कुछ सोचा लिखें ली कलम हाथ
आस के प्रवाह यूं निराशा हुई साथ
संग थे कईं रँग कईं हर पल साथ
हसीं थी कहीं खुशियाँ थी खास
जीवन गति न अवरोध न खट्टास
समय बदला लगा यूं कोई मजाक
कम हुई खुशियाँ ग्रहण हो कोई
हाथ की लकीरें कहें यूं अनजान कोई
दिशा बदल यूं अंचभित हुई
ह्रदय हुआ अनजान न जाने कोई
अनेक सवाल न मिले जवाब कोई
लुप्त हुआ सुर्य अंधकार में कहीं
समाप्तः हुई लहरें समंदर में कहीं
रुकी यूं हवा सहमा हो कोई
आँख कहे अब नीर न शेष कोई
सब है साथ पर तुम सा न कोई
यादें है बस साथ जैसे परछाई कोई
संग थे जो अपने न जाने रहते है कहीं
आस की दिखे या मिले
बस एक बार वो मासूम चेहरा कहीं
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Written : 14.08.2018 12:50 pm
रजनीश राय
©rajnishrai
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