Sunday, September 19, 2021

कुछ गमगीन हो कर - Meri Bebaq Kalam 1

अपनी सुगंध सा स्वपन में कोई उठाए झंझोड़कर 
बारिश की बुंदो सा स्पर्श आंखो को भिगो कर 
कोहरे में दिखे यूं रोशनी अंधेरे को चीर कर
कंबल ओढ़े सिर्फ जिस्म हाथ तपते अग्नि पर
चित्र कुछ अधुरा लगे आंसू या हंसी बिन लबों पर
आंसू सा ज़िद्दी न हो अलग खारेपन से जुड़कर
कुछ एहसास सा कराएं अपना न समक्ष होने पर

मरुस्थल की मृगतृष्णा सा करे बेचैन हर डग पर
अश्रु बह चले सर्द लहर मे भी गर्म बूंद बन कर
लहरों को तकते सोच रुके संग अपने से हो कर
हर दिशा देखें कुछ तो मिले अपना सा हो कर
क्या क्या सोच बैठे हम भी कुछ गमगीन हो कर
अपनी सुगंध सा स्वपन में कोई उठाए झंझोड़कर

सोचते हम बैठे प्यार की उम्र क्या करे नापकर
जीवन खुशी कभी गम कटे राह सिर्फ चलकर
माना पथ है पथरीला क्या करे सिर्फ सोचकर
याद वो एहसास, प्रयास कभी हंसी सब देखकर
बस कुछ एहसास कराएं अपना न समक्ष होने पर
क्या क्या सोच बैठे हम भी कुछ गमगीन हो कर
कुछ तो गमगीन होकर। .. 
या कुछ ग़मगीन होकर। ..

रजनीश राय 
९ सितम्बर २०२१ 

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