खुली खिड़की की ओट से
आज अपने याद आए सहसा
जैसे सरकती रेत पल में हाथ से
बैचनी हर पल अनदेखे अंजाम से
साथ रहकर चला पल में हाथ छुड़ा के
याद आते वो बीते लम्हे
भोली हंसी संग प्यार दुलार के
आती हर ऋतु संग नए मौसम में
पर आंखे ढूंढती अपने से एक चेहरे को
आज न जाने क्यों वो बहुत याद आया
क्या कोई भुला रास्ता उसका में देख आया
लगे हवा भी उसकी महक को दोहराए
वृक्ष भी दे गवाही कुछ सूखे पत्ते को गिराए
हर मोड़ से कोई अपनी सी आहट आए
भय लगे अब रात के आगमन का
वह अनजानी रात के आगमन का
भय सा हर पल कुछ पाकर खोने का
सर्द है आज मौसम बड़ा
जैसे मिजाज़ कुछ बिगड़ा बिगड़ा
हवा भी लगे जिस्म को काटती
संग बूंदों की कुछ आहटें
बैठ किनारे अग्न के ताप को सेकते
क्यों कब और कैसे के
प्रश्नों में बस खुद को समेटते
उत्तर न मिला अब तक कोई
चल दिए तालाश में फिर
मन कुछ बुदबुदाते
रजनीश राय
१५/०६/२०२२
१७:०३
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