आज भी याद आए जब
खुद को बहुत अकेले पाते है हम
न जाने क्या सोचकर
बस खामोश हो जाते है हम
बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।
आज न जाने क्यों आती उसकी याद
दिखे वह हमें हर तरफ
हम जब आँख मूंदे हर बार
समय अति गतिशील
लगा छूट गए अपने कुछ उस पार
यूं कुछ सोचकर खामोश हो जाते है हम
बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।
वह हँसी वह मुस्कारहट
संग संग जीवन मोह की मीठी आहट
पर अब रास्ते हुए अंजान
यूं तकते हम उन राहों को
बन एक जीवंत पाषाण
यूं कुछ सोचकर निष्प्राण हो जाते है हम
बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।
मुस्कारहट ने छोड़ा साथ कब का
हुए मतलबी नेत्र संग अश्रु भी
हँसे कभी तो गिर जाते है
रोए तो आँखों में टिक जाते है
हर पल आंखों में चुभन सी पाते है हम
बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।
हुआ सूर्य अस्त लगे कम्पन
लगता अब डर रात से
हर एक एक लम्हा आगे बड़े
हम खड़े डरते अपनी परछाई से
यादों को खुद से जुदा न कर पाते है हम
खुद को बहुत अकेले पाते है हम
आज भी याद आए जब
बस बहुत अकेले पाते हैं हम ।।
रजनीश राय
०१/०१/२०२२
२३:४५
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