Tuesday, October 5, 2021
ख्वाबों की लंबी उड़ान - समर-मीठा फल
मोहपाश - The Black holes of our Society
इंसान रूप में जन्मे बस इंसान ही रहना - The Black holes of our Society
Sunday, September 19, 2021
न कोई उधार - Meri Bebaq kalam - 6
जैसे बंद होंठो की छिपी मुस्कराहट हो
चेतन मन फिर क्यों अशांत। - Meri Bebaq kalam - 5
कुछ भूतकाल कभी वर्तमान।
भविष्य का प्रत्येक पृष्ट अनजान।
कुछ स्वपन लगे सत्य वर्तमान।
ज्ञानी मत सब एक है प्राण।
न पिता न माँ न भाई सब अनजान।
जीवन सार मनुष्य मन न सहमत।
मोह के दर्पण चले संग क्यों प्राण।
मुक्ति जीवन यूं कमजोर डोर।
प्रत्येक कथन प्रतीत अनजान।
चेतन मन फिर क्यों अशांत।
मूक दर्शक हम बैठे क्यों।
क्या अभिनय करना जीवन सार।
सार अभिनय तो फिर क्यों न दुःख सुख समान।
कोई लम्बी आयु क्योंकर जीते होते परेशान।
कोई नन्ही आयु प्रसन्न फिर क्यों सिमित प्राण।
प्रत्येक प्रश्न एक प्रश्न बना।
हर क्षण चुभन मस्तिष्क अनजान
कहे गीता सार दुःख मेरा या तेरा समान।
फिर क्यों मध्य न आते दुःख में भगवान्।
माँ को एक रूप में भगवन कहलाया।
न आता दिखे संतान दुःख
कहते है लोग होता एक आभास
हारे इन कथनो के हम बस रहे अनजान।
विशाल तख्त न बिठायो बस रहने दो इंसान।
माँ जननी संतान दुःख असिमित,
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया - Meri Bebaq kalam - 4
अल्फाज कोरे कागज़ पर - Meri Bebaq kalam -3
काश होते हम भी कुछ मतलबी से
तकते हर एक आइना
अंदर छुपा के एक अम्बार
फिर भी हँसता सा रूप दिखे क्यूं हर बार
आइना सा प्रतिरूप ले
थामे जिगर पे रुसवाई का पहाड़
मुस्कुराते चेहरे क्या दोस्त क्या बाजार
दुआ कबूल हो जाने की - Meri Bebaq kalam -2
कुछ गमगीन हो कर - Meri Bebaq Kalam 1
Wednesday, August 25, 2021
bio
मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है।
हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है परन्तु इस दर्द को उजागर करना आज की आवश्यकता थी , इस COVID रूपी त्रासदी के असहनीय दर्द को शब्दों में डालने की कोशिश की है उम्मीद है आप लोगो तक वो दर्द की टीस पहुंचगी। एक ऐसा दर्द जो बयान न हो।।।लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात या अपने उन शब्दों को कविता में ढाल पाउँगा । कोशिश की है lockdown से आज तक का असहनीय सफर पंक्तियों में बांध सकूँ।
दिन गुजरते गए दर्द बढ़ते गए पलायन होते गए किसी के दोस्त किसी के रिश्ते सदा के लिए दूर होते गए। ..
