा के 

ख़्वाबों की दुनिया 
बहके हर कदम 
मासूम से उस चेहरे पर 
वह नज़र चुराती हर नज़र पर 
चलना मदमस्त सा
हिरण की चाल पर 
बालों की वह घुँघराली लट  
गिरना नयनों के प्यालों पर 
भरी दुपहर दुपट्टा सर पर 
नंगे पाँव भागना गलियारे के गर्म पत्थरों पर 
ठहरे पानी में कूदना बुँदे उड़ती हवा में लहराकर 
क्या कहते इस प्यास को हम न समझ पाए 

शाम ढली हम चले 
आज मिलने अपने प्यार को 
उसको पाकर सामने  
हम भी कुछ मुस्कराये 
न जाने कितने सपनों को सँजो लाये 

शिकवा करते यूं 
हम रात की तन्हाई को
शाम सिर्फ अपनी हो 
चांद का भी पहरा न हो
तारो न गिरना कसम है 
कहीं कोई मांग ले न तुमको
इस भय में समय गुजारते गए

सदियों के सपने सच हो पाए
वो मुस्कराहट को अपना कह गए
सोचा था जिसे सदैव सपनों में
आज अपने हो गए 

वक्त लगा उड़ने लगा कर पंख 
उसके हाथ का वही कोमल स्पर्श 
आज भी सदैव अपने कंधों के संग 
वक्त न जाने कितना आया आगे  
परन्तु हम न आगे जाते है 
न आगे जाना चाहते हैं
वह प्यार वह मिठास संग हवा में घोल 
आज भी सिर्फ मोहब्बत में जीना जाते है 
दुआ है अब तो यही तुमसे ए रब 
न करना कभी हमे जुदा 
बुलाना हो गर कभी 
दोनों को संग ही ले चलना ख़ुदा 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१७:२२ 

Saturday, July 30, 2022

मुसीबते ऐ दौर - Mere Humrahi

दिन नया रात नयी  
वक्त चले अपनी गति 

आया एक ऐसा दिन 
लगे सब गया छिन्न 
दरार पड़ी कुछ मीठे रिश्तो में 
हम भी जा बटे कुछ हिस्सों में 

संग खड़े हमदम 
सूझ बुझ के संग 
हाथ से पकड़ हाथ 
संग किया मुसीबते ऐ दौर पार 

नया शहर नया घर 
नयी नौकरी ढूंढ 
जीविका को समृद बनाते 
मेहनत से न कदम डगमगाए 
खुशियों की रूप रेखा फिर सजाये 

फिर आया ख़ुशी का दिन 
बहुत मुद्दतों के बाद 
महकता सूरज सा नन्हा कदम 
घर आंगन किलकारी की गूंज 
प्रतीत एक सुकून 
समय भागे सरपट सरपट 
हर पल महकता फूलों सा 
कानो में आये जैसे मधुर कोई धुन 

बाल की शिक्षा का पहला अध्याय 
संग माँ का प्यार पाए 
पुत्री और पत्नी का धर्म संग निभाए 
हम हर पल उनको संग पाए 

कदम बड़े कुछ इस जीवन रूपी बंधन में
प्यार होता है क्या जाना कुछ ही लफ्ज़ों में

रजनीश राय 
१३/०५/२०२२ 
१८:०० 

प्रथम पृष्ट - Mere Humrahi

सहगामी या हमराह 
हमसफ़र कहो या साथी
आज हंसते मन में कुछ सोचते
याद आए वो दिन लड़कपन के 

निहारना वो एकटक 
करना घंटो आने का इंतज़ार 
देख बालों में अपने हाथ फिराना 
और उनका भी लटो को झटकना 
तोड़ कच्ची इमली उनको रिझाना 
गहरी झील के मटमैले पानी से कमल लाना 
तोता कुतरे अमरुद का लाना 
गहरे जंगल में कच्चे बेरों का लाना 
बिन बात मुस्कराहट चेहरे पे 
बस याद आये वो पहले दिन मोहब्बत के 

मिलना हुआ दस्तूर 
नियम सा लगता जरूर 
वह बातों के दिन
लम्हातों के दिन 
अस्त न हो सूर्य ऐसी आशाओं के दिन 
प्यार सी मीठी बातों के दिन 
याद आते बिन बात रूठने मनाने के दिन 

बीती शिक्षा संग परवान प्यार का 
करते नौकरी उच्च पद आसीन 
शिक्षिका बन वह बांटे ज्ञान   
लिए संग मातृ पिता के सहमिति 
सोच समझ लेकर सबका आशीर्वाद 
हुए हमराह बन एक दूसरे के प्यार के
ये है वह हसीं अध्याय बना प्रथम पृष्ट जो हमारे प्यार का

रजनीश राय 
१३.०४ .२०२२ 
१४:०७ 



सँकरी गली - Mere Humrahi

समय की करवट 
रिश्ता लगा और गहराने 
बन ख़ुशी हम साथ चले 
हर कर्तव्य को संग निभाते चले 
प्यार और फर्ज को संग मिलाते चले 

वक्त की सौगात 
चमन में एक और गुल खिला 
प्रतीत ईश्वरीय असीमित कृपा 
प्यार के जैसे पंख असीम 
पागल पवन सा उड़ चला 

