Tuesday, October 5, 2021

ख्वाबों की लंबी उड़ान - समर-मीठा फल

ख्वाबों की लंबी उड़ान ...

हुआ शुरू जब खेल इज़हार का
बैठे सोचते हम प्यार की मिठास को
हाथ ली कलम लिखने अपने खास को
यूं कलम लिए सोचते 
क्या लिखे हजूर को
कुछ लिखते बनता ही नहीं
यादें ही यादें दिल की गहराईयों में
जिन्हे याद किए बगैर दिल क्यों थमता नहीं
पर यादों के सहारे समय कटता नही 

फिर सोचते दिल तो है तुम्हारे पास 
किसी को दिया नहीं
चाहे लाख कहो पास नहीं है तुम्हारे
है हमारे पास भी तो नहीं

इश्क का मर्ज है ही ऐसा
साथ रह कर भी लगे तुम पास नहीं
दूर रहे तो लगे शायद तुम आस पास कहीं
ख्वाबों की ऐसी लंबी उड़ान 
किसी के पास नहीं
किसी के पास नहीं।।।

रजनीश राय

मोहपाश - The Black holes of our Society

भ्रम रहे हर पल 
आवाज आयी दूर पायल की 
कभी लगे 
खनकनाती उसकी हसीं पास की 
हो एहसास कभी 
फिज़ा में खुश्बू हमारे प्यार की 
चलती हवा की थरथरात  कहे 
शायद गया पास से अभी कोई  
आंखे भी तकती हर परछाई 
आया कोई अपना सा कहीं  

कब तक रहे इस मोहपाश में 
आगे तो जरा रखो कदम 
आज मन में ठान  
करेंगे दिल का इजहार हम

दिन आया शाम ढलने का वक़्त 
देखें उन्हें उधर से आते एक टक 
हिम्मत करके कदम आगे बढ़ाया 
पास पहुंचे जब उनके हम 
उनको प्रतिक्रिया वंचित पाया 
काँच सा पार होते उनको पाया 
हाथ हवा में 
पर कुछ छु न पाया 

तभी कुछ लोगो का डरता सा 
इस जगह से तेज चलने पर 
कुछ वार्तालाप सुन पाया 
सुनते हुआ सब मोह भंग 
आँखों में तैरते असंख्य गम 
कानो में गिरे जैसे मोम गरम 
दिल भी अब गया पूर्ण सहम 

अच्छा था वह जवान किसकी लगी नज़र 
जो यहाँ पर अनजान सा मृत पाया 
सुना है आज आज भी वह प्रेत बन इस राह 
अपनी प्रियंका को खोजते भटकते पाया 
जातिवाद की भेट या सभ्य समाज 
कहने वालों के नाम खुद की बलि चढ़ा आया 

न जाने जातिवाद कितनो को निगला 
समाज बदला पर इंसान न बदला  
जातिवाद धब्बा समाज का 
सोच गर बदली आज भी बदला 
इंसान बदला तो पूर्ण समाज बदला 

विनती है पूर्ण समाज से 
ऐसे न बांटो धर्म, जाति, समाज में हर इंसान को 
इंसान बन जन्म लिया संसार में 
तो क्यों न हो हर अधिकार इंसान को 


रजनीश राय 
०५ अक्टूबर २०२१ 




इंसान रूप में जन्मे बस इंसान ही रहना - The Black holes of our Society

खुशी का वह पल अरमानो संग आया 
जिधर देख्ने  हँसता हर एक समां  पाया 
यार दोस्त लगाते ठहाकों की उठती गूंज 
खिलखिलाते बच्चों के चेहरों पर महकता नूर 

साथियों यहाँ से पढ़ना हो गंभीर 
क्या क्या होता कभी ऐसे भी 
ये हम सबको जानना जरूर 

शादी दोस्त की 
हम भी बारातियों संग शुमार 
रात का वक्त शोर बारात का 
देख इक शक्श ने शर्मदिंगी को किया तार तार 
आज सोच कर भी हाथ पैरों में कम्पन आये बार बार 
बालिका उम्र सिर्फ ५  या ७  की 
दे चॉकलेट पास बुलाया 
अंधरे कमरे और बारात के शोर में 
हवस का शिकार बन रूह को भी रुलाया 
इंसानियत को कलंकित कहलाया 
कोसे खुद को आज हम 
आदम रूप में क्यों जनम पाया 