आशा करता हूँ पसंद न आये किसी को यह कवितायेँ सिर्फ दर्द को हम सब समझे या करें साँझा।
नाम : रजनीश राय
पिता जी का नाम : जीत राम राय
माताश्री का नाम : उर्मिला देवी
शिक्षा : एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस।
स्थाई निवास : हैदराबाद , तेलंगाना
ईमेल : rajnishrai71@gmail.com
इंस्टाग्राम : rajnishrai71
ट्विटर : rajnishrai71
मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है। हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है, लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात बता पाऊंगा अपने उस छुपे से दर्द को शब्दों में बयान करूं। समय के साथ उस दर्द को धीरे-धीरे कविता के शब्द पिरोता रहा, और अब बचपन के कवि रूप के सपनों को हकीकत का रूप देने की कोशिश है। उम्मीद है आप लोगो तक वो दर्द की टीस पहुंचगी। एक ऐसा दर्द जो बयान न हो।।।
नाम : रजनीश राय
पिता जी का नाम : जीत राम राय
माताश्री का नाम : उर्मिला देवी
शिक्षा : एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस।
स्थाई निवास : हैदराबाद , तेलंगाना
ईमेल : rajnishrai71@gmail.com
इंस्टाग्राम : rajnishrai71
ट्विटर : rajnishrai71
अपने उस छुपे जज्बातों को शब्दों में बयान कर पाउँगा । समय के साथ उस प्यार,सुख, त्रासदी, दुःख या दर्द को
धीरे-धीरे कविता के शब्द पिरोता रहा, और अब बचपन के कवि रूप के सपनों को
हकीकत का रूप देने की कोशिश है। उम्मीद करता हूँ आप लोगो के दिल तक वो जज्बातों को पहुंचा पाउँगा ।।।
मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है।
हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है परन्तु इस दर्द को उजागर करना आज की आवश्यकता थी , समाज के ब्लैक होल्स असंख्य है कुछ मुद्दों पर प्रकाश डालने की कोशिश की है शायद कवि की कविता के माध्यम से समाज की बेहतरी में कुछ योगदान दे सकूँ बस इतना सा प्रयास है असहनीय दर्द को शब्दों में डालने की कोशिश की है उम्मीद है आप लोगो तक वो दर्द की टीस पहुंचगी।
जुर्रत तो की हमने चांद पाने की
पर खुद तारे न बन सके कभी हम
हमारा प्यार था रास्ते का पत्थर
या पत्थर थे रास्ते के हम
रजनीश राय हैदराबाद से है। यह एमबीए मार्केटिंग एंड फाइनेंस है। इन्हें किताबें पढ़ना और लिखना, संगीत और स्वयं गाना बहुत पसन्द है। इन्होंने अकस्मात मृत्यु, आत्महत्या, लॉकडॉन, पलायन, बाल शौषण, जातिप्रथा और प्रेम इत्यादि पर अनेक कविताएं लिखी हैं।
ये अपने जीवन में समय के साथ प्यार,सुख, त्रासदी, दुःख या दर्द को कविता के शब्द पिरोने की कोशिश करते रहते है। उम्मीद है आप लोगो के दिल तक वो अनछुए जज्बातों को पहुंचा पाएंगे।
मेरा नाम रजनीश राय है। मेरा जन्म हरियाणा के अंबाला शहर में हुआ है। हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना मेरी रूचि है, लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात बता पाऊंगा अपने शब्दों को साकार रूप दे पाउँगा। समय के साथ उन शब्दों को धीरे-धीरे कविता का रूप देता गया और कविता संकलन के साथ जुड़ता रहा , इस बार प्यार रूपी परिभाषा को अलग रूप देने की कोशिश है। उम्मीद है आप लोगो तक वो प्यार की कशिश पहुंचगी।
उपलब्धि : अमोदिनी स्याही , Charm in your Arms, The Black Hole of our Society, बीते लम्हों की याद में, Panademic , Love you Hamesha, मेरी बेबाक कलम इत्यादि
