Friday, July 16, 2021

वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

लगे वक्त हसीं की परिभाषा को समझने में
सुंदर हृदय के उस प्यारे से स्वप्न मे
रह के कुछ अपना खोना उस लगाव में
सब कुछ रह के भी न पाया इस जज़्बात में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

दिन ढलता मौसम बदलता यू अपने चक्र मे
न बदला अपना मौसम रहा दिन ढलने में
मुस्कुराने का प्रयास करे एक एक शब्द में
शब्द बने पराए करे बोझिल हर एक प्रयास में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

कुछ सोचकर ली सांस ग्रीष्म पवन साथ में
पलके मूंदे करें विचार नयन नीर हुए साथ में
प्रयास हर पल छोड़ आगे बढ़ना इस संसार में
चार कदम क्या चलें हम पर परछाई साथ में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

बालपन से करें भ्रमण यादें न कोई सरहद में
समय के बंधक निशब्द इस ममता के बंधन में
नेत्र प्यासे उन जीवंत पलों को दोहराने में
समय चक्र काश विपरीत चले मोहपाश में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

खुशी, दुख, ममता, मोह, गुस्से या प्यार में
जीवन परिचय अति कठिन समझा में
जीवंत परीक्षा से जीवन मे
रहे हमेशा असफल या निरुत्तर में
कुछ प्रश्न सिर्फ पंक्तियां बन रह गए 
जैसे ... वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

रजनीश राय
16.07.2021

Saturday, July 3, 2021

आपका स्वपन लेकर

आपका स्वपन लेकर ~ Post 22

 

मातृ प्रेम पर चन्द पंक्तियाँ लिख कर 

सम्मान करें ममता या मातु प्रेम का

कुछ इस तरह सम्बोदित हुआ एक लेखन पर 

हृदय उठी उमंग सोच इस गरिमा का 

हाथ कलम ली सोच बचपन की 

प्यार दुलार कभी गुस्सा कभी मार 

खिलखिलाते उस बचपन के दिन चार 

पूछते प्रश्न यूं बार बार 

उत्तर मिले न चिड़न न गुस्सा एक बार

समय की गति निरतंर तेज हुए हम जवान 

मातु प्रेम ममता या दुलार न मात्र कम हुआ आकार 

किन्तु लिखते पंक्तियाँ रहे हाथ क्यों काँपकर

मातृ प्रेम का बोध विचार क्यों गए ह्रदय भेद कर  

सच कहें या ह्रदय की सोच कुछ तो बोध लेकर 

लगे वर्तमान के पन्नों को कुछ पढ़ने 

ताना झगड़ना या मालूम नहीं की संज्ञा देकर 

जिन हाथो ने दौड़ना सिखाया उन्हें छोड़कर

क्या लिखे मातु प्रेम पर लेख इस विराम को संग लेकर 

कुछ हम न कर पाए पर दे ज्ञानं क्या सोचकर 

प्रेम से जिन्हे प्रेम उन्हें कहें जीवन अति सूक्षम 

जियें उस प्रेम को भी हमेशा 

जो जीवन समर्पण सिर्फ आपको स्वपन लेकर .

सिर्फ आपका स्वपन लेकर। ...


रजनीश राय

15.07.2021