आज लिखते उस दुखद वाक्य को 
माँ बाप का वह दर्द वह रोता चेहरा 
एक एक क्षण कोसते दर्द जुबां पर आये 
माँ, बहन, स्त्री, फिर बेटी कितने रूप पाए 
बालिका भगवन रूप भी कहलाये 
नादान बालिका क्या दोष की सजा  
या बालिका रूप में जनम लेना अभिशापित कहलाये 

दो दिन कैंडल रूपी प्रदर्शन, चार दिन संगठन प्रदर्शन 
या राजनयिक  प्रदर्शन नहीं है करना
परिवर्तन के रूप में आने वाले नौजवान और 
एक एक बालक को इस शैतानी प्रवृत्ति से दूरी है बनाना
घर से ही शुरू कर इस अध्याय को सब तक है पहुंचाना 

विनीति है सबसे इंसान रूप में जन्मे बस इंसान ही रहना 
समाज में ऐसी शैतान परिवर्ती को कभी क्षमा न करना 
बाल शोषण के इस रुद्र रूप या 
दूसरे रूप को समाज में न पनाह न ही पनपने देना 
बाल शौषण को सदा के लिए समाज से मुक्त है करना। .. 

रजनीश राय 
३० सितम्बर २०२१ 
 

Sunday, September 19, 2021

न कोई उधार - Meri Bebaq kalam - 6

एक पल हुआ चोरी न जाने कहाँ 
जैसे बंद होंठो की छिपी मुस्कराहट हो 
जल खेलता नदियों की चंचलाहट में 
भँवरे फूलों की खुशबू में हो के मगन 
हवा की सरसरहाट में है कुछ तो है गुम 
क्यों मेघों से बरसता पानी लगे दुश्मन 


कांच पार ओस की बूंदो की फिसलन 
क्यों पक्षियों की उड़ान आज रही थम  
पगडंडियाँ की सीध कर रही भ्रमित 
चाह कर भी क्यों न उठे कदम 
क्यों मेघों से बरसता पानी लगे दुश्मन 

बीते दिन की स्मृति हुई समक्ष नयन 
नयनों ने जब देखा उस पार 
समक्ष पाया अपना खोया प्यार 
मृगनयन वह मुस्कराहट खुले हुए बाल
वह खुशबू और फूलों से प्यार 

कुछ पूछती 
पुकार कर हमें बार बार 
हम मूर्छित से मन के 
कानो पर भी लगा द्वार 
कंपन सा हाथों में 
थमा वक़्त हमें कुछ कहे बार बार 

आप कैसे हो, कहाँ थे कब आये 
तमाम प्रश्न यूं खड़े मन के द्वार 
कुछ बोलने को होंठो ने की हिम्मत 
तभी आवाज पीछे से आयी कुछ उस पार  
प्रिये चले जिद में है ऋषभ 

हम जागे यूं स्वपन से लगे एक बार 
तकते उस चेहरे कभी नयनो को 
छुप कर बार बार 
रास्ता भी तकते जाते झुक झुक कर
हम बार बार  
सोचते प्यार हमारा क्यों रहा उधार 

जाते जाते पलट देखा मुस्करा कर 
जब उस मृगनयनी ने 
फिर झटक कर बालों को लिया सवांर 
खुशियां गम सब संग ले किया विचार 

मुस्कराहट भी दबी दबी हमसे कहे
हुआ बची आधी जिंदगी का विस्तार 
जीवन जीने का आधार  
अब न मुस्कराहट, प्यार का, बीते लम्हों 
का रहा कोई उधार
न कोई उधार। .... 

रजनीश राय 
९ सितम्बर २०२१


चेतन मन फिर क्यों अशांत। - Meri Bebaq kalam - 5

हर दिशा प्रतीत रुदान।
कुछ भूतकाल कभी वर्तमान।
भविष्य का प्रत्येक पृष्ट अनजान।
कुछ स्वपन लगे सत्य वर्तमान। 
चेतन मन फिर क्यों अशांत।

ज्ञानी मत सब एक है प्राण।
न पिता न माँ न भाई सब अनजान।
जीवन सार मनुष्य मन न सहमत।
मोह के दर्पण चले संग क्यों प्राण।
मुक्ति जीवन यूं  कमजोर डोर।
प्रत्येक कथन प्रतीत अनजान।
चेतन मन फिर क्यों अशांत।

