Monday, May 9, 2022

रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया = कलम बेजुबां

सच्चे दिल की गहराइयाँ सा 
बचपन था वह हसीं 
खुशी जिधर तक दिखे जमीन
प्यार ममता का एक तोहफा 
मातृ प्रेम सा लगे वह
या कुछ समांतर सा पाया
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

हम चले वक्त चला 
प्यार अठखेलियों में हर समां बंधा 
रूठना मनाना कुछ सताना सब आया 
शिक्षा चली संग संग 
हर मौसम बहार एक नया त्यौहार आया 
वक़्त किधर गया किधर आया 
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

हम दो भाइयों ने सबसे खूबसूरत 
रक्षा बंधन पर्व पाया
वादा जो हम करते बहना से 
सदा करेंगे रक्षा तुम्हारी 
उलट सदा बहना ने वो वादा निभाया
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

बेटी पराया धन 
बहना पर भी यह मुहावरा आया 
हुए हाथ पीले संग रची मेहँदी 
खूबसूरत रूप में एक नेक इंसान
जीजाजी रूप में पाया
प्यार का यह अटूट बंधन
इतना है पावन शब्दों को बहुत कम पाया 

वक़्त कुछ कदम आगे आया 
प्यारा सा पुत्र और शरारत की मूरत 
एक पुत्री को भगवन से 
आशीर्वाद रूप में पाया 
खुशियों का जहाँ सिर्फ 
रिश्ते में परिभाषित बहना, बहू ,गृहणी और माँ
में सब का समावेश पाया 

रिश्तों की डोर और मजबूत 
वह नन्ही बहना वह प्यार का भंडार 
कुछ भी न बदल पाया 
आज भी अटखेलियों सा बचपन 
हमेशा साथ पाया 
किस्मत है हमारी प्यार स्वरुप 
प्यार बहना का हमेशा संग पाया 
रिश्ते में परिभाषित बहन शब्द आया 

पड़ता है फर्क # कलम बेजुबां

एक नन्ही परी यूं लगे जन्नत से उतरी 
देख निहारते सभी 
लगे खिलौना कभी कभी 
हँसी में जिसकी चंचलता 
सब के दिल की वह नूर

वक़्त ने ली करवट 
नन्ही परी उम्र लड़कपन 
हंसी की वह बातें 
वह छेड़ना सब को आते जाते 
लगे समय बन पहिया दौड़े 
सब का दुलार पाते पाते

अव्वल शिक्षा 
हर शिक्षक से प्रशंसा 
और सब का प्रोत्साहन पाया 
हुई शिक्षा समाप्त 
उत्तीर्ण हर परीक्षा में 
ऊँचा एक ओहदा पाकर  
माता पिता को गौरान्वित करवाया 

चलते सब के संग  
जवानी की दस्तक आये द्वार  
बचपन लड़कपन छूटा उस पार 
एक नौजवान 
मात पिता संग शुभ कदमो से 
शुभ विवाह की रीत से 
हाथ गौरी का संग पाया 

हम क्यों कुछ सोचे गलत
जब सब है उचित
कविता अति मोहक
पर संदेश क्या दिया हमने बन लेखक

जन्म बालिका तुम्हे उपहार
बालिका भूर्ण हत्या न सही विचार
मां का न भूलो उपकार
बहना का अमोघ प्यार
पत्नी बन जीवन व्यवहार
नारी सहनशीलता की सोच से पार
वक्त आए तो बने कटार
शिक्षा उचित और प्रेम गर मिले आपार
माता पिता भाई या पति सहयोग परस्पर
पड़ लिख कर बेटियां 
संग बड़ाए कदम तो पड़ता है असर
हां पड़ता है फर्क





   

खुद पे आई जब वो बात = कलम बेजुबां

क्यों हुए हमसे वह नाराज़ 
बना एक गहरा राज 
प्यार में क्या हुई कोई बात 
हम बने इंसान जिनके लिए 
क्यों चले आज चुरा कर आँख 
गए शहर भी छोड़ दे गम ए सौगात

वक़्त चला हम भी चले  
ओढ़ी चादर यादों की 
ख़ामोशी संग हुआ याराना 
दिन ढले रात चली
पलक मूंदे तो दिखे स्वपन में
हँसे तो खुशी का एहसास कम 
लगे जैसे कोई आस पास होकर भी गुम

