ह्रदय वेदन। ......... माँ पिता का ऋषब को समर्पित
फिर भी सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया। ....
कुछ विशेष सा जब इस धरती पे कदम पाया।
स्वेत सा रंग संग में मोहक सी मुस्कराहट लाया।
बालपन में क्रीड़ा से शरारत स्वाभाव पाया।
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया।
प्रति क्षण बस स्वछंद सा जीवन अपनाया।
अहकार न द्वेष किसी से कभी मन में लाया।
हर दुख दर्द सब के एक नन्हे ह्रदय अपनाया।
एक शब्द कहे कुछ ऐसा बस स्वाभाव पाया।
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया।
उम्र लड़कपन जब कदम बढ़ाया।
हर कदम श्रेष्ठ हर नयी उमंग अपनाया।
न करना स्वभाव न पाया प्रथम को प्रथम अपनाया।
नयी उमंग नयी सोच न घबराया।
प्रति क्षेत्र को न विळम्ब अपनाया।
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया।
रहा आजाद प्रकृति का न थकान को अपनाया।
निद्रा में बेचैन प्रातः को एक नियम बनाया।
हर नियम मेहनत कभी न घबराया।
हर आज्ञा आदेश को न ठुकराया।
न थकने वाला शख्श खुद को बनाया।
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया।
मातपिता संग कुछ न कहने की एक आदत लाया।
सब कुछ जल्दी इस पे एक कदम बढ़ाया।
उम्र से खुद को आगे ले आया ।
न थकने की राह ने किधर भटकाया।
उस राह को पिता अभी भी समझ न पाया।
कुछ हुआ बस यूं समाप्तः की क्या खोया क्या पाया।
वह निडर सा बालक लाल रथ संग पुष्प लिटाया।
फिर भी निर्मल ह्रदय न विश्वास आया।
यू उठे बेचैन पुत्र कहे मुझे यहाँ कौन लाया।
आस अंतिम विदाई तक पिता ने लगाया।
लगे राम को सत्य मन को झुटलाया।
अंतिम अग्नि पिता से यूं कष्ट पाया।
क्या निभा पाया या न पाया पिता कुछ समझ न पाया।
फिर भी उम्र तमाम सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया।।।।।।