मूक दर्शक हम बैठे क्यों।
क्या अभिनय करना जीवन सार।
सार अभिनय तो फिर क्यों न दुःख सुख समान।
कोई लम्बी आयु क्योंकर जीते होते परेशान।
कोई नन्ही आयु प्रसन्न फिर क्यों सिमित प्राण।
प्रत्येक प्रश्न एक प्रश्न बना।
हर क्षण चुभन मस्तिष्क अनजान
चेतन मन फिर क्यों अशांत।

कहे गीता सार दुःख मेरा या तेरा समान।
फिर क्यों मध्य न आते दुःख में भगवान्।
माँ को एक रूप में भगवन कहलाया।
न आता दिखे संतान दुःख 
न मन में कुछ परेशान।
कहते है लोग होता एक आभास 
दुःख में जब संतान।
हारे इन कथनो के हम बस रहे अनजान।  
विशाल तख्त न बिठायो बस रहने दो इंसान।
माँ जननी संतान दुःख असिमित, 
सिमित हर अल्पविराम।

रजनीश राय 
१९ सितम्बर २०२१

क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया - Meri Bebaq kalam - 4

मीठा सा बचपन यादों में।
न भूले सी मुस्कराहटों में।
एक सुंदरता की छवि में।
कोमल ह्रदय सा कवि में। 
शरारतों के भोलेपन में अव्वल।
कभी न हो दुखी एक ऐसा पागल।
न थकने वाला ज्यों एक सागर।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

आंख बंद तो आये चेहरा सामने।
खुली आंख सोचे पुत्र को आप में।
ह्रदय समझाना प्रति पल बना जटिल।
क्या कहें किससे कहे अति मुश्किल।
चुन चुन खुशियां ले गया।
ग़मो की कड़ियाँ सौंप गया।
आंसुओं से दामन प्रतिपल जोड़ गया।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

खुशियों से दामन भरना था हमें।
मिला प्यार तोहफा अटूट।  
हर खुशी जी रहे न था कोई दुःख रूप।
स्वपन न सोचा कभी हारे यूं खुद से।
मिला आँसू जीवन तोहफा स्वरूप।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

टुटा सब कुछ पल में हुई खुशियां यो तार तार।
लगती नज़र क्या दामन में सोचे हम बार बार।
माँ से बढ़कर कोनसी नज़र रोये माँ ज़ार ज़ार।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

रजनीश राय
१९ सितम्बर २०२१

अल्फाज कोरे कागज़ पर - Meri Bebaq kalam -3

लकीरे हाथ की न जाने कब लगी रास्ता बदलने 
या हम हुए किस राह में गुम 
फिर दिए अपनेपन ने भी इतने गम 
काश होते हम भी कुछ मतलबी से 
बेवफाई क्या दुश्मनी भी झेल जाते हरदम
काश कह पाते हर जज्बात हंस के 
पर जज्बातों के तले हुए दफ़न 

आईनो की दुकान पर खड़े 
तकते हर एक आइना 
अंदर छुपा के एक अम्बार 
फिर भी हँसता सा रूप दिखे क्यूं हर बार 

जिए जा रहे हैं हम यहाँ 
आइना सा प्रतिरूप ले 
थामे जिगर पे रुसवाई का पहाड़ 
मुस्कुराते चेहरे क्या दोस्त क्या बाजार 

रहे वो धरती पर तो गरुर है इतना
मजार में तो लगे हर शक्श एक सा 
यूं आयी खुद पे हंसी कुछ सोच कर 
जब हमने खुद तो बनाया इतना कमजोर
लो आज हुए हम उस दिल के हाथों मजबूर 

अल्फाजों को लिखते कोरे कागज़ पर
हम न जाने कितने बार
देखें जब भी उन्हें पास से जाते
कदम रखती हिम्मत यूं पीछे 
नैना कहे हम न दोषी
दिल चला दूसरी राह 
हर शिकवा खुद को समझाकर
हमको समझा कर।।।।

रजनीश राय
१९ सितंबर २०२१

दुआ कबूल हो जाने की - Meri Bebaq kalam -2

खुली किताब सी जिंदगी में
बेबाकी से ढोते रिश्तों की 
गम की ओढ़ के चादर
टूटी माला पिरोते यू खुशियों की 

खुशियों का अनंत गहरा सागर 
मोती सीप क्या शंख से प्रतीत 
इक  पल लगे सब है अपने साथ 
दूसरे पल कब बने जाते अतीत 

फिर एक मोड़ आये  चार कदम पे 
चले हंस के हम आँखे नम लेके 
पसीने की बूदों को ललाट से हटा के
यादों के उस बोझ को सिमटा के 

