कुछ भूतकाल कभी वर्तमान।
भविष्य का प्रत्येक पृष्ट अनजान।
कुछ स्वपन लगे सत्य वर्तमान।
चेतन मन फिर क्यों अशांत।
ज्ञानी मत सब एक है प्राण।
न पिता न माँ न भाई सब अनजान।
जीवन सार मनुष्य मन न सहमत।
मोह के दर्पण चले संग क्यों प्राण।
मुक्ति जीवन यूं कमजोर डोर।
प्रत्येक कथन प्रतीत अनजान।
चेतन मन फिर क्यों अशांत।
मूक दर्शक हम बैठे क्यों।
क्या अभिनय करना जीवन सार।
सार अभिनय तो फिर क्यों न दुःख सुख समान।
कोई लम्बी आयु क्योंकर जीते होते परेशान।
कोई नन्ही आयु प्रसन्न फिर क्यों सिमित प्राण।
प्रत्येक प्रश्न एक प्रश्न बना।
हर क्षण चुभन मस्तिष्क अनजान
ज्ञानी मत सब एक है प्राण।
न पिता न माँ न भाई सब अनजान।
जीवन सार मनुष्य मन न सहमत।
मोह के दर्पण चले संग क्यों प्राण।
मुक्ति जीवन यूं कमजोर डोर।
प्रत्येक कथन प्रतीत अनजान।
चेतन मन फिर क्यों अशांत।
मूक दर्शक हम बैठे क्यों।
क्या अभिनय करना जीवन सार।
सार अभिनय तो फिर क्यों न दुःख सुख समान।
कोई लम्बी आयु क्योंकर जीते होते परेशान।
कोई नन्ही आयु प्रसन्न फिर क्यों सिमित प्राण।
प्रत्येक प्रश्न एक प्रश्न बना।
हर क्षण चुभन मस्तिष्क अनजान
चेतन मन फिर क्यों अशांत।
कहे गीता सार दुःख मेरा या तेरा समान।
फिर क्यों मध्य न आते दुःख में भगवान्।
माँ को एक रूप में भगवन कहलाया।
न आता दिखे संतान दुःख
कहे गीता सार दुःख मेरा या तेरा समान।
फिर क्यों मध्य न आते दुःख में भगवान्।
माँ को एक रूप में भगवन कहलाया।
न आता दिखे संतान दुःख
न मन में कुछ परेशान।
कहते है लोग होता एक आभास
कहते है लोग होता एक आभास
दुःख में जब संतान।
हारे इन कथनो के हम बस रहे अनजान।
विशाल तख्त न बिठायो बस रहने दो इंसान।
माँ जननी संतान दुःख असिमित,
हारे इन कथनो के हम बस रहे अनजान।
विशाल तख्त न बिठायो बस रहने दो इंसान।
माँ जननी संतान दुःख असिमित,
सिमित हर अल्पविराम।
रजनीश राय
१९ सितम्बर २०२१
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