ह्रदय वेदन (माँ /पिता )
बस पुत्रशोक मिला उधार।
हर चहरे में एक चेहरे को तलाशती आँखे।
आँखों में है नीर भरा दिखती सिर्फ नम आँखे।
दुःख दर्द सहज अत्यंत कुछ न कहती आँखे।
अपना दुःख सिर्फ सिमित रख बस यूं सहमी आंखे।
दस्तक गर हुई द्वार तो पल पल कुछ तकती आँखे।
शायद आया पुत्र माँ यह आस लगाती आँखे।
नयन तकते राह एक तेज से प्रवाह को।
गति के गतिमान प्यारी सी मुस्कान को।
चेहरे में एक नूर माँ के दुलार को।
नयन से छुप कर हॅसने वाले लाल को।
चलते गिरते बालपन के उस मस्तचाल को।
सब कुछ माँ से कहने वाला ऐसे गोपाल को।
बस पुत्रशोक मिला उधार।
हर चहरे में एक चेहरे को तलाशती आँखे।
आँखों में है नीर भरा दिखती सिर्फ नम आँखे।
दुःख दर्द सहज अत्यंत कुछ न कहती आँखे।
अपना दुःख सिर्फ सिमित रख बस यूं सहमी आंखे।
दस्तक गर हुई द्वार तो पल पल कुछ तकती आँखे।
शायद आया पुत्र माँ यह आस लगाती आँखे।
नयन तकते राह एक तेज से प्रवाह को।
गति के गतिमान प्यारी सी मुस्कान को।
चेहरे में एक नूर माँ के दुलार को।
नयन से छुप कर हॅसने वाले लाल को।
चलते गिरते बालपन के उस मस्तचाल को।
सब कुछ माँ से कहने वाला ऐसे गोपाल को।
मित्र पग पग चले अब क्यों नहीं आते मिलाने को।
जवान कद या एक निखरे रंग के नज़रने को।
आसमान निगला या राह के बने निवाल को।
हम ने खोया जग ने छिना या ईश की चाह को।
सब कुछ हुआ यूं शांत हम मिले अशांत को।
क्या प्रश्न क्या उत्तर मिले एक अंधकार को।
रास्ते तकते उस मस्त को गालियां हुई उदास।
हवाएं भी हुई शांत लगे प्रकृति करे अट्हास।
दिन भी रोये मुझ संग अब रात करे पुकार।
संग है सब मेरे बस पुत्रशोक मिला उधार।
रजनीश राय

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