बालपन की यादों को रखा संजो कर 
उम्र कटे सिर्फ उसकी ही हो कर 
आये न याद वह लड़कपन उसका 
जिसमे रहा में बस सब खो कर 

कभी लगे स्वपन में एक और स्वपन 
नींद में कुछ यूं ढूंढती बंद आखें
कभी राह तो कभी रहगुजर से
रास्ता पूछती यह थकी आंखे 
आदत हो गयी कुछ शाम के 
बाद रात फिर सुबह तक जागने की 

लम्बी उम्र की दुआ न मांगे 
कुछ मांगे तो उम्र जल्द बीत जाने की 
इल्तज़ा करें तुमसे यारों 
करो दुआ हमारी दुआ कबूल हो जाने की 
कबूल हो जाने की। ..... 

रजनीश राय 
१७ सितम्बर २०२१ 

कुछ गमगीन हो कर - Meri Bebaq Kalam 1

अपनी सुगंध सा स्वपन में कोई उठाए झंझोड़कर 
बारिश की बुंदो सा स्पर्श आंखो को भिगो कर 
कोहरे में दिखे यूं रोशनी अंधेरे को चीर कर
कंबल ओढ़े सिर्फ जिस्म हाथ तपते अग्नि पर
चित्र कुछ अधुरा लगे आंसू या हंसी बिन लबों पर
आंसू सा ज़िद्दी न हो अलग खारेपन से जुड़कर
कुछ एहसास सा कराएं अपना न समक्ष होने पर

मरुस्थल की मृगतृष्णा सा करे बेचैन हर डग पर
अश्रु बह चले सर्द लहर मे भी गर्म बूंद बन कर
लहरों को तकते सोच रुके संग अपने से हो कर
हर दिशा देखें कुछ तो मिले अपना सा हो कर
क्या क्या सोच बैठे हम भी कुछ गमगीन हो कर
अपनी सुगंध सा स्वपन में कोई उठाए झंझोड़कर

सोचते हम बैठे प्यार की उम्र क्या करे नापकर
जीवन खुशी कभी गम कटे राह सिर्फ चलकर
माना पथ है पथरीला क्या करे सिर्फ सोचकर
याद वो एहसास, प्रयास कभी हंसी सब देखकर
बस कुछ एहसास कराएं अपना न समक्ष होने पर
क्या क्या सोच बैठे हम भी कुछ गमगीन हो कर
कुछ तो गमगीन होकर। .. 
या कुछ ग़मगीन होकर। ..

रजनीश राय 
९ सितम्बर २०२१ 

Wednesday, August 25, 2021

bio

मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है।

हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है परन्तु इस दर्द को उजागर करना आज की आवश्यकता थी , इस COVID  रूपी त्रासदी के असहनीय दर्द को शब्दों में डालने की कोशिश की है  उम्मीद है आप लोगो तक वो दर्द की टीस पहुंचगी। एक ऐसा दर्द जो बयान न हो।।।लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात या अपने उन  शब्दों को कविता में ढाल पाउँगा । कोशिश की है lockdown से आज तक का असहनीय सफर पंक्तियों में बांध सकूँ। 

दिन गुजरते गए दर्द बढ़ते गए पलायन होते गए किसी के दोस्त किसी के रिश्ते सदा के लिए दूर होते गए। .. 

आशा करता हूँ पसंद न आये किसी को यह कवितायेँ  सिर्फ दर्द को हम सब समझे या करें साँझा। 


नाम : रजनीश राय
पिता जी का नाम : जीत राम राय
माताश्री का नाम : उर्मिला देवी
शिक्षा : एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस।
स्थाई निवास : हैदराबाद , तेलंगाना
ईमेल : rajnishrai71@gmail.com
इंस्टाग्राम : rajnishrai71

ट्विटर : rajnishrai71 


मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है। हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है, लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात बता पाऊंगा अपने उस छुपे से दर्द को शब्दों में बयान करूं। समय के साथ उस दर्द को धीरे-धीरे कविता के शब्द पिरोता रहा, और अब बचपन के कवि रूप के सपनों को हकीकत का रूप देने की कोशिश है। उम्मीद है आप लोगो तक वो दर्द की टीस पहुंचगी। एक ऐसा दर्द जो बयान न हो।।।

नाम : रजनीश राय
पिता जी का नाम : जीत राम राय
माताश्री का नाम : उर्मिला देवी
शिक्षा : एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस।
स्थाई निवास : हैदराबाद , तेलंगाना
ईमेल : rajnishrai71@gmail.com
इंस्टाग्राम : rajnishrai71
ट्विटर : rajnishrai71

