Wednesday, January 25, 2023

दिल ए सब्र - Suppressed Inklings

पास आकर भी बहुत दूर हुए
आज वो जख्म नासूर हुए
जिनके तसव्वुर में हम मशहूर हुए
आज हम यूं खुद से बेबस मजबूर हुए 

राज क्या हुए उनके बेनकाब
फेरहिस्त बेहिसाब 
दिल ए सब्र मिला सिला लाज़वाब 
आज पुकारते राह न मिले कोई जवाब

फिर भी चाहकर न हुए दूर दिल से
हुए मुफ्त बदनाम इस मुहब्बत से
क्या ख़ाक तो क्या सरेआम बे दिल से
आज मिली जैसे एक राहत गुबारे ए दिल से

हर बहता आंसु यूं पी के
वो हर राह को बीच में छोड़ के
जैसे बस उम्र तमाम जी के
आशियाना बनता यूं खुद तोड़ के 
आज खुद ही चले ये जगह छोड़ के

रजनीश राय
०६/०९/२०२२
१३:३२

Monday, January 16, 2023

छिपाते हुए कुछ देखा - jhooti muskharat

आज हंसी पे आया सवाल
एक किस्सा संग याद आया

आवाज कुछ खनखनाती सी
लिए रेत का वजन सिर पे
पसीने से तरबतर बूंदे माथे टपकती सी
काम निर्माणाधीन इमारत पे
न जाने कितने पग नापती धरती
न थकान न शिकन कोई चेहरे पे
हंसी पे हंसी करती एक दूसरे से
सुबह से न जानें कब हुई शाम 
पर न आए चेहरे पे कोई थकान 
देख वो संपूर्ण वाक्य नज़दीक से
जाना जैसे बहुत कुछ यूं सीख के
सिर्फ बेबाकी से यूं जी के
क्या दर्द क्या दुख या कोई टीस से
हंसी आई क्या हमे कभी दिल से

हम आज तलाशते जिस हंसी को
उस हंसी में पूर्णता कहां 
न जाने देखा कितने चेहरों को 
कभी उदासी तो कहीं झुर्रियों को
पर न तलाश पाए खनखनाती सी 
वो बेझिझक एक हंसी को
देखा को बस यूं देखा
हर वक्त हर किसी को हंसी में 
छिपाते हुए कुछ देखा

रजनीश राय
२१/१०/२०२२
१७:१७

मन को एकाग्र करें कैसे - jhooti muskharat

चेहरे पर थकान झूठी हंसी लिए संग 
कुछ पास रहकर भी दूर हो गए जैसे
आंखों में उम्मीद आस का दामन छोड़ 
रास्ता पहचाना सा भूल गया हो जैसे
इस भाग दौड़ भरे जीवन में
राह समीप पर गंतव्य दूर हो गए जैसे
सिर्फ अशांति है हर दिशा
मन को एकाग्र करें कैसे

अपने जहां अपनों को नहीं पहचानते
पराए बन कर जो आज हमको नहीं जानते
विश्वास का चोला ओढ़कर आए न जाने कहीं
फिर पहचान को पहचान से मिलाए कैसे
सिर्फ अशांति है हर दिशा
मन को एकाग्र करें कैसे

जलती हैं आंखे धूप के ताप से
कभी पक्की सड़क कभी किनारे से
वृक्ष की छाया भी लुप्त हो गईं जैसे
कटती है उम्र सिर्फ एक सोच पे कहीं 
हंसते है सिर्फ कुछ हंसी यादों पे कहीं
कोई क़रीब या दूर सब बेमतलब लगे यूंही 
अशांत है मन अशांत हर दिशा
इस मन को करे तो एकाग्र करें कैसे

रजनीश राय
२१/१०/२०२२
१७:३०

न कोई झूठी मुस्कराहट - jhooti muskharat

आए इस जीवन में, संग रख मां का मान
प्यार, दुलार, मार, सब संग रख विचार
हुए मां के कर्जदार

वो पल बालपन के न कभी भूल जाना
जुबान निकाल हँस कर भाग 
थाली संग माँ को भगाना 
माँ को देख जो कभी उदास
आकर अंग से लिपट जाना 
बारिश में भीगना, रात वो सर्दी की ठंडक 
फिर माँ के आँचल में छुप जाना 

हुए आज बड़े तो क्या 
है सिर्फ आज भी माँ संग जिद पे आना
कभी पढ़ाई तो कभी खेल 
जैसे पहला अध्याय माँ संग 
और खेल की हर वस्तु जिद पे पाना

बहुत प्यारा रिश्ता माँ और संतान का
आज चाहे कितने भी हो बड़े हम
रिश्ते चाहे लाख रखे हम
पर इस रिश्ते को न कभी भुलाना 

सब रिश्तो को रख दर किनार 
असीमित माँ का प्यार, अलौकिक रिश्ता 
जिसका न कोई पार, वो सिर्फ माँ का प्यार 

