Sunday, September 19, 2021

दुआ कबूल हो जाने की - Meri Bebaq kalam -2

खुली किताब सी जिंदगी में
बेबाकी से ढोते रिश्तों की 
गम की ओढ़ के चादर
टूटी माला पिरोते यू खुशियों की 

खुशियों का अनंत गहरा सागर 
मोती सीप क्या शंख से प्रतीत 
इक  पल लगे सब है अपने साथ 
दूसरे पल कब बने जाते अतीत 

फिर एक मोड़ आये  चार कदम पे 
चले हंस के हम आँखे नम लेके 
पसीने की बूदों को ललाट से हटा के
यादों के उस बोझ को सिमटा के 

बालपन की यादों को रखा संजो कर 
उम्र कटे सिर्फ उसकी ही हो कर 
आये न याद वह लड़कपन उसका 
जिसमे रहा में बस सब खो कर 

कभी लगे स्वपन में एक और स्वपन 
नींद में कुछ यूं ढूंढती बंद आखें
कभी राह तो कभी रहगुजर से
रास्ता पूछती यह थकी आंखे 
आदत हो गयी कुछ शाम के 
बाद रात फिर सुबह तक जागने की 

लम्बी उम्र की दुआ न मांगे 
कुछ मांगे तो उम्र जल्द बीत जाने की 
इल्तज़ा करें तुमसे यारों 
करो दुआ हमारी दुआ कबूल हो जाने की 
कबूल हो जाने की। ..... 

रजनीश राय 
१७ सितम्बर २०२१ 

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