Saturday, August 21, 2021

कुछ पहचान रख लो

आयी त्रासदी सब कुछ गया बदल 
जीवंत से माहौल में हर पल आंतक 
बालपन का सिमित समय बना नीरस 
यूं जवानी का जीवंत पल हुआ बेबस 
तो हुई वृद्ध अवस्था भी अंत्यत बोझिल 

इंसान हुआ बेबस कुछ इस तरह 
ले रहा सांसें भी सोचकर 
कह रही मायूसी मुख पे 
न जाने क्या सोचे हल पल 

लाये त्रासदी एक नया मोड़ हर पल 
जीने की होड़ हर पल एक नया मोड़ 
किसी ने खोया मित्र बंधू 
तो रोये कोई खून के रिश्तो को गवाकर 

त्रासदी का कुछ ऐसा चला चक्र 
पलायन का दर्द भी रहा एक बोझ बनकर 

लगी औषदी भी प्रतिस्पर्धा की दौड़ 
हर देश कहें हम है बेहतर 
देश से दूसरे देश  
शहर से अपने शहर को लगा पहरा 
अनिवार्य औषदि पत्र लगे पहचान पत्र हो सबका 

सोंचे तो लगे क्या और क्यों है ये सब 
लगे कभी एक चाल सा 
राजनीति को भी सोचा बहुत 
क्या यह उदेशय वव्यवसाय का 

आप सब है बुद्धिजीवी कुछ तो बोलो 
हम कवियों की है सिमित सोच
आप कुछ तो पहचान रख लो 
पहचान रख लो। ...  


रजनीश राय 
२१ अगस्त २०२१ 

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