Tuesday, August 30, 2022

कशमश हर लम्हा - शब्दों के उस पार

अनजान से रास्ते संग हमारे तकते एकटक
दूर से आती रोशनी बने आशा की झलक 
आज चांद भी प्रतीत चला कह अमावस
कुछ बूंदे भी लगी गिरने जैसे दिल की तड़प

रास्ता हुआ लम्बा कटे यूं उम्र सब खो कर 
रात की स्याही सा कुछ दिखे न आंख खोलकर
आवाज सन्नाटे की जैसे रिश्ते टूटते बनते पलभर  
कुछ वहम आहट का सा जीवन बना हर पल पृथक

स्मृतियाँ पटल पे छायी मोह के धागे बनकर 
पास हो कर भी न हो कोई मृगतृष्णा सा होकर 
संग रह जब न बन पाया अपना सा कोई बनकर 
आज नहीं है संग पर ह्रदय तो विचलित हर पल 

प्यार करते थे हर लम्हा जिन्हे हम दिल खोलकर 
संग रह कर भी न क्या दे पाए हम उन्हें 
कुरेदते हर पल खुद को उलझाकर  
खुशियों की चाहत तकते लम्हा लम्हा 
हर एक दिन कुछ झलक पाने को तत्पर 

मोह की नगरी इस दुनिया में सोचते हर पल 
हमको ही सिर्फ क्यों मिले मोह के धागे बुनकर 
लगाव दिया तो मिले सबको परस्पर 
एकांगी मोह जैसे शापित उम्र न्यूनतर

हँसते हम रहे फिर भी 
या हँसता हम पे समय कभी 
कभी रात को दिन समझकर 
आया दिन तो कहें कब आये रात 
कशमश हर लम्हा हर दिन क्या रात 
बस चलते अंधकार में रोशिनी को समेटकर 

रजनीश राय 
०३/०१/२०२२ 
१८:४४ 

यादें बेपरवाह - शब्दों के उस पार

काश हम कुछ कह पाते
रिश्तों की डोर पकड़ कुछ कदम चल पाते
हर पल बंधे रहे उन बंधनों से
जो शायद हमे कुछ समझ पाते
प्यार की ख्वाइश थी जिनसे
वो बिना कुछ कहे हमे जान जाते

हंसते तो है हर पल
पर खोखली हंसी नही सह सकते
राह न मिले कभी
पर उनके घर का रस्ता नहीं बदल सकते
प्यार से उठ गया भरोसा
लेकिन उन्हे प्यार करना नही छोड़ सकते

आ के यूं पास क्यों मुंह मोड़ लिया
कुछ तो कहा होगा 
कुछ तो सुना होगा
हम देते यूं खुद को इल्जाम
क्या उनके काबिल हमे न पाया होगा..

गम की बारिशों में या करवटों की आहोंं में
इस कदर बदले वो आज हम खड़े राहों में
अश्रु क्या दिखते आंखों में 
ढूंढते सब जिन्हे बरसातो में
लो हम भी बन गए अब अनजान 
यूं मिले वो जब भी राह में

यादें कुछ बेपरवाह हो जाती है
हवा जो ले रुख हमारी तरफ
खुशबू भी उनकी संग ले लाती है
जिक्र जो हो कभी उनका 
जेहन में सलवटे सी पड़ जाती है
कशिश में है उनकी कुछ जादू
दिल का जख्म फिर हरा कर जाती है

रजनीश राय
१५/०६/२०२२
१७:२१

दूर छुपा रखा है - शब्दों के उस पार

जिक्र होता है जब जब
यादें गहरा जाती हैं
गर्म बूंदों सी 
आंखो के कोने से 
बन आंसू बह जाती है
न करेंगे उजागर ये गम 
इसलिए यादें अंदर दफना रखी है

आज हर खुशी में भी 
वो दुख कहीं छुपा रखा है
हो न कभी कोई 
देख हमे उदास 
बस एक ऐसा मन बना रखा है
दुख को कहीं दूर छुपा रखा है

एक एक दिन 
एक एक पल सब है 
आज भी संग यादों का काफ़िला
रहेंगे हम ही सिर्फ संग
न देने कभी उदासी की कोई भनक 
दिल को मज़बूत बना रखा है
दुख को कहीं दूर छुपा रखा है

रास्ता है बहुत लंबा 
हर पल को क्यों कोसे
जब गम को दिल में छुपा रखा है
हर पल बीतते क्या रात क्या दिन
हम लाए न जाने कितने दिन
खुद को भी कुछ यूं समझा रखा है
दुख को कहीं दूर छुपा रखा है

बस बहुत अकेले पाते हैं हम - शब्दों के उस पार

आज भी याद आए जब 
खुद को बहुत अकेले पाते है हम
न जाने क्या सोचकर 
बस खामोश हो जाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

