Saturday, August 14, 2021

मानवता दूषित हो गई

अंधकार सा है बिखरा 
जिधर देखो सनाट्टा पसरा 
गतिमय जीवन हुआ स्थिर 
सोच हुई प्रतिबंदित 
चेहरे पे सब के कुछ उदासी छायी 
कुछ न सूझे  किसी को 
लगा एक अनजान सा भय 
क्या है वो किधर से यूं पास न आ जाये 
 
शोर सिर्फ एम्बुलेंस का 
करता विचलित सबको 
सुनसान हुए सब रास्ते 
किधर हुआ वह माहोल शोर का
चहचाना  पक्षियों का 
अब विचलित करने लगा सबको 

चिकित्सालय में लगा जमघट 
कृतम सांसों की जरुरत सबकी 
मायूस चेहरे तकते एक दुसरे को 
चिक्तिसक बने दुआ सबकी 

मौत का तांडव है गहरा 
मृतक को न मिले अर्थी का सहारा 
पारदर्शी बैग हुआ यूं अंतिम सहारा 
इंसान बेबस अपनों का सिर्फ देखता चेहरा 
शमशान में लगे चिताओं का मेला 
पंक्तिबद्व हुए मृतक कहीं कुछ न बदला 
त्रासदी आयी ऐसे 
बहा ले गयी सब कुछ 
मात पिता को खोया तो कुछ ने दादी नानी के दुलार को 
खोया सहारा किसी ने तो किसी ने खुद के सहारे को 
पर रोक न पाए इस त्रासदी को 

कैसी आयी लहर समझ न पाए इंसान 
प्रति क्षण कोसे हर एक इंतज़ाम 
लगा भगवन ने भी किये किवाड़ बंद
प्रगति की हमने जितनी  
लगा आज अभिशाप बन गयी 
विस्तारवाद के लालच में 
नए नए विनाशक अस्त्र की होड़ में
मानवता दूषित हो गई 
मनुष्यता लुप्त हो गई।।।।

रजनीश राय 
१३ अगस्त २०२१ 

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