कभी हुए उदास या 
कुछ काम का भारी एहसास 
प्यार भरी बात और बैठ कर पास 
किया हर लम्हे को खास 

देखते कनखियों से वो कभी हमें 
और हम देखते बस उन्हें 
मुस्कुराते अन्दर से 
न हो कभी ये प्यार कभी कम उनसे 

सुबह की धुप हो चाहे 
या घनघोर रात 
बारिश के दिन 
या वह सर्द जाड़ों की रात 
हुई जब रिश्तो की गहरायी की बात  
हर मौसम सुनाते बस हमारे दिल की बात 

वक्त न रहे कभी सामान 
हुआ हादसा कुछ दर्द भरा 
जैसे सँकरी गली आये सामने
उलझा जैसे रास्ता न कोई पाए
इस उलझन को हमराही ने सरल बनाया 
कुछ भी हो हालात न हटें पीछे 
मुश्किल राह को सरल पाया

काल की गर्त में क्या 
कभी जो हुए हम गुम 
उस सोच की भवर से हम बाहर आये 
लगता हम सिर्फ ठोस शरीर से 
पर ह्रदय से स्थिर हमराह
कांधे पर रख हाथ 
प्यार का वचन कहते 
थोड़ा संभले हम 
थोड़ा संभाले आप 

हुआ प्रतीत या आज जाना 
साथ है गर कोई प्यार अपना 
रास्ता चाहे हो लाख कठिन
मूंद आँख कट जाना 

रजनीश राय
१८ /०५ /२०२२
१८:१६ 

लगा समय बीतने अपनी दशा 
प्रारम्भिक से शिक्षा माध्यमिक 
फुर्सत हुई सिमित 
पुत्र कद मात पिता का 
क़दम युवा युग में 
हँसते हँसते न जाने 
थामा कौन रास्ता
सब तरफ रोष 
माँ,भाई सब बदहवास 
न कोई मशवरा न सोच    
लगे आज कौन परीक्षा 
हुए हम असफल 
सोच सोच हुए हम विफल 
अश्रुयों को नेत्रो संग दबा

बस सकून आया - mere humrahi

कैद वक्त की रफ्तार   
सेवा निवृत्त हुए हम भी
दिन बदले महीनों में
बदले साल पे साल
देख जी रहे आज हम ज्यादा 
था जैसे पहले वक्त के आभाव का तकाज़ा 

हुए कुछ स्वास्थ्य से हताश 
प्यार में न हुए कभी निराश 
आज हम साथ लगे हर खुशी साथ 
जैसे मिट्टी के संग बरसात 

उम्र के इस पड़ाव पर हम 
खुशकिस्मत है आज 
प्यार की जैसे उम्र नहीं होती 
जब भी हो संग  
सिर्फ अपनों सी प्रतीत होती 

माँ का क़िरदार 
करते करते न भूले हमें 
आदत को हमारी 
न किया नज़रअंदाज उन्होंने  

वक्त बिता कुछ करें इस उम्र में 
संग किया विचार
एक वृद आश्रम जेहन में आया 
लगे बस मोहब्बत बाटने 
जो हम ने संग कमाई थी 
आज जैसे परीक्षा की घड़ी आयी थी 
घड़ी के कांटे या पंचांग के पन्ने
लगे दौड़ने संग साथ हो अपने
हम हुए गुम खुशी के इस दौर में


आज सोचते होते ह्रदय हर्षित 
की हम ने ऐसा जीवन साथी पाया
जीवन के इस दौर में हमने
न खुद को किसी पे निर्भर पाया
रास्ता था चाहे कितना भी कंटीला
हमे तो बस सकून आया सकून आया

आज भी सुबह की चाय 
संग पीते है 
शेष कितने दिन उम्र के 
बस संग जीते है 

रजनीश राय
१८/०५/२०२२
१९:३५ 

समय संग हर सुख दुख के
समुंद्र को करते पार
खुशियां आई संग द्वार
पुत्र की नौकरी विदेश में
हुआ हर्षित मन सोच बार बार
चला विदेश आशिषो का ले भंडार 
मां हृदय तकता राह
कब हो पुत्र दीदार
जब साथ हो 

लगता गए सब कुछ गए हार
जमा पूंजी हुई तमाम
आज घर भी था खड़ा नीलाम

मन में आशा की ज्योत जला 
हर मोह को दिया मिटा
दोनो की नई सोच

वो हँसी पल - Mere Humrahi

चेहरे पे मासूमियत
जैसे हया को रखा हो कैद कर
नूर चेहरे का बना क्यामत, 
होती बैचन घुंगराली जुल्फें लटक कर
लाल हुई मेहंदी गोरे गोरे हाथों पर
बिंदिया दिखे घूंघट की आड़ 
जैसे देखे बदली में चांद झांक कर 
दिखती पैरो की पायल कभी
जैसे आलते संग घनिष्ठता बड़ाकर
लाल रंग साड़ी  
संग खनकती चूड़ियां 
क्या दे नाम इन सब को 
बोलती खामोश दिल की बैचैनियाँ