न कोई झूठी मुस्काराहट न कोई बहाना
मां सिर्फ सच्चाई, प्रेम, त्याग की मूर्त 
हमको सिर्फ मस्तक नवाना 

रजनीश राय
१९:२८
०७.०५.२०२२

अतीत की कोई कीमत नहीं होती- jhooti muskharat

क्यों हर हंसी में खुशी नहीं होती
हंसते तो है सब 
पर वो खनक नहीं होती

झुठी हंसी जी कर 
तमाम उम्र निकाल देते
पर चेहरे पर कोई शिकन नहीं होती

कोशिश तो करते है हम भी
हंसते है बेपरवाह से
पर आंखों को वो बर्दाश्त नहीं होती

आज लिख रहे है 
मन को सहला कर
आंसुओ को बहला कर
यादों का कोई लम्हा चुरा कर
आंसू तो न हुए सगे कभी
अब तो लगता है 
जैसे अतीत की कोई कीमत नहीं होती

रजनीश राय
१६/०१/२०२३
१८:३०


वो मुस्कराना बस आदतन - jhooti muskharat

वो मुस्कराना बस एक आदत बन गई
अंदर है न जाने कितने बवंडर
हर एक आस बनी निराशा 
शायद वो एहसास एक आदत बन गई

रो लेना अंदर ही अंदर सीमित हो गया
आहत सी होती है कभी वो जानी पहचानी
परछाई जैसे कोई पुरानी
आज फिर उदास मन दिन ढला हुईं शाम 
लो रात का हुआ आगमन 
वो मुस्कराना तो बस आदतन 

गम न जाने विरासत में थे शायद पाए 
जीवन गर्म रेत पर चलते हम सदैव
और आंसु बन भाप उड़ गए जैसे
न किसी से गीला न कोई शिकवा
शायद तकदीर में यही लिखा लाए 
हर खुशी संग फिर क्यों आज हम 
उन्हे कहीं न देख पाते है बस यूं प्रतीत 
उस हंसी को कहीं दूर भूल आए है
वो मुस्कराना बस आदतन संग लाए है

आज नहीं सब में, सिर्फ यादों में
हर लम्हात मुस्करा, अनछुए दामन में छुपाए है
वो मुस्कराना बस आदतन
हंसी को कहीं दूर भूल आए है

Thursday, January 12, 2023

किसी का सपना * Dream

आज चले हम कुछ सोच 
राह हो हसीन 
मेहनत करे यकीन
सपने हो अधीन
मन में हजार किरदार

राह आया जो एक मोड़
सपने टूटे कांच बन
हर किरदार हुए छीन भिन्न 
जैसे सब चला समापन की और

आया सुखा पत्ता उड़ता हवा में
किया सपर्श चेहरे को
न जाने कौन दिशा वो आया
पर मस्तिष्क को झंकोर गया

मिला एक अद्भुत ज्ञान जैसे कोई 
बन फरिश्ता कुछ कहता वो पत्ता 
टूटा जो पेड़ से 
फिर भी न हुआ बोझिल
संग हवा के उड़ चला मस्ती में झूम कर
न कोई अस्तित्व फिर भी आशा है
जाते जाते भी सर्द मौसम 
अग्नि में समाकर
किसी गरीब का हाथ गरमा पाऊं 
चिड़िया या गौरिया कोई संग ले चले
अपना घोंसला सजा पाएं 
सपना नहीं है ये कोई
पर दुआएं तो संग पाऊंगा

अति सूक्ष्म रूप में आई 
आज एक नई बात समझ 
जीवन कभी जाता नहीं व्यर्थ
हमने लिया है जन्म शायद
किसी का सपना बनकर

रजनीश राय 
१२/११/२०२२
२०:२१

कोई उम्र नहीं होती * Dream

शायद जीने की कोई वजह न होती
गर सपनों की कोई सीमा नहीं होती
एक छुपी हुई आशा जैसे उम्र भर
पूरी नहीं होती

आज सपनों के मध्य खड़े हर कोई
जैसे सागर की कोई सीमा नहीं होती
फिसलता हर लम्हा हाथ से रेत की तरह
वक्त की कमी पूरी नहीं होती

भागता दौड़ता हर एक शख्स 
नेत्र किए बंद जैसे एक होड़ हो कोई
न कोई खुशी न अपनेपन की चाहत 
पर लगाव की कोई कीमत तो नहीं होती

सपने प्रतिबिंब परछाई के
हम चले कदम जितने
वो संग नही बस और आगे चले जाते है
जैसे थोड़ी सी जगह में
बड़ा सा घर बनाते की चाह रखते है
मन में जोश दिल में एहसास
चांद सूरज की चाह
अथाह सागर की गहराइयां
अतः बन परछाइयां
सदैव कदमों से रह जाती दूरियां

करो ना कैद खुद को सपनो में इतना
अपनो में ढूंढो हर एक सपना
वर्तमान को लो अपना मान
क्योंकि हसीन वक्त की यारो
कोई उम्र नहीं होती

रजनीश राय
१२/११/२०२२
१९:५३