Monday, November 19, 2018

सोचते हर पल - 2 Post-17

सोचते हर पल - 2

जवां हुआ पुत्र कदम उन्नीस में
पिता के कद सा माँ के नूर में
ख्याइश को जोड़ता हर श्वास में
स्वपन हो सत्‍य दिल एक आस में

पर उम्र लिखा लाया यूं जज्बात में
दिया ग़म जीवन भर उम्र के इस पड़ाव में
क्या सोचते थे क्या है पाया
हुए किनारे प्रतित नयन खुले सैलाब में

सोचते हर पल
क्या चाह रहे थे हम
वक़्त किधर निकला
अच्छे वक़्त के इंतज़ार में
बुरा वक़्त सब कुछ ले निकला...

Post : 17
रजनीश राय
Written : 20.11.2018
©rajnishrai

Monday, August 20, 2018

गुमसुम..... Post-16

शांत मन गुमसुम हो गया
दिल के जो था पास
बस कहीं गुम हो गया
हर खुशी हर ख्वाहिश
बस हाथ से छीन ले गया
जीवन का ध्येय
लक्ष्य हीन कर गया

यूँ लगे वो आस पास है
हटती नहीं जो एक आस है
सत्य पर झूठ का मोहपाश है
लगे झूठ एक अटूट विश्वास है

हर खुशी में एक याद बन रह गया
शांत था मन बस गुमसुम बन रह गया...

Post-16
रजनीश राय
Written 20.08.2018  @ 11:30pm
©rajnishrai

Wednesday, August 15, 2018

ग्रहण..... Post-15

कुछ सोचा लिखें ली कलम हाथ
आस के प्रवाह यूं निराशा हुई साथ
संग थे कईं रँग कईं हर पल साथ
हसीं थी कहीं खुशियाँ थी खास
जीवन गति न अवरोध न खट्टास
समय बदला लगा यूं कोई मजाक

कम हुई खुशियाँ ग्रहण हो कोई
हाथ की लकीरें कहें यूं अनजान कोई
दिशा बदल यूं अंचभित हुई
ह्रदय हुआ अनजान न जाने कोई

अनेक सवाल न मिले जवाब कोई
लुप्त हुआ सुर्य अंधकार में कहीं
समाप्तः हुई लहरें समंदर में कहीं
रुकी यूं हवा सहमा हो कोई
आँख कहे अब नीर न शेष कोई

सब है साथ पर तुम सा न कोई
यादें है बस साथ जैसे परछाई कोई 
संग थे जो अपने न जाने रहते है कहीं
आस की दिखे या मिले
बस एक बार वो मासूम चेहरा कहीं

Post - 15
Written : 14.08.2018  12:50 pm
रजनीश राय
©rajnishrai

Saturday, August 11, 2018

सोचते हर पल.. Post - 14

सोंचते हर पल
क्या चाह रहे थे हम
वक़्त किधर निकला
अच्छे वक़्त के इंतज़ार में
बुरा वक़्त सब कुछ ले निकला
खमोश हुई सब राहें
जहां से कभी बेप्रवाह हर बार निकला
उम्मीद की हर कड़ी में
सब कुछ बिखरा निकला
इतनी खुशी ना चाह हमे
पर दुख बेहिसाब निकला..

Post 14
Written : 11.08.2018
रजनीश राय
©rajnishrai

Friday, June 15, 2018

सुबह शाम की चिंता.. - post-13

चला सूर्य अपनी राह
दे अंधकार को नयोता
यूं पंछी तकते अंधकार को
सोचे कुछ समय और होता
न दाना पर्याप्त बाल भूख में सोता
बस रात्रि पहर की चिंता
दिन उगता और बस यूं ढलता
तार कंटीली सा पहर लगे 
बस रहे शाम की चिंता
कुछ सुबह शाम की चिंता.....


अशांति की चादर ... उम्र तमाम

ह्रदय वेदन। ...