प्रथम दिन या रात आज शादी के बाद
कहे कोई सुहाग रात तो कोई शर्माए
क्या हुआ आज इस दिल को
क्यों है धड़कने बेचैन
मिला संगी हमे ऐसा 
जिसको तरसते थे नैन
हमारा पहला प्यार जिसको आज समाज से पाया
कह संगनी हमने और मान बढ़ाया
रात गुजारी कुछ खट्टी मिठी बातों में
हुई सुबह पता न चला मीठी यादों के आगोश में

हम हुए जैसे ऋणी ऐसे बंधन में उनको पाकर
पिछले जन्म के अच्छे कर्म हमको मिले यहाँ पर
हर पल बना हंसी हर पल महकाए
महकती सी हंसी जैसे खिलकलाता पुष्प
आवाज प्रतीत पहली बारिश के बूंदों की झलक
चलने पर आए पायल की घुंगरू की खनक
पास से गुजरे तो आए हवा संग फूलों की महक

ये जीवन लगे अब अति सुंदर
मोह के धागे में बन्दते हर पल
कभी वो गुस्सा और कभी प्रेम 
रूठना मानना लगे जैसे एक खेल

नजर न लगे कहीं खुद की
सोचते डरते बस हर पल
प्यार को बांध रहा प्यार 
इज्जत और इज़ाजत सब को समेट कर
हंसते हंसते कटें बस ये हँसी पल

रजनीश राय
१९/०५/२०२२
१२:०२

पुत्री मां पिता की दुलारी आए सब छोड़ के
कितना विशाल हृदय रख कदम नए दौर में 
विश्वास रूपी बंधन पे विश्वास की आजमाइश
निभाना होता है कैसे सोचते बन ख्वाइश 

कभी हो भ्रमित कही कुछ खेल तो नही
हंसते चेहरों के पीछे कोई भेद तो नहीं
सब आशंकांओं को धकेलते कोसों दूर
खुशबू की तरह सब को ले अपना बना लेते जरुर
हर पल हम देते सिर्फ वक्त को दुआएं

Thursday, July 21, 2022

आत्मविश्वास - Atmavishwas

जीवन के अनेक पहलू 
करता नियंत्रित विश्वास 
विश्वास गर खुद पे रखो 
बढ़ता आत्मविश्वास 

हर मोड़ जीवन का 
देता अनेको अनेक राहें 
हम चलते किस राह पर 
वह आत्मविश्वास सिखलाये 

आपका व्यव्हार और विचार 
संग जुड़ाव आत्मविश्वास का 
रहें हर मुश्किल में सहज 
हर उत्तर हो आश्वस्त से सराबोर 

जीवन लाये मुश्किल भरपूर 
प्रस्थितियाँ तो बदलता मौसम 
आज नहीं कल अवशय होंगी दूर 
बस आत्मविश्वास न हो कमजोर 

आलस्य, निराशा और भय को त्याग 
आज नहीं तो कल रुख बदलेगा 
चन्दन देता तभी खुशबु 
घिसाई हो जब बार बार 
आत्मविश्वास की उत्पति में 
आये जैसे श्वास शब्द हर बार 

रजनीश राय 
२३/१२/२०२१ 
१६:५९


सर्द परदे आंखो के # आत्मविश्वास

दोष नहीं पर्दा ही इन आंखों पे सर्द है 
रहते है महफूज साए हिंदुस्तान में 
दुखी दिखें हर पल खुश दूसरों के साए में
दोष देते हर पल जिन्हे
वो देश की उन्नति के सहाय है

कोई किसी का गुलाम नहीं होता
भारतवर्ष में कोई हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई नहीं होता
गुजराती बिहारी पंजाबी या तमिलियन नहीं होता
होता है तो सिर्फ भारतवासी होता है
आज है हम महफूज बनो शुक्रगुजार खुदा के
उसका कोई भी इंसान एक दूसरे से जुदा नहीं होता

मुद्दा नहीं काले धन का
या कोई घराने की ऊंचाई का
हम हुए कितने मुफ्तखोर 
आज इस की भरपाई का
न जाने कितने वादे मुफ्त के
पर मुफ्त नहीं संग मेहनत के ही लेंगे
बस अंदर के इस लोभ को मिटाना है

कौन नहीं चोर ये कहते है हम
गर एक उंगली उनकी तरफ तो चार उंगली पे है हम
पैसा न आया ना साथ जायेगा
रहो बस एक हो कर सब 
यही सबक मुदत्तों तक दोहराया जायेगा,,

अब बस करें जीना भूतकाल में
वर्तमान और भविष्य में है बस जीना
इसे कहो चाहे मेरा स्वार्थ या आपका नफा
लिख तो रहा हूं पर गवाह है 
गूंजती कान में अजान की सुरमई पक्तियां
वक्त से वक्त मिला लो यारो 
झूठ से न है दूर की नजदिक्यां

खुद पे रखो विश्वास 
भारत को समृद्ध बनाना है
एक एक इंसान के अंदर आत्मविश्वास जगाना है
अपने मुल्क के हर इंसान को अपने अंदर बसाना है
इन सर्द पर्दो को आंखो से हटाना है
हटाना है...

