Sunday, September 19, 2021

अल्फाज कोरे कागज़ पर - Meri Bebaq kalam -3

लकीरे हाथ की न जाने कब लगी रास्ता बदलने 
या हम हुए किस राह में गुम 
फिर दिए अपनेपन ने भी इतने गम 
काश होते हम भी कुछ मतलबी से 
बेवफाई क्या दुश्मनी भी झेल जाते हरदम
काश कह पाते हर जज्बात हंस के 
पर जज्बातों के तले हुए दफ़न 

आईनो की दुकान पर खड़े 
तकते हर एक आइना 
अंदर छुपा के एक अम्बार 
फिर भी हँसता सा रूप दिखे क्यूं हर बार 

जिए जा रहे हैं हम यहाँ 
आइना सा प्रतिरूप ले 
थामे जिगर पे रुसवाई का पहाड़ 
मुस्कुराते चेहरे क्या दोस्त क्या बाजार 

रहे वो धरती पर तो गरुर है इतना
मजार में तो लगे हर शक्श एक सा 
यूं आयी खुद पे हंसी कुछ सोच कर 
जब हमने खुद तो बनाया इतना कमजोर
लो आज हुए हम उस दिल के हाथों मजबूर 

अल्फाजों को लिखते कोरे कागज़ पर
हम न जाने कितने बार
देखें जब भी उन्हें पास से जाते
कदम रखती हिम्मत यूं पीछे 
नैना कहे हम न दोषी
दिल चला दूसरी राह 
हर शिकवा खुद को समझाकर
हमको समझा कर।।।।

रजनीश राय
१९ सितंबर २०२१

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