जब हो प्रतीत तब स्मृति न बने अतीत
पंक्तियों की करवट ने दी दस्तक
सोच कर यादों में हुई हरकत
सोचा कहीं लेख न बन जाए
कविता लिखते लिखते
छीन न जाए यूं कवि शीर्षक
अंधेरे रास्ते को करें अवगत
दौड़ रहे नौजवान जिसपर सरपट सरपट
खुद में हुए गुम लगा वक्त यूं ठहरा
स्मरण आया पड़ोस का वो सुंदर नौजवान
खिलखिलाता वो मनमोहक चेहरा
भुजाओं में दौड़े जैसे गर्म लहू गहरा
कुछ संगत से न अवगत
न चालाकी की संगत
भोल्पन में बड़प्पन
जवानी की नासमझ
रास्ता बहका नशे में कुछ कम
फिर जहरीले ड्रग्स को लिया अपनी शरण
बढ़ते बढ़ते हुआ बड़ा हर एक वयसन
मुड़ना तो दूर सोच बन गयी प्रतिबंद
कुछ कहना सुनना अब सब हुआ बंद
संगत हुई नदारद बस खामोशी रही संग
वापसी की न राह सोच लगने लगा हरदम
आयी कुछ ऐसी खबर
कानो न यक़ीन हुए नेत्र नीर भी कम
सोच कर हुए हाथ पैर सुन्न
न रहा जवान लिया मौत को थाम
किसको दे सब्र हर इंसांन परेशांन
ऐसा पग क्यों थामे जहाँ की राह गुमनाम
सोचो जन्मदाता की कभी मिले यूं राह अपरिचित अनजान
गलत दिशा राय न देंगे मन में लो ठान
चाह कर भी न लो यह कदम विनिती हरदम
न रखो यह सोच करें फरियाद तुमसे ऐ जवान
इस ह्रदय-विदारक सोच के आगे भी है कदम
यूं बदल इस सोच बनो एक क्रियात्मक उदहारण
रजनीश राय
१३ अगस्त २०२१
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