रजनीश राय
२७/०५/२०२२
१९:४५

जियो जिंदगी भरपूर - आत्मविश्वास

बढ़ता हर तरफ सिर्फ हाहाकार 
इंसानियत को कर शर्मसार 
मंदिर मस्जिद बनता जा रहा 
राजनीति का द्वार 

लुभावने वादे, प्रतिज्ञा क्या करार 
वचनो की बस लगी भरमार 
खोखली करते आशाओं को 
समाज के आपसी अनुराग 
या होते रिश्तो के बंद द्वार 

हुआ चलन धर्म के ठेकेदारों का 
धर्म से धर्म को उलझाने का
ज्ञान नहीं तानिक जिन्हे 
कहते खुद को गुरु
कार्य करते दीक्षा दिलाने का
मान अखंड अभिमान सा
भिक्षा में चलन सिर्फ नकदी का 

विश्वास नहीं पर धोखा पुरजोर 
हर इंसान लगे ठगा सा 
शिकायत की राह अति कमजोर 
उलझे सब जीवन रुपी चक्रव्यूह में 
लड़ते हर पल 
एक नयी उलझन का मोड़
प्रति पल द्वंद विचार में विचार
प्रतीत जैसे बंद सब मस्तिष्क द्वार 
 
वक्त आया जागो 
और जगाओ समाज को
न बहको न डरो
बस दूर हटाओ 
इन काल रात्रि के सौदागरों को
रात्रि के बाद की रोशनी सिर्फ सुबह की 
न बहक जाओ दिखते उजालों को 

होड़ न रखो सिर्फ पैसे की
जियो जिंदगी भरपूर
हंसी के सायों में 
इंसानियत हो सिर्फ प्रथम अभियान सी 

रजनीश राय
१८/०७/२०२२
११:३२

रिश्ता दुर्बलता का - आत्मविश्वास

लड़खड़ाते कदमों को आते देख पास
सहम गई हुई वो बदहवास
रात आज सुहाग की
वर्तमान और भविष्य क्या 
सब समक्ष आंखो के पास 

सपने थे जो संग क्या हुए चकनाचूर
अब रात दिन क्या बस रहेगा संग
शायद वो सुना सुना सा अत्याचार 
पल में लगे किस मोड़ पे आ खड़े 
संग चलना हो जाये मुश्किल 
तो छोड़ना भी होगा नामुमकिन 

कुछ सोच मन में जागा एक विश्वास
पिता के कहे शब्द 
उस मासूम मस्तिष्क में गूजँते बार बार
"साहसी को ही मिले सिर्फ कठिन राह"

कर के प्रण लिया संग पति का विश्वास
मात पिता की दे दुहाई 
प्रेम की भाषा को शूल बनाए
क्या कमजोर आप
या मजबूर ये मद्य मोह सताए
ऐसी कुछ प्रेरणा कुछ संगत देती
संग संग गुजारे हर क्षण
प्यार से कुछ वचन कहलाती 
कभी ईश को रख संग भक्तिमय कहलाए
जरूरत पर पुनर्वास केंद्र भी आए
हो कुछ भी अंजाम
पर मन में ये ठान 
सब को दिया चौका 
मद्यपान की आदत को भुला  
दुर्बलता से दृढ़ता का रिश्ता बना 
वह इंसान एक प्रगति की राह चला 

चाहे कहो स्वार्थ इसे 
चाहे कहो आत्मविश्वास 
चाहे कहो प्यार 
चाहे हो संगिनी का साथ 
हुए सब मुश्किलों से पार  
अंतत एक सुखमय परिवार 


रजनीश राय 
३१/०५/२०२२ 
१४:१७ 


वक्त को बांटो - क्यारी क्यारी - आत्मविश्वास

चुनौतियों से भरे इस जीवन में 
हम आये बन एक परिंदा 
कभी दबे कुछ बोझ तले 
कभी उठना तो कभी गिरना 
फिर स्वछंद सा इस आसमान में उड़ना 
हो जीवन ऊँचा जैसे अम्बर अपना 

हुई शादी की बात पक्की 
सोच हर पल मस्तिष्क
ब्याह एक दिन 
फिर संग बाल गोपाल भी 
हमारा जीवन  
सिर्फ गृह धर्म 
क्या चार दीवारी तक सिमित 

आज इस सोच को बदलना 
पहली जरुरत हर नारी की  
गर है आत्मविश्वास 
हम भी रचेंगे इतिहास 

हर क्षेत्र में आज स्पर्धा 
क्या पुरुष क्या नारी
सोच को करो विकसित
सिर्फ इतनी सी है जिम्मेदारी 
संग रखो सूझ बुझ का 
वक्त को बांटो 
क्यारी क्यारी 

दायित्व का अनुभव संग 
फिर क्यों डरे हम 
कार्य गृह से या हो दफ़्तर 
करो कोई व्यवसाय या 
कुछ ऑनलाइन या कंप्यूटर 
कर्तव्य को बाटना 
सिर्फ हो पहल हमारी 

इस कोरोना रुपी भय ने 
न जाने कितने 
नारियों के व्यवसाय खाये 
समय बदला अब 
क्यों न कुछ करें ऐसा 
लाख कोरोना भी न हमें हटा पाए 

सब को संग ले चलना 
एक उदारहण बन बताना है 
सब में अचूक नारी शक्ति 
देश को यह विश्वास दिलाना है 