कराहता दिन निकला बीती दर्द में साँझ।
सूर्य चला अस्त को अंधकार सौंप सब काम। 
आँख हुई नम देख हुआ हृदय परेशान।
रात्रि आँख रोये सुबह तक न करे आराम।

सोचते क्योँ समय लाया एक चौराहे गुमनाम।
पल पल हृदय पूछे क्या हुआ कुछ अपराध अनजान।
खुशियाँ सिर्फ मांगी न माँगा जग तमाम।
हर क्षण उदासी मिली या ह्रदय परेशान।

नयन तकते है जिन्हे चले किस धाम।
प्रत्येक पंछी घर लौटे संध्या कर कार्य तमाम। 
जब आये घर अपने लगे सब अशांत।
पर अपने न आये तकते नयन सुबह शाम।
सब चेहरे कुछ ढूंढे कहते यह नयन अंजान

स्वपन नहीं दुस्वपन सच्चाई अब तो कहा मान।
वर्तमान को न माने सत्य यह ह्रदय अनजान 
प्रत्येक प्रसनता अस्त हुई यूं जीवन निष्प्राण।
अशांति की चादर ओढे निकले उम्र तमाम 
उम्र तमाम सब अशांत, अशांत। .... 

रजनीश राय 
१५ जून २०१८ 

Friday, June 1, 2018

बस पुत्रशोक मिला उधार........

ह्रदय वेदन  (माँ /पिता )
बस पुत्रशोक मिला उधार।

हर चहरे में एक चेहरे को तलाशती आँखे।
आँखों में है नीर भरा दिखती सिर्फ नम आँखे।
दुःख दर्द सहज अत्यंत कुछ न कहती आँखे।
अपना दुःख सिर्फ सिमित रख बस यूं सहमी आंखे।
दस्तक गर हुई द्वार तो पल पल कुछ तकती आँखे।
शायद आया पुत्र माँ यह आस लगाती आँखे।

नयन तकते राह एक तेज से प्रवाह को।
गति के गतिमान प्यारी सी मुस्कान को।
चेहरे में एक नूर माँ के दुलार को।
नयन से छुप कर हॅसने वाले लाल को।
चलते गिरते बालपन के उस मस्तचाल को।
सब कुछ माँ से कहने वाला ऐसे गोपाल को।
 
मित्र पग पग चले अब क्यों नहीं आते मिलाने को।  
जवान कद या एक निखरे रंग के नज़रने को।
आसमान निगला या राह के बने निवाल को।
हम ने खोया जग ने छिना या ईश की चाह को।
सब कुछ हुआ यूं शांत हम मिले अशांत को।  
क्या प्रश्न क्या उत्तर  मिले एक अंधकार को। 

रास्ते तकते उस मस्त को गालियां हुई उदास।  
हवाएं भी हुई शांत लगे प्रकृति करे अट्हास। 
दिन भी रोये मुझ संग अब रात करे पुकार।
संग है सब मेरे बस पुत्रशोक मिला उधार। 

रजनीश राय 
१ जून २०१८ 

Saturday, May 26, 2018

खुशियां की चाह ग़म सौगात में ... Post-10

ह्रदय वेदन। ......
खुशियां की चाह ग़म सौगात में 

खोखले हुए दरख्त कभी थे हँसते हवा के झोके से।
एक तूफ़ान आया सब करा धूमिल क्षण में धोखे से।
यूं टूटे एक एक मोती कण माला के गर खींचने से।
हर पल डर की सौगात मिली बस अपनों से। 
खुशियों ने राह बदली हम ठहरे अंचभित से।
था एक अपना गर किधर गया तकते हर दिशा से।
हर दिशा कहने लगी कुछ न गुजरा इधर से।
सब कुछ हुआ यूं शांत डरने लगे खुद आप से।
जीना है या बस जीना हम असमंजस से।   
प्रति आहट लगे अब आहत सी।
हर अंधकार बस राहत सी। 

राह करे परेशां वक़्त आजमईश में।
खुशियाँ हँसे हम पे तन्हाईयाँ भी साथ में।
क्या साथ लाये थे क्या है साथ में।
खुशियां की चाह ग़म सौगात में। .........