 

अपने उस छुपे जज्बातों को शब्दों में बयान कर पाउँगा । समय के साथ उस प्यार,सुख, त्रासदी, दुःख या दर्द को धीरे-धीरे कविता के शब्द पिरोता रहा, और अब बचपन के कवि रूप के सपनों को हकीकत का रूप देने की कोशिश है। उम्मीद करता हूँ आप लोगो के दिल तक वो जज्बातों को पहुंचा पाउँगा ।।।


मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है।

हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है परन्तु इस दर्द को उजागर करना आज की आवश्यकता थी , समाज के ब्लैक होल्स असंख्य है कुछ मुद्दों पर प्रकाश डालने की कोशिश की है शायद कवि की कविता के माध्यम से समाज की बेहतरी में कुछ योगदान दे सकूँ बस इतना सा प्रयास है   असहनीय दर्द को शब्दों में डालने की कोशिश की है  उम्मीद है आप लोगो तक वो दर्द की टीस पहुंचगी।  

जुर्रत तो की हमने चांद पाने की

पर खुद तारे न बन सके कभी हम 

हमारा प्यार था रास्ते का पत्थर

या पत्थर थे रास्ते के हम


रजनीश राय हैदराबाद से है। यह एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस है। इन्हें किताबें पढ़ना और लिखना, संगीत और स्वयं गाना बहुत पसन्द है। इन्होंने अकस्मात मृत्यु, आत्महत्या, लॉकडॉन, पलायन, बाल शौषण, जातिप्रथा और प्रेम इत्यादि पर अनेक कविताएं लिखी हैं।

ये अपने जीवन में समय के साथ प्यार,सुख, त्रासदी, दुःख या दर्द को कविता के शब्द पिरोने की कोशिश करते रहते है। उम्मीद है आप लोगो के दिल तक वो अनछुए जज्बातों को पहुंचा पाएंगे।


मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है। हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है, लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात बता पाऊंगा अपने शब्दों को साकार रूप दे पाउँगा। समय के साथ उन शब्दों को धीरे-धीरे कविता का रूप देता गया और कविता संकलन के साथ जुड़ता रहा , इस बार प्यार रूपी परिभाषा को अलग रूप देने की कोशिश है। उम्मीद है आप लोगो तक वो प्यार की कशिश पहुंचगी। 

उपलब्धि : अमोदिनी स्याही , Charm in your Arms, The Black Hole of our Society, बीते लम्हों की याद में, Panademic , Love you Hamesha, मेरी बेबाक कलम इत्यादि 


शिक्षा : एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस।
स्थाई निवास : हैदराबाद , तेलंगाना
ईमेल : rajnishrai71@gmail.com
इंस्टाग्राम : rajnishrai71
ट्विटर : rajnishrai71

रजनीश राय हैदराबाद से है। यह एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस है। इन्हें किताबें पढ़ना और लिखना, संगीत और स्वयं गाना बहुत पसन्द है।
हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना आपकी रूचि है, लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात पहुंचा सकेंगे। समय के साथ उन शब्दों को धीरे-धीरे कविता का रूप देते गए और कविता संकलन के साथ जुड़ते रहे , इस बार प्यार रूपी परिभाषा को अलग रूप देने की कोशिश है। उम्मीद है आप लोगो तक उनकी वो प्यार की कशिश पहुंचगी। 

आपकी उपलब्धियां  : अमोदिनी स्याही , Charm in your Arms, The Black Hole of our Society, बीते लम्हों की याद में, Panademic , Love you Hamesha, मेरी बेबाक कलम, Samar- Ek Mitha Phal, Mere Humsafar, Gehraiyon se bhara Atamvishwas, Kalam Bejubaan, Unsaid Feelings इत्यादि 

स्थाई निवास : हैदराबाद , तेलंगाना

ईमेल : rajnishrai71@gmail.com
इंस्टाग्राम : rajnishrai71
ट्विटर : rajnishrai71

Bio: 
Rajnish Rai is from Hyderabad. He is MBA Marketing and Finance. 

He Enjoys reading and writing books, music and singing as well. It is always your interest to keep writing something different, when started writing he was unaware how it will reach to the heart of people. 

Overtime, those words were gradually given the form of poetry and were associated with the collection of poems as well. This time there is an attempt to give a different look to the definition of Friendship. Hope it will reach you deeply.