पंक्तियाँ लिखता सँजोता हूँ   
आज नारी संग देश खड़ा 
देश को संजोये हर नारी 

रजनीश राय 
०१/०६/२०२२ 
१९:१७ 

सोचें किस डगर ले पार - Atamvishwas

चले सब मित्र कुछ अलग मन में ठान 
हम हुए संग सोच करे कुछ ऐसा काम 
हुई शिक्षा समाप्त अब जुड़ने का आया 
समय इस समाज संग उम्र तमाम 

खुशी का आलम एक आज़ाद पंछी सा 
ह्रदय की तह में उमंग आपार
हर एक मित्र सोचे किस डगर ले पार 
असमंजस माहौल स्थिर सब करें विचार 

मित्र ने लिया निश्चय चिकित्सक बन, स्वस्थ बनने को दे अपना योगदान 
कुछ मित्रों ने व्यवसाय किसी ने अभियंता को लिया थाम 
किसी ने नौकरी को समझा उचित, कोई संग सरकारी विभाग 
तो कोई सोचे राजनीति महान 

सब को देखा सब कुछ सोचा, आज खड़े हम वह रास्ते 
जिसको थामना उम्र तमाम, क्यों है सोच गहरी क्यों मन अशांत 

आया जहन में प्रेम देश का, हममें जो प्रति दिन है जीवंत प्राण 
राष्ट्रगान करते रोम रोम में, भक्ति से अपने भारत को प्रणाम 
सोचा न द्वितीय क्षण भर, लिया सैन्य बल को थाम 
हो सुरक्षित हर शख्स, बस मन ले एक यही अरमान 
अंदर सुरक्षित तो सोचे सभी, आज सिर्फ उनकी बदौलत हम 
हमको भी बनना है ढाल, क्यों न हम भी इस डगर को ले थाम 

नौजवानो रखो सोच आप भी, देश को चार क़दम आगे है लाना 
आना आपका फ़ौज में, मुमकिन सब को सुरक्षित है रख पाना 

हर मां बाप की दुआ में शामिल
वादे में बहनों के हमेशा काबिल
निकले जिधर से मिले सलाम
जिए जब तक रहे शान
गर हुए शहीद तो बने देश की शान।

रजनीश राय 
१३/१२/२०२१ 
१७:२७ 



खोखली हंसी - Atamvishwas

आज बैठे कुछ सोचते हम 
देख मित्र के पिता की खोखली हंसी 
दिन याद अभी भी न भूले 
विदेश को भेजने का प्यार और खुशी
 
शब्दों को रख मन में जस के तस 
अंतरात्मा मित्र को टटोलती कुछ बोलती  
क्या रखा इस देश में बेटा 
जाओ जा कर तुम भी दौलत कमाओ 

आया वह दिन था जिसका इंतज़ार 
चला मित्र विदेश उमड़ा जन अपार 
बधाई का लगा ताँता, मात पिता हर्ष फुले न समाये 

वक़्त बिता उम्र से भला कौन जीता 
किन्तु माँ का ह्रदय सिर्फ माँ ही जाने 
लगी तलाशने पुत्र वापिस आने के बहाने 
थामे विवाह की जिद, आया पुत्र खुशी अनंत 
हमको भी दिन याद आये पुराने याराने 

समय की करवट या दिल में  
कौन या क्या छुपाने की आहट 
शब्दों को तोल वादा जल्द आने का 
नव विवाहिता को लिया संग 
करके अभिनन्दन सबको चले विदेश द्वार   

वक़्त चला माँ ने खोयी आस 
आस की राह खामोश भी हुई साँस 
नवजात शिशु से विदेश में खिली किलकारियाँ 
पिता अकेला यहाँ, संग सिर्फ तन्हाईयाँ 

आया संदेश पुत्र का आ जाओ आप भी इस पार
बेच तमाम घर द्वार पिता खुश चला पाने को प्यार
अंचभित सा पाया खुद को वहां 
सब है वहां पर वक्त है कहां, न दोस्त न रिश्ते
सिर्फ फ़ोन पर दोस्तों संग वह खोखली हंसी 

ढूंढता खुशी के पल हर लम्हा कहीं संग सिर्फ है तो फिर वही तन्हाई 
सोचते क्या दौलत संग है तो खुशी या खुशी दौलत से बढ़कर कहीं 

आज देते सलाह नयी पीढ़ी को 
पैसा भी जीवन का चक्र, रहो संभल कर 
हावी न होने दो कभी खुद पर 
दौलत हो आपार, हो संग अपनों का प्यार
दुगना हो जीवन का आधार

माँ बाप है ख़फ़ा - आत्मविश्वास

आज के बच्चे या युवा
क्यों हर माँ बाप है ख़फ़ा 
वह संग विश्वास का क्यों है जुदा 

बहता नीर यूं नदियों का 
बनता संग रास्ता स्वयं उन लहरों का 
न रहती कभी नदी या कभी सागर विचलित 

इच्छा है  कुछ अलग पाने की 
कुछ अलग कर जाने की 
जैसे हर सोच नयी
फिर हममे क्यों विश्वास की कमी   

करते बात इक्सवीं सदी की 
सोच बीते समय की  
दोनों का मिश्रण
पाए सिर्फ मायूसी 

करो विश्वास हर युवा पर 
बच्चों की सोच पर 
खुला मैदान 
या खुला आसमां
दो मौका हर खूबी को 