Thursday, May 17, 2018

क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया.... Post-9

ह्रदय वेदन
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया.... 


मीठा सा बचपन यादों में।
न भूले सी मुस्कराहटों में।
एक सुंदरता की छवि में।
कोमल ह्रदय सा कवि में। 
शरारतों के भोलेपन में अव्वल।
कभी न हो दुखी एक ऐसा पागल।
न थकने वाला ज्यों एक सागर।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

आंख बंद तो आये चेहरा सामने।
खुली आंख सोचे पुत्र को आप में।
ह्रदय समझाना प्रति पल बना जटिल।
क्या कहें किससे कहे अति मुश्किल।
चुन चुन खुशियां ले गया।
ग़मो की कड़ियाँ सौंप गया।
आंसुओं से दामन प्रतिपल जोड़ गया।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

खुशियों से दामन भरना था हमें।
मिला प्यार तोहफा अटूट।  
हर खुशी जी रहे न था कोई दुःख रूप।
स्वपन न सोचा कभी हारे यूं खुद से।
मिला आँसू जीवन तोहफा स्वरूप।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

टुटा सब कुछ पल में हुई खुशियां यो तार तार।
लगती नज़र क्या दामन में सोचे हम बार बार।
माँ से बढ़कर कोनसी नज़र रोये माँ ज़ार ज़ार।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।



Monday, May 14, 2018

हर दिशा बस मौन है, मौन है। ......... Post-8

ह्रदय वेदन (ऋषब )
हर दिशा बस मौन है, मौन है। .........

मार्मिक दृश्य या वक़्त का अट्टास।
अंधकार आँगन में बुझी हर आस।
मन के प्रिय जिन में जिए बने अतीत।
हर जग जीत के सब लगे पराजित।
अजब सी शांति यूं लगे स्पर्धा शोर से।
खामोश वक़्त की सुईं चले कमजोर से।
आज एक राह पे हम खड़े मजबुर है।
किस मोड़ मुड़ना सोच प्रति सोच है।
होगा स्वपन प्रति क्षण एक नयी सोच है।
किन्तु स्वपन से बाहर की न कोई डोर है।
ह्रदय कहना लगा न मुझमे अब जोर है।
आंसू भी करे शिकायत हम ह्रदय कमजोर है।
मस्तिष्क कोशिकाएं रक्त विभोर है।
क्या है रक्त या नीर जो कमजोर है।

प्रति क्षण मांगी  यही आशीष।
दुस्वपन न लाये दुश्मन या  हितैषी। 
परीक्षा लेते भगवन मत बुद्धिजीव का।
परीक्षा हारे जीते आज पल अतीत का। 

आरम्भ गति स्थिर हुआ जीवन।
जीवन गति अति मद्धम।
और हर दिशा बस मौन है, मौन है। .........



Friday, May 11, 2018

यहीं एक अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान। ...... Post-7

ह्रदय वेदन देवो को समर्पित
यहीं एक अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान। ...... 

हर दिशा प्रकट प्रतीत रुदान।
कुछ भूतकाल कभी वर्तमान।
भविष्य का प्रति पृष्ट अनजान।
कुछ स्वपन लगे सत्य वर्तमान।
प्रति प्रयत्न ह्रदय चेतन फिर क्यों अशांत।

गीता सार सब एक है प्राण।
न पिता न माँ न भाई सब अनजान।
जीवन सार मनुष्य मन न सहमत।
मोह के दर्पण चले संग क्यों प्राण।
मुक्ति जीवन यूं  कमजोर डोर।
प्रत्येक कथन प्रतीत अनजान।
प्रति प्रयत्न ह्रदय चेतन फिर क्यों अशांत।

