लॉक डाउन का हुआ आगमन
देश हुआ पुर्ण स्थिर
व्यापर, नौकरी वालो ने ली घर की शरण
हम लगे कुछ लिखने उस त्रासदी के गम
सोच उन दिन दिहाड़ी मजदुर के संग
सोच उन बेबस बुजुर्ग महिला पुरुष
क्या बेचते यूं फूल या सब्जी प्रतिदिन
एक रूप देखा ऐसा बयान करें तो भी न होगा कम
आये नए शहर गांव से कुछ रोजी रोटी कमाने
रास्ता ये उचित हो परिवार का लालन पालन
समय ने यह क्या ली करवट
रह गए अपने ही देश में बन के एक बंधक हम
दिन बड़े ओर बढ़ते गए
त्रासदी के समाचार और विचलित करते गए
क्या ट्रैन क्या बस या हवाई यात्रा सब हुए स्थगित
त्रासदी के भय ने सब तो किया यूं कमरों में बंद
पर संदेश न हुए बंद
कभी रोये माँ तो कभी पत्नी भोले बचो संग
आ जाओ क्या पता हो न कभी मिलन
क्या पिता क्या पुत्र सब हुए नेत्र नीर संग
पग न सूझे कोई कब तक रहे
यूं बंद कमरों में कब तक रहे सोचते हम
मन में ठान कुछ अनोखा सा प्रण
चल पड़े मुसाफिर घर कुछ यूं साइकिल पर
या चल पड़े पैदल ही क्या सोचकर
जवान पुरुष क्या स्त्री बच्चे और क्या बुजुर्ग
सर पे थामे पोटली हाथ बच्चो के संग
लम्बा है कितना रास्ता ये सोच न रख साथ
पानी की बोतल कुछ रोटी संग कटा रास्ता
कोई पहुंचा घर हफ्तों में तो कोई हैअभी तक लापता
सोच कर ही हुआ मन विचलित
दशा क्या करूँ ब्यान उनकी जानकर
ह्रदय हुआ शर्मसार
इंसान और इंसान में भेद जानकर
मानवता हुई शर्मसार
सब है बराबर बोलने वालों की सचाई जानकर
जब त्रासदी ने न किया भेद
इंसान को क्यूँ न आया समझ यह देखकर।
विचलित ह्रदय कोसे हर पल पल
पलायन का दर्द रहेगा एक बोझ बनकर
एक बोझ बनकर। ..
रजनीश राय
२० अगस्त २०२१
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