Monday, May 9, 2022

नसीब में सबके हंसी नहीं होती - कलम बेजुबां


सूखे पत्ते गिरने पर मलाल न करना
सपने गर अधूरे रह जाए 
तुम शिकायत न करना
नसीब में सबके हंसी नहीं होती
हर हंसी में खुशी नहीं होती
आंसू छुपा लेते है गम
पग पग मंजिल को ढूंढते रास्ते संग संग
किधर जायेंगे या जाएंगे थम
पर मुकाम की ख्वाइश कम नहीं होती
क्योंकि नसीब में सबके हंसी नहीं होती

टूटते यूं ख़्वाब आस के 
गिरते सूखे पत्ते यूं शाख से 
नित देखते रहते उस राह को 
अब लगे जैसे किश्ती बिन पतवार के 
पीते हम भी बेपरवाह से
पर नशे की कोई भनक नहीं होती
फिर तकते उस राह को
मुकाम की ख्वाइश कम नहीं होती
जैसे नसीब में सबके हंसी नहीं होती

आँखों का गम 
शायद न समझ सका कोई 
हंसे तो सब क्यों हंसे
रोए तो सब चल दिए कहीं 
हुआ कमजोर अब तो दिल भी
छोटी सी चोट भी सहन नहीं होती
दिल करे रुलाने का तो रूला दो
रोने के बाद हंसी अपनी सी नही होती
नसीब में जैसे सबके हंसी नहीं होती

दिन चढ़ता रात ढलती
कभी मुश्किलें आसान नहीं होती
निकल न पाते इस मोहपाश से
जितना करते संग खुद को
दूरी बढ़ती और करती अलग मुझको
चिराग तले अंधेरा तो है कभी भी
रोशनी भी अंधकार को कम न करती
अब तो लगे सत्य नसीब में हंसी नहीं कोई

रजनीश राय
२७ अक्टूबर २०२१

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