एक नन्ही परी यूं लगे जन्नत से उतरी
देख निहारते सभी
लगे खिलौना कभी कभी
हँसी में जिसकी चंचलता
सब के दिल की वह नूर
वक़्त ने ली करवट
नन्ही परी उम्र लड़कपन
हंसी की वह बातें
वह छेड़ना सब को आते जाते
लगे समय बन पहिया दौड़े
सब का दुलार पाते पाते
अव्वल शिक्षा
हर शिक्षक से प्रशंसा
और सब का प्रोत्साहन पाया
हुई शिक्षा समाप्त
उत्तीर्ण हर परीक्षा में
ऊँचा एक ओहदा पाकर
माता पिता को गौरान्वित करवाया
चलते सब के संग
जवानी की दस्तक आये द्वार
बचपन लड़कपन छूटा उस पार
एक नौजवान
मात पिता संग शुभ कदमो से
शुभ विवाह की रीत से
हाथ गौरी का संग पाया
हम क्यों कुछ सोचे गलत
जब सब है उचित
कविता अति मोहक
पर संदेश क्या दिया हमने बन लेखक
जन्म बालिका तुम्हे उपहार
बालिका भूर्ण हत्या न सही विचार
मां का न भूलो उपकार
बहना का अमोघ प्यार
पत्नी बन जीवन व्यवहार
नारी सहनशीलता की सोच से पार
वक्त आए तो बने कटार
शिक्षा उचित और प्रेम गर मिले आपार
माता पिता भाई या पति सहयोग परस्पर
पड़ लिख कर बेटियां
संग बड़ाए कदम तो पड़ता है असर
हां पड़ता है फर्क
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