Your Achievements: Amodini Syahi, Charm in your Arms, Pandemic, The Black hole of our Society, Ek cup chai or coffee, Bitey Lamhon ki Yaadon mein, Love you Hamesha, Meri Bebaak Kalam, Samar-Ek Mitha Phal, Mere Humsafar, Ghariyon se bhara Atamvishwas, Kalam Bejubaan, Unsaid Feelings etc...

Permanent Residence: Hyderabad (India)

Email : rajnishrai71@gmail.com
Instagram: rajnishrai71
Twitter: rajnishrai71
Mobile No. 8686838054


Saturday, August 21, 2021

कुछ पहचान रख लो

आयी त्रासदी सब कुछ गया बदल 
जीवंत से माहौल में हर पल आंतक 
बालपन का सिमित समय बना नीरस 
यूं जवानी का जीवंत पल हुआ बेबस 
तो हुई वृद्ध अवस्था भी अंत्यत बोझिल 

इंसान हुआ बेबस कुछ इस तरह 
ले रहा सांसें भी सोचकर 
कह रही मायूसी मुख पे 
न जाने क्या सोचे हल पल 

लाये त्रासदी एक नया मोड़ हर पल 
जीने की होड़ हर पल एक नया मोड़ 
किसी ने खोया मित्र बंधू 
तो रोये कोई खून के रिश्तो को गवाकर 

त्रासदी का कुछ ऐसा चला चक्र 
पलायन का दर्द भी रहा एक बोझ बनकर 

लगी औषदी भी प्रतिस्पर्धा की दौड़ 
हर देश कहें हम है बेहतर 
देश से दूसरे देश  
शहर से अपने शहर को लगा पहरा 
अनिवार्य औषदि पत्र लगे पहचान पत्र हो सबका 

सोंचे तो लगे क्या और क्यों है ये सब 
लगे कभी एक चाल सा 
राजनीति को भी सोचा बहुत 
क्या यह उदेशय वव्यवसाय का 

आप सब है बुद्धिजीवी कुछ तो बोलो 
हम कवियों की है सिमित सोच
आप कुछ तो पहचान रख लो 
पहचान रख लो। ...  


रजनीश राय 
२१ अगस्त २०२१ 

Friday, August 20, 2021

पलायन का दर्द

त्रासदी के क्या उठे कदम 
लॉक डाउन का हुआ आगमन 
देश हुआ पुर्ण स्थिर
व्यापर, नौकरी वालो ने ली घर की शरण 

हम लगे कुछ लिखने उस त्रासदी के गम 
सोच उन दिन दिहाड़ी मजदुर के संग 
सोच उन बेबस बुजुर्ग महिला पुरुष 
क्या बेचते यूं फूल या सब्जी प्रतिदिन 

एक रूप देखा ऐसा बयान करें तो भी न होगा कम 
आये नए शहर गांव से कुछ रोजी रोटी कमाने 
रास्ता ये उचित हो परिवार का लालन पालन 
समय ने यह क्या ली करवट 
रह गए अपने ही देश में बन के एक बंधक हम 
दिन बड़े ओर बढ़ते गए 
त्रासदी के समाचार और विचलित करते गए 
क्या ट्रैन क्या बस या हवाई यात्रा सब हुए स्थगित 
त्रासदी के भय ने सब तो किया यूं कमरों में बंद 

पर संदेश न हुए बंद 
कभी रोये माँ तो कभी पत्नी भोले बचो संग 
आ जाओ क्या पता हो न कभी मिलन 
क्या पिता क्या पुत्र सब हुए नेत्र नीर संग 
पग न सूझे कोई कब तक रहे 
यूं बंद कमरों में कब तक रहे सोचते हम 

मन में ठान कुछ अनोखा सा प्रण 
चल पड़े मुसाफिर घर कुछ यूं साइकिल पर 
या चल पड़े पैदल ही क्या सोचकर 
जवान पुरुष क्या स्त्री बच्चे और क्या बुजुर्ग
सर पे थामे पोटली हाथ बच्चो के संग  
लम्बा है  कितना रास्ता ये सोच न रख साथ 
पानी की बोतल कुछ रोटी संग कटा रास्ता 
कोई पहुंचा घर हफ्तों में तो कोई हैअभी तक लापता 
सोच कर ही हुआ मन विचलित  
दशा क्या करूँ ब्यान उनकी जानकर 

ह्रदय हुआ शर्मसार 
इंसान और इंसान में भेद जानकर 
मानवता हुई शर्मसार 
सब है बराबर बोलने वालों की सचाई जानकर 
जब त्रासदी ने न किया भेद 
इंसान को क्यूँ न आया समझ यह देखकर। 
विचलित ह्रदय कोसे हर पल पल 
पलायन का दर्द रहेगा एक बोझ बनकर 
एक बोझ बनकर। .. 