दौर आज विश्वास का 
दो सबक सिर्फ आत्मविश्वास का 
फ़र्ज़, प्यार के संग 
बच्चे क्या हर युवा के संग जुड़ जाओ   

रजनीश राय 
०३/०६/२०२२ 
१४:३१ 
  

देश का वर्तमान - Atmavishwas

उठाते ही समाचार पत्र आज का 
झोंका निकला एक मूर्छा का 
महिला खेल योद्धा, थामा आँचल मौत का 
प्रसिद्धि की न कोई कमी, शौर्य था कूटकूट कर भरा 
क्या था कारण न जाने, क्या कमजोर या बहादुर संज्ञा कोई 

खेल जगत में या मनोंरजन पट में  
शिक्षा क्षेत्र या और कुछ प्यार में 
न जाने कितने युवाओं ने 
लगाया असमय गले मौत को 
अधूरा जीवन क्या अधूरे सपने 
सब कुछ अधूरा, खुद हारे हिम्मत 
न बन पाए किसी के सहारे कोई 

क्या सोच जो बनाती कायर 
निडर जवां बनते इतने कमजोर 
अवसाद, खिन्नता, या डिप्रेसन 
एक गहरा अंधकार 
राह न दिखती कोई और 
कुछ न सोच थामे बस मृत्यु की डोर  

आज बहुत व्यथित मन, सोच देश का वर्तमान
युवा है आज भारत की शक्ति, खुद क्यों है आज युवा परेशान 

देश को आगे लाने की कितनी योजनाएं 
आये हम प्रथम हर होड़ में 
लो युवाओं की भी सुध, ये देश से बड़ी प्राथमिकताएं
इस विषय पे शोध कर युवाओं को चेताये 

नौजवानों से करे प्रार्थना, न थामे इस राह को 
मन में रखो खुद्दारी, और देश से प्यार  
उपकार मात पिता का, भविष्य को ढालना शिक्षक का  
हर अंधकार के बाद रौशनी का 

मृत्यु तो अटल 
अंतिम पड़ाव जीवन का 
आरंभ को न लगाओ विराम 
छूटे आरंभ को करो प्रारंभ 
मन से त्याग हर मोह अंधकार का 

रजनीश राय 
२०/१२/२०२१ 
१९:०७  

आजाद पंछी सा - Atamvishwas

हुआ समापन विद्यालय अंश का 
प्रसन्न ह्रदय उल्लास में, खुशियां ऐसी की छुपे न छुपे 
मुक्ति विद्यालय पोशाक से, होगा संग नए दोस्तों का 

यूं होगा एक अलग समां, आजाद पंछी सा प्रतीत 
सोच कर ही मन हो प्रफुल्लित, बजे वाद्य दिल में अनगणित 
पहला दिन कदम कॉलेज में, तकते गलियारे असमंजस  
आयी आवाज एक पीछे से जोरदार, पाँव रुके असंख्य विचार 

पलट देखा पाया वरिष्ठ छात्रों को 
इशारा करते हाथ से पास बुलाया 
हम डरे सहमे आवाज में कम्पन 
क्या है माजरा कुछ समझ न आया 

क्या नाम क्या जाति, क्या शौंक कितना है ज्ञान
हम भौच्चके से बस सोचते सुन यूं प्रश्नों की कतार तमाम 

नहीं है पता तो इधर आइये, सामने आती छात्रओं से 
माफ़ी मांग कर बताइये, नहीं मिली गर माफ़ी तो 
सजा के पात्र बन जाइये 

हम ने सोचा चलो क्या कसूर 
जो हम डरे, क्यों न माफ़ी मांग 
इस दुविद्या को करें दूर  
मुस्कुराते आती छात्राओं को 
किया अभिवादन संग माफ़ी मांग  
जवाब में गुस्से में दुत्कारा हमे
हम देखते शर्मसार, कभी उनको तो कभी दोस्तों को  
५ दफा पांचवी मंजिल की सजा की याद करती पसीने में तरबतर 

हम चले कक्षा में, मुख पे अनजाने भाव 
हँसता हर एक चेहरा, हालत देखकर 
आये घर कमरे में खुद को एक कोने में समेट कर 
लगा बहुत समय खुद को वापस पाने की जंग 
कहीं ऐसे छात्र भी जो हुए आत्महत्या के संग 

सोचते हम क्या है यह सजा, क्या अपराध किये हम 
शिक्षा के लिए विद्यालय से, क्यों रुख महाविद्यालय का किये हम 

विनती आज के वरिष्ठ छात्रों से, ये खेल रैगिंग का करो बंद 
शिक्षा का केंद्र है विद्यालय, रहने दो इसे सिर्फ शिक्षा का केंद्र 


रजनीश राय 
१५/१२/२०२१ 
१९:१७ 

Monday, May 9, 2022

रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया = कलम बेजुबां

सच्चे दिल की गहराइयाँ सा 
बचपन था वह हसीं 
खुशी जिधर तक दिखे जमीन
प्यार ममता का एक तोहफा 
मातृ प्रेम सा लगे वह
या कुछ समांतर सा पाया
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

हम चले वक्त चला 
प्यार अठखेलियों में हर समां बंधा 
रूठना मनाना कुछ सताना सब आया 
शिक्षा चली संग संग 
हर मौसम बहार एक नया त्यौहार आया 
वक़्त किधर गया किधर आया 
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