मूक दर्शक हम बैठे क्यों।
क्या अभिनय करना जीवन सार।
सार अभिनय तो फिर क्यों न आयु समान।
लम्बी आयु क्योंकर जीते होते परेशान।
नन्ही आयु प्रसन्न फिर क्यों लिए प्राण।
प्रत्येक प्रश्न एक प्रश्न बना।
हर क्षण प्रतीत चुभन मस्तिष्क अज्ञान।
प्रति प्रयत्न ह्रदय चेतन फिर क्यों अशांत।

कहे कृष्ण गीता सार दुःख मेरा या तेरा समान।
फिर क्यों मध्य न आये दुःख में भगवान्।
माँ को एक रूप में भगवन कहलाया।
न आता दिखा पुत्र दुःख न मन में परेशान।
कहते होता एक आभास दुःख में जब संतान।
हारे इन कथनो के हम बस रहे अनजान।  
विशाल तख्त न बिठायो बस रहने दो इंसान।
माँ जननी पुत्र दुःख असिमित, सिमित हर अल्पविराम।
यहीं एक अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान। ......

Wednesday, May 9, 2018

सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया...... Post-6

ह्रदय वेदन।  .........               माँ पिता का  ऋषब को समर्पित
फिर भी सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया। ....

कुछ विशेष सा जब इस धरती पे कदम पाया।
स्वेत सा रंग संग में मोहक सी मुस्कराहट लाया।
बालपन में क्रीड़ा से शरारत स्वाभाव पाया।
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया। 

प्रति क्षण बस स्वछंद सा जीवन अपनाया।
अहकार न द्वेष किसी से कभी मन में लाया।
हर दुख दर्द सब के एक नन्हे ह्रदय अपनाया।
एक शब्द कहे कुछ ऐसा बस स्वाभाव पाया।
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया। 

उम्र लड़कपन जब कदम बढ़ाया। 
हर कदम श्रेष्ठ हर नयी उमंग अपनाया।
न करना स्वभाव न पाया प्रथम को प्रथम अपनाया।
नयी उमंग नयी सोच न घबराया।
प्रति क्षेत्र को न विळम्ब अपनाया।
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया।

रहा आजाद प्रकृति का न थकान को अपनाया।
निद्रा में बेचैन प्रातः को एक नियम बनाया।
हर नियम मेहनत कभी न घबराया।
हर आज्ञा आदेश को न ठुकराया।
न थकने वाला शख्श खुद को बनाया। 
सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया। 

मातपिता संग कुछ न कहने की एक आदत लाया।
सब कुछ जल्दी इस पे एक कदम बढ़ाया।
उम्र से खुद को आगे ले आया । 
न थकने की राह ने किधर भटकाया।
उस राह को पिता अभी भी समझ न पाया।   

कुछ हुआ बस यूं समाप्तः की क्या खोया क्या पाया।
वह निडर सा बालक लाल रथ संग पुष्प लिटाया।
फिर भी निर्मल ह्रदय न विश्वास आया।
यू उठे बेचैन पुत्र कहे मुझे यहाँ कौन लाया।
आस अंतिम विदाई तक पिता ने लगाया।
लगे राम को सत्य मन को झुटलाया।
अंतिम अग्नि पिता से यूं कष्ट पाया।
 
क्या निभा पाया या न पाया पिता कुछ समझ न पाया।
फिर भी उम्र तमाम सब से प्यार और सिर्फ प्यार पाया।।।।।।


Monday, May 7, 2018

आज हम सब में होता। ........ Post-5

भूल कर भी याद रहने वाली । .........    एक व्यथा माँ की   (ऋषब)
आज हम सब में होता, सब में होता। ...