रजनीश राय 
२० अगस्त २०२१ 


Saturday, August 14, 2021

मानवता दूषित हो गई

अंधकार सा है बिखरा 
जिधर देखो सनाट्टा पसरा 
गतिमय जीवन हुआ स्थिर 
सोच हुई प्रतिबंदित 
चेहरे पे सब के कुछ उदासी छायी 
कुछ न सूझे  किसी को 
लगा एक अनजान सा भय 
क्या है वो किधर से यूं पास न आ जाये 
 
शोर सिर्फ एम्बुलेंस का 
करता विचलित सबको 
सुनसान हुए सब रास्ते 
किधर हुआ वह माहोल शोर का
चहचाना  पक्षियों का 
अब विचलित करने लगा सबको 

चिकित्सालय में लगा जमघट 
कृतम सांसों की जरुरत सबकी 
मायूस चेहरे तकते एक दुसरे को 
चिक्तिसक बने दुआ सबकी 

मौत का तांडव है गहरा 
मृतक को न मिले अर्थी का सहारा 
पारदर्शी बैग हुआ यूं अंतिम सहारा 
इंसान बेबस अपनों का सिर्फ देखता चेहरा 
शमशान में लगे चिताओं का मेला 
पंक्तिबद्व हुए मृतक कहीं कुछ न बदला 
त्रासदी आयी ऐसे 
बहा ले गयी सब कुछ 
मात पिता को खोया तो कुछ ने दादी नानी के दुलार को 
खोया सहारा किसी ने तो किसी ने खुद के सहारे को 
पर रोक न पाए इस त्रासदी को 

कैसी आयी लहर समझ न पाए इंसान 
प्रति क्षण कोसे हर एक इंतज़ाम 
लगा भगवन ने भी किये किवाड़ बंद
प्रगति की हमने जितनी  
लगा आज अभिशाप बन गयी 
विस्तारवाद के लालच में 
नए नए विनाशक अस्त्र की होड़ में
मानवता दूषित हो गई 
मनुष्यता लुप्त हो गई।।।।

रजनीश राय 
१३ अगस्त २०२१ 

Friday, August 13, 2021

अंधेरे रास्ते को करें अवगत

जब हो प्रतीत तब स्मृति न बने अतीत 
पंक्तियों की करवट ने दी दस्तक 
सोच कर यादों में हुई हरकत 
सोचा कहीं लेख न बन जाए 
कविता लिखते लिखते
छीन न जाए यूं कवि शीर्षक

अंधेरे रास्ते को करें अवगत
दौड़ रहे नौजवान जिसपर सरपट सरपट 
खुद में हुए गुम लगा वक्त यूं ठहरा 
स्मरण आया पड़ोस का वो सुंदर नौजवान
खिलखिलाता वो मनमोहक चेहरा
भुजाओं में दौड़े जैसे गर्म लहू गहरा

कुछ संगत से न अवगत 
न चालाकी की संगत
भोल्पन में बड़प्पन 
जवानी की नासमझ 

रास्ता बहका नशे में कुछ कम  
फिर जहरीले ड्रग्स को लिया अपनी शरण 
बढ़ते बढ़ते हुआ बड़ा हर एक वयसन 
मुड़ना तो दूर सोच बन गयी प्रतिबंद 

कुछ कहना सुनना अब सब हुआ बंद 
संगत हुई नदारद बस खामोशी रही संग 
वापसी की न राह सोच लगने लगा हरदम 

आयी कुछ ऐसी खबर 
कानो न यक़ीन हुए नेत्र नीर भी कम
सोच कर हुए हाथ पैर सुन्न
न रहा जवान लिया मौत को थाम 

किसको दे सब्र हर इंसांन परेशांन 
ऐसा पग क्यों थामे जहाँ की राह गुमनाम 
सोचो जन्मदाता की कभी मिले यूं राह अपरिचित अनजान 
गलत दिशा राय न देंगे मन में लो ठान 
 
चाह कर भी न लो यह कदम विनिती हरदम 
न रखो यह सोच करें फरियाद तुमसे ऐ जवान 
इस ह्रदय-विदारक सोच के आगे भी है कदम 
यूं बदल इस सोच बनो एक क्रियात्मक उदहारण 