आज न जाने क्यों आती उसकी याद 
दिखे वह हमें हर तरफ 
हम जब आँख मूंदे हर बार 
समय अति गतिशील 
लगा छूट गए अपने कुछ उस पार 
यूं कुछ सोचकर खामोश हो जाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

वह हँसी वह मुस्कारहट  
संग संग जीवन मोह की मीठी आहट  
पर अब रास्ते हुए अंजान 
यूं तकते हम उन राहों को 
बन एक जीवंत पाषाण 
यूं कुछ सोचकर निष्प्राण हो जाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

मुस्कारहट ने छोड़ा साथ कब का 
हुए मतलबी नेत्र संग अश्रु भी 
हँसे कभी तो गिर जाते है 
रोए तो आँखों में टिक जाते है 
हर पल आंखों में चुभन सी पाते है हम 

बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

हुआ सूर्य अस्त लगे कम्पन  
लगता अब डर रात से 
हर एक एक लम्हा आगे बड़े
हम खड़े डरते अपनी परछाई से 
यादों को खुद से जुदा न कर पाते है हम 

खुद को बहुत अकेले पाते है हम
आज भी याद आए जब 
बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।

रजनीश राय
०१/०१/२०२२
२३:४५

न जाने क्यों आज बहुत याद आए - शब्दों के उस पार

शीत लहर ने जैसे दी दस्तक 
 खुली खिड़की की ओट से
आज अपने याद आए सहसा 
जैसे सरकती रेत पल में हाथ से 

बैचनी हर पल अनदेखे अंजाम से
साथ रहकर चला पल में हाथ छुड़ा के
याद आते वो बीते लम्हे
भोली हंसी संग प्यार दुलार के
आती हर ऋतु संग नए मौसम में
पर आंखे ढूंढती अपने से एक चेहरे को

आज न जाने क्यों वो बहुत याद आया
क्या कोई भुला रास्ता उसका में देख आया
लगे हवा भी उसकी महक को दोहराए
वृक्ष भी दे गवाही कुछ सूखे पत्ते को गिराए
हर मोड़ से कोई अपनी सी आहट आए

भय लगे अब रात के आगमन का
वह अनजानी रात के आगमन का
भय सा हर पल कुछ पाकर खोने का

सर्द है आज मौसम बड़ा
जैसे मिजाज़ कुछ बिगड़ा बिगड़ा
हवा भी लगे जिस्म को काटती
संग बूंदों की कुछ आहटें 
बैठ किनारे अग्न के ताप को सेकते
क्यों कब और कैसे के 
प्रश्नों में बस खुद को समेटते 
उत्तर न मिला अब तक कोई 
चल दिए तालाश में फिर 
मन कुछ बुदबुदाते

रजनीश राय
१५/०६/२०२२ 
१७:०३

Tuesday, August 9, 2022

दुआ करते है - Unsaid Feelings

दुआ करते हैं

गलियारे प्रेम के एहसास से 
कुछ अपनेपन की मिठास से 
यादों के झूलों से
बैठे बिन पतवार वाली नाव पर 
गए जब वह पास से कुछ मुस्करा के 

ख़्वाबों की दुनिया 
बहके हर कदम 
मासूम से उस चेहरे पर 
वह नज़र चुराती हर नज़र पर 
चलना मदमस्त सा
हिरण की चाल पर 
बालों की वह घुँघराली लट  
गिरना नयनों के प्यालों पर 
भरी दुपहर दुपट्टा सर पर 
नंगे पाँव भागना गलियारे के गर्म पत्थरों पर 
ठहरे पानी में कूदना बुँदे उड़ती हवा में लहराकर 
क्या कहते इस प्यास को हम न समझ पाए 

शाम ढली हम चले 
आज मिलने अपने प्यार को 
उसको पाकर सामने  
हम भी कुछ मुस्कराये 
न जाने कितने सपनों को सँजो लाये 

शिकवा करते यूं 
हम रात की तन्हाई को
शाम सिर्फ अपनी हो 
चांद का भी पहरा न हो
तारो न गिरना कसम है 
कहीं कोई मांग ले न तुमको
इस भय में समय गुजारते गए

सदियों के सपने सच हो पाए
वो मुस्कराहट को अपना कह गए
सोचा था जिसे सदैव सपनों में
आज अपने हो गए 

वक्त लगा उड़ने लगा कर पंख 
उसके हाथ का वही कोमल स्पर्श 
आज भी सदैव अपने कंधों के संग 
वक्त न जाने कितना आया आगे  
परन्तु हम न आगे जाते है 
न आगे जाना चाहते हैं
वह प्यार वह मिठास संग हवा में घोल 
आज भी सिर्फ मोहब्बत में जीना जाते है 
दुआ है अब तो यही तुमसे ए रब 
न करना कभी हमे जुदा 
बुलाना हो गर कभी 
दोनों को संग ही ले चलना ख़ुदा 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१७:२२