जिद पे आना अच्छा लगे।
घर छोड़ना गर अच्छा लगे। 
मित्रो संग रह लेता।

कोई प्यार गर अच्छा लगे।
कोई बंधन सा अपना लगे।
प्यार को अपना लेता।
 
सोचता कुछ यूं ह्रदय मेरा । 

माँ गर एक सूरत मिलता रहता।
जीवन पृष्ठ अंकित रहता।
अश्रु न जीवन अमृत होता।
जीवन सरल न कठिन होता।

माँ ममता कितनी कठिन।
एक ह्रदय अंकित कर लेता।
मस्तिष्क कुछ जवळीत था।
अश्रु सूरत माँ मोहित होता।

क्यूँ न सोचा यह प्राण माँ एक जान।  
कितना कठिन यूं जीवन तमाम।
अंतिम नेत्र माँ को देखा।
फिर लिया जल एक बूँद तमाम।
नेत्र तकते दृशय अनजान।

कुछ यह होता कुछ वह होता।
नादान परिंदें। .........
आज हम सब में होता, सब में होता। ...

Saturday, May 5, 2018

एक सीधी जीवन रेखा की व्यथा । ....... Post-4

कभी न समाप्तः होने वाली। ......... पिता की व्यथा (ऋषब)
एक सीधी जीवन रेखा की व्यथा । .......  

यूँ आया सन्देश की कर गया पिता को मौन।
समझ न आये प्रथम की कौन दिशा है हम।
झटपट सब कुछ छोड़ कर एक गति ली थाम।
रस्ता हुआ यूं लम्बा न हमें लगा पहचान।
मस्तिष्क में लगी प्रश्नों की एक कतार तमाम।
उत्तर पाने को दिल में थे कितने ही तूफ़ान।
न रब को न खुदा को न भूला कोई भगवान्।
अंजाम हो अच्छा दिल में बस एक अरमान।
पसीने में तरबतर यूं पहुंचा किसी तरह अंजाम।
एक जवान बेटे को देखा, माँ गोदी ले प्यार से थाम।
भगदड़ सी मची ले चलो ले चलो वक़्त हे कम।
पिता संग हो चला माँ लिया प्यार गर्दन को थाम।
यूं पहुंचे अस्पताल में यंत्रो में ढूंढ़ने को प्राण।
पुत्र जीवन संघर्ष, पिता खोजता यंत्र यंत्र आस के अरमां।
हर एक क्षण जाता देख हो जाता परेशान।
हर सीधी रेखा यंत्र की करनी लगी बेचैन।
आस लगा पिता देखता हर भगवन पे नैन।
प्राण पखेरू यूं कहने लगे वह यंत्र तमाम।
जीवन ज्योति एक सीधी रेखा पिता सोचता एक नादान।
सच को बस सच कहे यह अंश्रु अनजान।
जीवन ज्योति है एक सीधी रेखा जान लो अनजान, जान तो अनजान। ....

Friday, May 4, 2018

तिलक को मस्तक की शोभा पाया। .......

यादो के शब्कोष से। .........    कुछ पंक्तियाँ  (ऋषब )
तिलक को मस्तक की शोभा पाया। .......

एक दिन था वह शुभ मंगल आया। 
किलकारी की गूँज में हर शख्श मुस्कराया।
बचपन की अटकेलियों में वक्त गया यूं आया।
बस कुछ यूं शुरू हुआ जीवन का  प्रथम अध्याय।
 
स्वेत मस्तक पे लाल तिलक लगा यूं इतराया। 
ऐसी आदत की न लगा तिलक तो कदम बढ़ाया।
यूं लगा एक पिता सी परछाई को पाया।
हर एक खुशी में बस वह था समाया।

लगा समय बीतने शिक्षा में मित्रता को पाया।
मित्र हुए विशेष हर एक को अपनाया।
बुरा क्या भला क्या भेद न पाया 
न नाम मित्रो का कभी जुबान पे लाया।

उम्र हुई जवान पर तिलक को मस्तक से न हटाया। 
वक़्त से ज्यादा परिवार से श्रेष्ठ मित्रो को पाया।
दोस्ती हो जीवन समप्रित ऐसा रास्ता अपनाया।
परन्तु प्यार की नाव में डगमगाया।
दोस्ती या प्यार में कुछ समन्वय न बिठा पाया।
होने लगा परेशान जब खुद को भवर में कसता पाया।
पर मन का पक्का ऐसा मित्र,प्यार सब को छुपाया ।

यूं मस्तमौला सा मित्रो में क्या दिल पे आया।
यूं चलो छोड़ दुनिया को एक निश्चय बनाया।
अधूरे ख्वाब अधूरी जिंदगी को श्रेष्ठ पाया।
 
कुछ न सोचा उस माँ को जिस से जनम पाया।
अंत समय जब पुत्र मस्तक को माँ ने सूना पाया।
पिता से तिलक को मस्तक की शोभा फिर भी बनाया।

शायद यही एक आदत 
मात-पिता की निभा पाया निभा पाया। .. 

