आए इस जीवन में, संग रख मां का मान
प्यार, दुलार, मार, सब संग रख विचार
हुए मां के कर्जदार
वो पल बालपन के न कभी भूल जाना
जुबान निकाल हँस कर भाग
थाली संग माँ को भगाना
माँ को देख जो कभी उदास
आकर अंग से लिपट जाना
बारिश में भीगना, रात वो सर्दी की ठंडक
फिर माँ के आँचल में छुप जाना
हुए आज बड़े तो क्या
है सिर्फ आज भी माँ संग जिद पे आना
कभी पढ़ाई तो कभी खेल
जैसे पहला अध्याय माँ संग
और खेल की हर वस्तु जिद पे पाना
बहुत प्यारा रिश्ता माँ और संतान का
आज चाहे कितने भी हो बड़े हम
रिश्ते चाहे लाख रखे हम
पर इस रिश्ते को न कभी भुलाना
सब रिश्तो को रख दर किनार
असीमित माँ का प्यार, अलौकिक रिश्ता
जिसका न कोई पार, वो सिर्फ माँ का प्यार
न कोई झूठी मुस्काराहट न कोई बहाना
मां सिर्फ सच्चाई, प्रेम, त्याग की मूर्त
हमको सिर्फ मस्तक नवाना
रजनीश राय
१९:२८
०७.०५.२०२२
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