पर न जाने आज क्यों है बेचैन मन
सोचता हर पल वह बीतें क्षण 
आयी हवा संग खुशबू पहचानी सी 
नेत्र लगा यू जागे नींद से
जब देखा पलट हुए स्तंभ
घर वापिस आते उनको देख हुए दंग
उत्सुकता से बड़े कुछ कदम आगे 
आते देख संग डॉक्टर कदम गए सहम 

वीरांगना सी लड़ती कैंसर से 
हर दिन एक नई उम्मीद बन
लगता कहीं और थे अटके प्राण
जैसे नयनों को एक आस तमाम
यूं हर तरफ एक चर्चा बनी आम 

बेचैन मन कर के हिम्मत पहुंचे जब पास
मां को कर इशारा भेज बगल के कमरे में
बंद होंठों से बुबुदाते 
ले प्यार से हमारा हाथ थाम
माफ करना हमको ये थी सच्चाई
जिसे रखा हमने छुपा अपने पास
कह चंद शब्द गौरी ने ली आखरी श्वास
तकते हम जमीन गरम अश्रु ने दी आहट
रो कर भी न रो सके हम
आज खुद पे आई 
जब वो बात।।

रजनीश राय
२२ नवंबर २०२१

नसीब में सबके हंसी नहीं होती - कलम बेजुबां


सूखे पत्ते गिरने पर मलाल न करना
सपने गर अधूरे रह जाए 
तुम शिकायत न करना
नसीब में सबके हंसी नहीं होती
हर हंसी में खुशी नहीं होती
आंसू छुपा लेते है गम
पग पग मंजिल को ढूंढते रास्ते संग संग
किधर जायेंगे या जाएंगे थम
पर मुकाम की ख्वाइश कम नहीं होती
क्योंकि नसीब में सबके हंसी नहीं होती

टूटते यूं ख़्वाब आस के 
गिरते सूखे पत्ते यूं शाख से 
नित देखते रहते उस राह को 
अब लगे जैसे किश्ती बिन पतवार के 
पीते हम भी बेपरवाह से
पर नशे की कोई भनक नहीं होती
फिर तकते उस राह को
मुकाम की ख्वाइश कम नहीं होती
जैसे नसीब में सबके हंसी नहीं होती

आँखों का गम 
शायद न समझ सका कोई 
हंसे तो सब क्यों हंसे
रोए तो सब चल दिए कहीं 
हुआ कमजोर अब तो दिल भी
छोटी सी चोट भी सहन नहीं होती
दिल करे रुलाने का तो रूला दो
रोने के बाद हंसी अपनी सी नही होती
नसीब में जैसे सबके हंसी नहीं होती

दिन चढ़ता रात ढलती
कभी मुश्किलें आसान नहीं होती
निकल न पाते इस मोहपाश से
जितना करते संग खुद को
दूरी बढ़ती और करती अलग मुझको
चिराग तले अंधेरा तो है कभी भी
रोशनी भी अंधकार को कम न करती
अब तो लगे सत्य नसीब में हंसी नहीं कोई

रजनीश राय
२७ अक्टूबर २०२१

कोरा न कर दे लिखाई को - कलम बेजुबां

स्मृतियां पटल पे छाई है ऐसे
स्याही मिट के भी निशान छोड़े जैसे
लिखे है कुछ पृष्ठ अंधकार में 
सुबह की धूप कहीं कोरा न कर दे लिखाई को

रास्ते है लंबे परछाई यूं शाम जैसे
अब न कटते रात दिन 
सर्द जाड़ों की नींद जैसे
यादें भी न जाने कितनी बेहरहम 
लगती है नासूर जख्म जैसे 

हुस्न और इश्क़ हुआ है किसीका जो होगा अपना  
कब चली आये दबे दबे से कदम 
संग संग बेवफाई 
तोड़ती हर एक हसीं सपना 
हम खड़े रास्तों पे 
या रास्तों ने बस किया अपना 
वक्त था किसका जो होगा अपना 

याद है आज भी वह खिलखिलाना 
हँसते से प्यार में गले लगाना 
जिंदगी गुजारेंगे संग संग वादों की लड़ी 
मुस्करा के कनखियों से निहारना 
रख के बालों को खुला 
इच्छा ऐ तारीफ़ 
कुछ इतराना 


लगते है अच्छे अब तो जख्म भी
याद आयेंगे हमें भूल जाने के बाद भी 
हँसते हम खुद को ही दोष दे कर 
सोचते फिर उन लिखे अल्फाज़ो पर  
सुबह की धूप कोरा न कर दे कहीं लिखाई को
लिखे थे जो अंधकार में 
प्यार की कलम में भीगोकर। ... 

रजनीश राय 
१६ नवंबर २०२१