स्याही मिट के भी निशान छोड़े जैसे
लिखे है कुछ पृष्ठ अंधकार में
सुबह की धूप कहीं कोरा न कर दे लिखाई को
रास्ते है लंबे परछाई यूं शाम जैसे
अब न कटते रात दिन
सर्द जाड़ों की नींद जैसे
यादें भी न जाने कितनी बेहरहम
लगती है नासूर जख्म जैसे
हुस्न और इश्क़ हुआ है किसीका जो होगा अपना
कब चली आये दबे दबे से कदम
संग संग बेवफाई
तोड़ती हर एक हसीं सपना
हम खड़े रास्तों पे
या रास्तों ने बस किया अपना
वक्त था किसका जो होगा अपना
याद है आज भी वह खिलखिलाना
हँसते से प्यार में गले लगाना
जिंदगी गुजारेंगे संग संग वादों की लड़ी
मुस्करा के कनखियों से निहारना
रख के बालों को खुला
इच्छा ऐ तारीफ़
कुछ इतराना
लगते है अच्छे अब तो जख्म भी
याद आयेंगे हमें भूल जाने के बाद भी
हँसते हम खुद को ही दोष दे कर
सोचते फिर उन लिखे अल्फाज़ो पर
सुबह की धूप कोरा न कर दे कहीं लिखाई को
लिखे थे जो अंधकार में
प्यार की कलम में भीगोकर। ...
रजनीश राय
१६ नवंबर २०२१
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