हमेशा ही कुछ अलग लिखते रहना आपकी रूचि है, लिखना जब शुरू किया तो पता नहीं था कैसे लोगों को अपने दिल की बात पहुंचा सकेंगे। समय के साथ उन शब्दों को धीरे-धीरे कविता का रूप देते गए और कविता संकलन के साथ जुड़ते रहे , इस बार प्यार रूपी परिभाषा को अलग रूप देने की कोशिश है। उम्मीद है आप लोगो तक उनकी वो प्यार की कशिश पहुंचगी।
Saturday, August 21, 2021
कुछ पहचान रख लो
Friday, August 20, 2021
पलायन का दर्द
Saturday, August 14, 2021
मानवता दूषित हो गई
जिधर देखो सनाट्टा पसरा
गतिमय जीवन हुआ स्थिर
सोच हुई प्रतिबंदित
चेहरे पे सब के कुछ उदासी छायी
कुछ न सूझे किसी को
लगा एक अनजान सा भय
क्या है वो किधर से यूं पास न आ जाये
शोर सिर्फ एम्बुलेंस का
करता विचलित सबको
सुनसान हुए सब रास्ते
किधर हुआ वह माहोल शोर का
चहचाना पक्षियों का
अब विचलित करने लगा सबको
कृतम सांसों की जरुरत सबकी
मायूस चेहरे तकते एक दुसरे को
चिक्तिसक बने दुआ सबकी
मृतक को न मिले अर्थी का सहारा
पारदर्शी बैग हुआ यूं अंतिम सहारा
इंसान बेबस अपनों का सिर्फ देखता चेहरा
शमशान में लगे चिताओं का मेला
पंक्तिबद्व हुए मृतक कहीं कुछ न बदला
त्रासदी आयी ऐसे
बहा ले गयी सब कुछ
मात पिता को खोया तो कुछ ने दादी नानी के दुलार को
खोया सहारा किसी ने तो किसी ने खुद के सहारे को
पर रोक न पाए इस त्रासदी को
प्रति क्षण कोसे हर एक इंतज़ाम
लगा भगवन ने भी किये किवाड़ बंद
प्रगति की हमने जितनी
लगा आज अभिशाप बन गयी
विस्तारवाद के लालच में
नए नए विनाशक अस्त्र की होड़ में
मानवता दूषित हो गई
मनुष्यता लुप्त हो गई।।।।
१३ अगस्त २०२१
Friday, August 13, 2021
अंधेरे रास्ते को करें अवगत
Friday, July 16, 2021
वो गया हो महक लुप्त यूं चंचल हवा में
Saturday, July 3, 2021
आपका स्वपन लेकर
आपका स्वपन लेकर ~ Post 22
मातृ प्रेम पर चन्द पंक्तियाँ लिख कर
सम्मान करें ममता या मातु प्रेम का
कुछ इस तरह सम्बोदित हुआ एक लेखन पर
हृदय उठी उमंग सोच इस गरिमा का
हाथ कलम ली सोच बचपन की
प्यार दुलार कभी गुस्सा कभी मार
खिलखिलाते उस बचपन के दिन चार
पूछते प्रश्न यूं बार बार
उत्तर मिले न चिड़न न गुस्सा एक बार
समय की गति निरतंर तेज हुए हम जवान
मातु प्रेम ममता या दुलार न मात्र कम हुआ आकार
किन्तु लिखते पंक्तियाँ रहे हाथ क्यों काँपकर
मातृ प्रेम का बोध विचार क्यों गए ह्रदय भेद कर
सच कहें या ह्रदय की सोच कुछ तो बोध लेकर
लगे वर्तमान के पन्नों को कुछ पढ़ने
ताना झगड़ना या मालूम नहीं की संज्ञा देकर
जिन हाथो ने दौड़ना सिखाया उन्हें छोड़कर
क्या लिखे मातु प्रेम पर लेख इस विराम को संग लेकर
कुछ हम न कर पाए पर दे ज्ञानं क्या सोचकर
प्रेम से जिन्हे प्रेम उन्हें कहें जीवन अति सूक्षम
जियें उस प्रेम को भी हमेशा
जो जीवन समर्पण सिर्फ आपको स्वपन लेकर .
सिर्फ आपका स्वपन लेकर। ...
रजनीश राय
15.07.2021
Wednesday, June 30, 2021
धुंधलाते से रिश्ते ~ Post - 21
समय की गति कुछ निराली है
कभी हो प्रतीत पगडंडी पथ भ्रमित वाली है।
क्या सोचे, क्या जाने या क्या कहे
या रात्रि सिर्फ अमावस्या वाली है।
प्यार के रिश्ते प्यार में, मोह या ममता मे
कभी हो प्रतीत सिर्फ मृगतृष्णा वाले है।
संतान प्रेम, क्या मात पिता तक सीमित हो
मोह ममता की इच्छा इक तरफा क्यों पाते हैं।
क्या दोष अच्छे संस्कारों, विचारों का
या समय करवट बदल छोड़ हमे आगे निकल जाते है।
रिश्तों की परिभाषा कुछ तो पथ भ्रमित है।
कुछ रिश्ते हुए धुंधले या नेत्र नीर धुंधला कर गया।
रिश्ते है धुंधलाते से लगा वक्त चुपके से कानो में कह रहा ।
कभी प्रतीत लौह सा हृदय कुछ सहम गया बस सहम गया ।।।
©rajnishrai
30.06.21
17:45 hours