Monday, May 9, 2022

खुद पे आई जब वो बात = कलम बेजुबां

क्यों हुए हमसे वह नाराज़ 
बना एक गहरा राज 
प्यार में क्या हुई कोई बात 
हम बने इंसान जिनके लिए 
क्यों चले आज चुरा कर आँख 
गए शहर भी छोड़ दे गम ए सौगात

वक़्त चला हम भी चले  
ओढ़ी चादर यादों की 
ख़ामोशी संग हुआ याराना 
दिन ढले रात चली
पलक मूंदे तो दिखे स्वपन में
हँसे तो खुशी का एहसास कम 
लगे जैसे कोई आस पास होकर भी गुम

पर न जाने आज क्यों है बेचैन मन
सोचता हर पल वह बीतें क्षण 
आयी हवा संग खुशबू पहचानी सी 
नेत्र लगा यू जागे नींद से
जब देखा पलट हुए स्तंभ
घर वापिस आते उनको देख हुए दंग
उत्सुकता से बड़े कुछ कदम आगे 
आते देख संग डॉक्टर कदम गए सहम 

वीरांगना सी लड़ती कैंसर से 
हर दिन एक नई उम्मीद बन
लगता कहीं और थे अटके प्राण
जैसे नयनों को एक आस तमाम
यूं हर तरफ एक चर्चा बनी आम 

बेचैन मन कर के हिम्मत पहुंचे जब पास
मां को कर इशारा भेज बगल के कमरे में
बंद होंठों से बुबुदाते 
ले प्यार से हमारा हाथ थाम
माफ करना हमको ये थी सच्चाई
जिसे रखा हमने छुपा अपने पास
कह चंद शब्द गौरी ने ली आखरी श्वास
तकते हम जमीन गरम अश्रु ने दी आहट
रो कर भी न रो सके हम
आज खुद पे आई 
जब वो बात।।

रजनीश राय
२२ नवंबर २०२१

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