हम दो भाइयों ने सबसे खूबसूरत 
रक्षा बंधन पर्व पाया
वादा जो हम करते बहना से 
सदा करेंगे रक्षा तुम्हारी 
उलट सदा बहना ने वो वादा निभाया
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

बेटी पराया धन 
बहना पर भी यह मुहावरा आया 
हुए हाथ पीले संग रची मेहँदी 
खूबसूरत रूप में एक नेक इंसान
जीजाजी रूप में पाया
प्यार का यह अटूट बंधन
इतना है पावन शब्दों को बहुत कम पाया 

वक़्त कुछ कदम आगे आया 
प्यारा सा पुत्र और शरारत की मूरत 
एक पुत्री को भगवन से 
आशीर्वाद रूप में पाया 
खुशियों का जहाँ सिर्फ 
रिश्ते में परिभाषित बहना, बहू ,गृहणी और माँ
में सब का समावेश पाया 

रिश्तों की डोर और मजबूत 
वह नन्ही बहना वह प्यार का भंडार 
कुछ भी न बदल पाया 
आज भी अटखेलियों सा बचपन 
हमेशा साथ पाया 
किस्मत है हमारी प्यार स्वरुप 
प्यार बहना का हमेशा संग पाया 
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

पड़ता है फर्क # कलम बेजुबां

एक नन्ही परी यूं लगे जन्नत से उतरी 
देख निहारते सभी 
लगे खिलौना कभी कभी 
हँसी में जिसकी चंचलता 
सब के दिल की वह नूर

वक़्त ने ली करवट 
नन्ही परी उम्र लड़कपन 
हंसी की वह बातें 
वह छेड़ना सब को आते जाते 
लगे समय बन पहिया दौड़े 
सब का दुलार पाते पाते

अव्वल शिक्षा 
हर शिक्षक से प्रशंसा 
और सब का प्रोत्साहन पाया 
हुई शिक्षा समाप्त 
उत्तीर्ण हर परीक्षा में 
ऊँचा एक ओहदा पाकर  
माता पिता को गौरान्वित करवाया 

चलते सब के संग  
जवानी की दस्तक आये द्वार  
बचपन लड़कपन छूटा उस पार 
एक नौजवान 
मात पिता संग शुभ कदमो से 
शुभ विवाह की रीत से 
हाथ गौरी का संग पाया 

हम क्यों कुछ सोचे गलत
जब सब है उचित
कविता अति मोहक
पर संदेश क्या दिया हमने बन लेखक

जन्म बालिका तुम्हे उपहार
बालिका भूर्ण हत्या न सही विचार
मां का न भूलो उपकार
बहना का अमोघ प्यार
पत्नी बन जीवन व्यवहार
नारी सहनशीलता की सोच से पार
वक्त आए तो बने कटार
शिक्षा उचित और प्रेम गर मिले आपार
माता पिता भाई या पति सहयोग परस्पर
पड़ लिख कर बेटियां 
संग बड़ाए कदम तो पड़ता है असर
हां पड़ता है फर्क





   

खुद पे आई जब वो बात = कलम बेजुबां

क्यों हुए हमसे वह नाराज़ 
बना एक गहरा राज 
प्यार में क्या हुई कोई बात 
हम बने इंसान जिनके लिए 
क्यों चले आज चुरा कर आँख 
गए शहर भी छोड़ दे गम ए सौगात

वक़्त चला हम भी चले  
ओढ़ी चादर यादों की 
ख़ामोशी संग हुआ याराना 
दिन ढले रात चली
पलक मूंदे तो दिखे स्वपन में
हँसे तो खुशी का एहसास कम 
लगे जैसे कोई आस पास होकर भी गुम

पर न जाने आज क्यों है बेचैन मन
सोचता हर पल वह बीतें क्षण 
आयी हवा संग खुशबू पहचानी सी 
नेत्र लगा यू जागे नींद से
जब देखा पलट हुए स्तंभ
घर वापिस आते उनको देख हुए दंग
उत्सुकता से बड़े कुछ कदम आगे 
आते देख संग डॉक्टर कदम गए सहम 

वीरांगना सी लड़ती कैंसर से 
हर दिन एक नई उम्मीद बन
लगता कहीं और थे अटके प्राण
जैसे नयनों को एक आस तमाम
यूं हर तरफ एक चर्चा बनी आम 

बेचैन मन कर के हिम्मत पहुंचे जब पास
मां को कर इशारा भेज बगल के कमरे में
बंद होंठों से बुबुदाते 
ले प्यार से हमारा हाथ थाम
माफ करना हमको ये थी सच्चाई
जिसे रखा हमने छुपा अपने पास
कह चंद शब्द गौरी ने ली आखरी श्वास
तकते हम जमीन गरम अश्रु ने दी आहट
रो कर भी न रो सके हम
आज खुद पे आई 
जब वो बात।।

रजनीश राय
२२ नवंबर २०२१

नसीब में सबके हंसी नहीं होती - कलम बेजुबां


सूखे पत्ते गिरने पर मलाल न करना
सपने गर अधूरे रह जाए 
तुम शिकायत न करना
नसीब में सबके हंसी नहीं होती
हर हंसी में खुशी नहीं होती
आंसू छुपा लेते है गम
पग पग मंजिल को ढूंढते रास्ते संग संग
किधर जायेंगे या जाएंगे थम
पर मुकाम की ख्वाइश कम नहीं होती
क्योंकि नसीब में सबके हंसी नहीं होती