रजनीश राय 
१३ अगस्त २०२१ 

Friday, July 16, 2021

वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

लगे वक्त हसीं की परिभाषा को समझने में
सुंदर हृदय के उस प्यारे से स्वप्न मे
रह के कुछ अपना खोना उस लगाव में
सब कुछ रह के भी न पाया इस जज़्बात में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

दिन ढलता मौसम बदलता यू अपने चक्र मे
न बदला अपना मौसम रहा दिन ढलने में
मुस्कुराने का प्रयास करे एक एक शब्द में
शब्द बने पराए करे बोझिल हर एक प्रयास में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

कुछ सोचकर ली सांस ग्रीष्म पवन साथ में
पलके मूंदे करें विचार नयन नीर हुए साथ में
प्रयास हर पल छोड़ आगे बढ़ना इस संसार में
चार कदम क्या चलें हम पर परछाई साथ में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

बालपन से करें भ्रमण यादें न कोई सरहद में
समय के बंधक निशब्द इस ममता के बंधन में
नेत्र प्यासे उन जीवंत पलों को दोहराने में
समय चक्र काश विपरीत चले मोहपाश में
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

खुशी, दुख, ममता, मोह, गुस्से या प्यार में
जीवन परिचय अति कठिन समझा में
जीवंत परीक्षा से जीवन मे
रहे हमेशा असफल या निरुत्तर में
कुछ प्रश्न सिर्फ पंक्तियां बन रह गए 
जैसे ... वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में

रजनीश राय
16.07.2021

Saturday, July 3, 2021

आपका स्वपन लेकर

आपका स्वपन लेकर ~ Post 22

 

मातृ प्रेम पर चन्द पंक्तियाँ लिख कर 

सम्मान करें ममता या मातु प्रेम का

कुछ इस तरह सम्बोदित हुआ एक लेखन पर 

हृदय उठी उमंग सोच इस गरिमा का 

हाथ कलम ली सोच बचपन की 

प्यार दुलार कभी गुस्सा कभी मार 

खिलखिलाते उस बचपन के दिन चार 

पूछते प्रश्न यूं बार बार 

उत्तर मिले न चिड़न न गुस्सा एक बार

समय की गति निरतंर तेज हुए हम जवान 

मातु प्रेम ममता या दुलार न मात्र कम हुआ आकार 

किन्तु लिखते पंक्तियाँ रहे हाथ क्यों काँपकर

मातृ प्रेम का बोध विचार क्यों गए ह्रदय भेद कर  

सच कहें या ह्रदय की सोच कुछ तो बोध लेकर 

लगे वर्तमान के पन्नों को कुछ पढ़ने 

ताना झगड़ना या मालूम नहीं की संज्ञा देकर 

जिन हाथो ने दौड़ना सिखाया उन्हें छोड़कर

क्या लिखे मातु प्रेम पर लेख इस विराम को संग लेकर 

कुछ हम न कर पाए पर दे ज्ञानं क्या सोचकर 

प्रेम से जिन्हे प्रेम उन्हें कहें जीवन अति सूक्षम 

जियें उस प्रेम को भी हमेशा 

जो जीवन समर्पण सिर्फ आपको स्वपन लेकर .

सिर्फ आपका स्वपन लेकर। ...


रजनीश राय

15.07.2021


 

 

Wednesday, June 30, 2021

धुंधलाते से रिश्ते ~ Post - 21

धुंधलाते से रिश्ते

समय की गति कुछ निराली है
कभी हो प्रतीत पगडंडी पथ भ्रमित वाली है।
क्या सोचे, क्या जाने या क्या कहे
या रात्रि सिर्फ अमावस्या वाली है।

प्यार के रिश्ते प्यार में, मोह या ममता मे
कभी हो प्रतीत सिर्फ मृगतृष्णा वाले है।
संतान प्रेम, क्या मात पिता तक सीमित हो
मोह ममता की इच्छा इक तरफा क्यों पाते हैं।
क्या दोष अच्छे संस्कारों, विचारों का
या समय करवट बदल छोड़ हमे आगे निकल जाते है।

रिश्तों की परिभाषा कुछ तो पथ भ्रमित है।
कुछ रिश्ते हुए धुंधले या नेत्र नीर धुंधला कर गया।
रिश्ते है धुंधलाते से लगा वक्त चुपके से कानो में कह रहा ।
कभी प्रतीत लौह सा हृदय कुछ सहम गया बस सहम गया ।।।

©rajnishrai
30.06.21
17:45 hours