अंधकार सा है बिखरा
जिधर देखो सनाट्टा पसरा
गतिमय जीवन हुआ स्थिर
सोच हुई प्रतिबंदित
चेहरे पे सब के कुछ उदासी छायी
कुछ न सूझे किसी को
लगा एक अनजान सा भय
क्या है वो किधर से यूं पास न आ जाये
शोर सिर्फ एम्बुलेंस का
करता विचलित सबको
सुनसान हुए सब रास्ते
किधर हुआ वह माहोल शोर का
चहचाना पक्षियों का
अब विचलित करने लगा सबको
जिधर देखो सनाट्टा पसरा
गतिमय जीवन हुआ स्थिर
सोच हुई प्रतिबंदित
चेहरे पे सब के कुछ उदासी छायी
कुछ न सूझे किसी को
लगा एक अनजान सा भय
क्या है वो किधर से यूं पास न आ जाये
शोर सिर्फ एम्बुलेंस का
करता विचलित सबको
सुनसान हुए सब रास्ते
किधर हुआ वह माहोल शोर का
चहचाना पक्षियों का
अब विचलित करने लगा सबको
चिकित्सालय में लगा जमघट
कृतम सांसों की जरुरत सबकी
मायूस चेहरे तकते एक दुसरे को
चिक्तिसक बने दुआ सबकी
कृतम सांसों की जरुरत सबकी
मायूस चेहरे तकते एक दुसरे को
चिक्तिसक बने दुआ सबकी
मौत का तांडव है गहरा
मृतक को न मिले अर्थी का सहारा
पारदर्शी बैग हुआ यूं अंतिम सहारा
इंसान बेबस अपनों का सिर्फ देखता चेहरा
शमशान में लगे चिताओं का मेला
पंक्तिबद्व हुए मृतक कहीं कुछ न बदला
त्रासदी आयी ऐसे
बहा ले गयी सब कुछ
मात पिता को खोया तो कुछ ने दादी नानी के दुलार को
खोया सहारा किसी ने तो किसी ने खुद के सहारे को
पर रोक न पाए इस त्रासदी को
मृतक को न मिले अर्थी का सहारा
पारदर्शी बैग हुआ यूं अंतिम सहारा
इंसान बेबस अपनों का सिर्फ देखता चेहरा
शमशान में लगे चिताओं का मेला
पंक्तिबद्व हुए मृतक कहीं कुछ न बदला
त्रासदी आयी ऐसे
बहा ले गयी सब कुछ
मात पिता को खोया तो कुछ ने दादी नानी के दुलार को
खोया सहारा किसी ने तो किसी ने खुद के सहारे को
पर रोक न पाए इस त्रासदी को
कैसी आयी लहर समझ न पाए इंसान
प्रति क्षण कोसे हर एक इंतज़ाम
लगा भगवन ने भी किये किवाड़ बंद
प्रगति की हमने जितनी
लगा आज अभिशाप बन गयी
विस्तारवाद के लालच में
नए नए विनाशक अस्त्र की होड़ में
मानवता दूषित हो गई
मनुष्यता लुप्त हो गई।।।।
प्रति क्षण कोसे हर एक इंतज़ाम
लगा भगवन ने भी किये किवाड़ बंद
प्रगति की हमने जितनी
लगा आज अभिशाप बन गयी
विस्तारवाद के लालच में
नए नए विनाशक अस्त्र की होड़ में
मानवता दूषित हो गई
मनुष्यता लुप्त हो गई।।।।
रजनीश राय
१३ अगस्त २०२१
१३ अगस्त २०२१
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