रिश्तों की डोर पकड़ कुछ कदम चल पाते
हर पल बंधे रहे उन बंधनों से
जो शायद हमे कुछ समझ पाते
प्यार की ख्वाइश थी जिनसे
वो बिना कुछ कहे हमे जान जाते
हंसते तो है हर पल
पर खोखली हंसी नही सह सकते
राह न मिले कभी
पर उनके घर का रस्ता नहीं बदल सकते
प्यार से उठ गया भरोसा
लेकिन उन्हे प्यार करना नही छोड़ सकते
आ के यूं पास क्यों मुंह मोड़ लिया
कुछ तो कहा होगा
कुछ तो सुना होगा
हम देते यूं खुद को इल्जाम
क्या उनके काबिल हमे न पाया होगा..
गम की बारिशों में या करवटों की आहोंं में
इस कदर बदले वो आज हम खड़े राहों में
अश्रु क्या दिखते आंखों में
ढूंढते सब जिन्हे बरसातो में
लो हम भी बन गए अब अनजान
यूं मिले वो जब भी राह में
यादें कुछ बेपरवाह हो जाती है
हवा जो ले रुख हमारी तरफ
खुशबू भी उनकी संग ले लाती है
जिक्र जो हो कभी उनका
जेहन में सलवटे सी पड़ जाती है
कशिश में है उनकी कुछ जादू
दिल का जख्म फिर हरा कर जाती है
रजनीश राय
१५/०६/२०२२
१७:२१
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