रजनीश राय 
४ मई २०१८ 

Thursday, May 3, 2018

आस्था के विश्वास को मिटा आया । ....... Post-2

कभी न समाप्तः होने वाली। .........   एक व्यथा पिता की   (ऋषब)
आस्था के विश्वास को मिटा आया मिटा आया। .......  


विचित्र संजोग, सोया वह बेखबर हैं। 
न बेखबर रहने वाला आज बेखबर है।
दोस्तों की भी फ़िक्र नहीं जो आते हैं ।
कल तक जो नाम जुबान पर आते कतराते।

एक प्रश्न चिंह सब की माथे की रेखाओ में।
क्या ऐसी मुश्किल जो चल दिया न आने वालों में।
क्यों किसलिए लोगो की जुबान बन गया।
और उत्तर सिर्फ उसकी जुबान बन गया।

खामोश है उसका चेहरा यूं की चिंता बस और नहीं। 
शांत सी मुद्रा चेहरे पर की अब कुछ और नहीं और नहीं।

अग्नि हाथ में रख स्वेत वस्त्र पहन चला पिता पुत्र की विदाई पर।
दुःख तो शायद कहीं होगा उसे अम्बर की गहराही पर।
अपना कार्य पिता को दिया दुःख होगा देख कर।
पिता का विलाप ह्रदय में बसा दर्द की तन्हाई में।
 
शांत समय जब वक़्त आया पंचधातु का।   
वह जिद करता न दूधको बचपन चेहरा याद आया।
फिर कर कठोर मन अग्नि को समर्पित कर आया।
स्वेत से कोमल अंग को तप कर आया।
 
कुछ खोया या न पाया यह पिता न समझ पाया।
बस परछाई क्या। .. 
हर आस्था के विश्वास को मिटा आया मिटा आया। .......

रजनीश राय 
३ मई २०१८ 

इंतज़ार इंतज़ार बस इंतज़ार। ........ Post-1





कभी न समाप्तः होने वाली। ... एक व्यथा माँ के इंतज़ार की   (ऋषब)
इंतज़ार इंतज़ार बस इंतज़ार। ........

मस्तमोला निर्भय दिलेर सा क्यों हो गया एक प्राण में। 
कभी शान्त कभी अशांत सा । 
कभी एक स्वामी सा ध्यान में,
दोस्तों में मतवाला यूँ आज क्यों नहीं उनकी परवाह में।
किसी परेशान में या प्यार में कुछ तो कहता हम तो थे बस इंतजार में।
यारों संग हर वादा निभाया हमको भी रख लेता कहीं यादों के किनारे में।
माँ के दुलार में पिता की फटकार में,
पहचान न पाए तुमको की हमको तुम या हम रह गया यह राज बस यादों में।
एक परिंदा बन कर जिया तू हमेशा रहा बस आज़ादी में गर कुछ बंदिशे थी राह में तेरी एक बार तो कहता सिर्फ मजाक में।
पिता की परछाईं सा आज क्यों हैं छुपा सा किसी अन्धकार में।
तेरा जाना आसान होगा  सिर्फ तूने सोचा अपने हाल में, गर माँ का एक आँसु रखता अपने याद तो पल ठहर जाता माँ के इंतज़ार में।
आज माँ कुछ बोलती नहीं क्योंकि अभी भी है वह तेरे  इंतज़ार में इंतज़ार में इंतज़ार में।।।।।।

 03.05.2018