टूटते यूं ख़्वाब आस के 
गिरते सूखे पत्ते यूं शाख से 
नित देखते रहते उस राह को 
अब लगे जैसे किश्ती बिन पतवार के 
पीते हम भी बेपरवाह से
पर नशे की कोई भनक नहीं होती
फिर तकते उस राह को
मुकाम की ख्वाइश कम नहीं होती
जैसे नसीब में सबके हंसी नहीं होती

आँखों का गम 
शायद न समझ सका कोई 
हंसे तो सब क्यों हंसे
रोए तो सब चल दिए कहीं 
हुआ कमजोर अब तो दिल भी
छोटी सी चोट भी सहन नहीं होती
दिल करे रुलाने का तो रूला दो
रोने के बाद हंसी अपनी सी नही होती
नसीब में जैसे सबके हंसी नहीं होती

दिन चढ़ता रात ढलती
कभी मुश्किलें आसान नहीं होती
निकल न पाते इस मोहपाश से
जितना करते संग खुद को
दूरी बढ़ती और करती अलग मुझको
चिराग तले अंधेरा तो है कभी भी
रोशनी भी अंधकार को कम न करती
अब तो लगे सत्य नसीब में हंसी नहीं कोई

रजनीश राय
२७ अक्टूबर २०२१

कोरा न कर दे लिखाई को - कलम बेजुबां

स्मृतियां पटल पे छाई है ऐसे
स्याही मिट के भी निशान छोड़े जैसे
लिखे है कुछ पृष्ठ अंधकार में 
सुबह की धूप कहीं कोरा न कर दे लिखाई को

रास्ते है लंबे परछाई यूं शाम जैसे
अब न कटते रात दिन 
सर्द जाड़ों की नींद जैसे
यादें भी न जाने कितनी बेहरहम 
लगती है नासूर जख्म जैसे 

हुस्न और इश्क़ हुआ है किसीका जो होगा अपना  
कब चली आये दबे दबे से कदम 
संग संग बेवफाई 
तोड़ती हर एक हसीं सपना 
हम खड़े रास्तों पे 
या रास्तों ने बस किया अपना 
वक्त था किसका जो होगा अपना 

याद है आज भी वह खिलखिलाना 
हँसते से प्यार में गले लगाना 
जिंदगी गुजारेंगे संग संग वादों की लड़ी 
मुस्करा के कनखियों से निहारना 
रख के बालों को खुला 
इच्छा ऐ तारीफ़ 
कुछ इतराना 


लगते है अच्छे अब तो जख्म भी
याद आयेंगे हमें भूल जाने के बाद भी 
हँसते हम खुद को ही दोष दे कर 
सोचते फिर उन लिखे अल्फाज़ो पर  
सुबह की धूप कोरा न कर दे कहीं लिखाई को
लिखे थे जो अंधकार में 
प्यार की कलम में भीगोकर। ... 

रजनीश राय 
१६ नवंबर २०२१ 
 


Monday, January 3, 2022

खोने का गम न करना - Love you Hamesha

पहली मोहब्बत 
या पहली बार धड़का दिल जोर 
देखते उन्हे जब भी
जुबान पड़े कमज़ोर

कुछ कह पाते दिल की बात 
लबों ही लबों में करते इकरार
दिल ही दिल रह गया अफसोस
आज तकते बन रास्ते 
बस एक टक निहारते

आज चले जाते है सामने से
संग दोस्त हमारा यूं इतराता
दिया था भरोसा जिसे 
इजहार ए इश्क
दिल ए जिगर को बताने का 

प्यार करो तो हिम्मत भी रखना
इजहार करना तो खुद करना
कभी किसी दोस्त को न देना
है भरोसा गर इतना तो
भरोसा में खोने का गम न करना।

रजनीश राय
२१ नवंबर २०२१

ये सुबह और संग प्यार की चाय - ek cup chai ya coffee

वो चिड़ियों की चहचहाट 
संग धुप की किरणें 
आना छुप परदे की ओट 
ओस की बुँदे का फिसलन
खिड़की के कांच  
संग शीत लहर की सरसराहट  

आज इतवार बेखबर नींद भी 
स्वपन में आज सिर्फ प्यार ही 
नींद को उड़ाती खुले बालों की खुशबू 
संग दूर आवाज पायल की 
अँखियों को भींचे देख हुए चंचल 
आती प्याली चाय उनके हाथ की 

देखा जो उनको सामने 
आये आँखों संग समय के पैमाने 
न जाने कितने मौसम बदले 
कभी आजमाइश वक्त से 
वह हर लम्हे प्यारे 
दुआ करें बदले कभी न 
उनके प्रति हर वचन हमारे 

ये सुबह और संग प्यार की चाय 
ख़ुशी के पल मोहब्बत के साये 
नज़र न लगे खुद की ही न कभी 
चाहे लाख जले हमसे दुनिंया सभी 

रजनीश राय 
२४/१२/२०२१ 
१९:५५ 

चाय और तुम