राह हो हसीन
मेहनत करे यकीन
सपने हो अधीन
मन में हजार किरदार
राह आया जो एक मोड़
सपने टूटे कांच बन
हर किरदार हुए छीन भिन्न
जैसे सब चला समापन की और
आया सुखा पत्ता उड़ता हवा में
किया सपर्श चेहरे को
न जाने कौन दिशा वो आया
पर मस्तिष्क को झंकोर गया
मिला एक अद्भुत ज्ञान जैसे कोई
बन फरिश्ता कुछ कहता वो पत्ता
टूटा जो पेड़ से
फिर भी न हुआ बोझिल
संग हवा के उड़ चला मस्ती में झूम कर
न कोई अस्तित्व फिर भी आशा है
जाते जाते भी सर्द मौसम
अग्नि में समाकर
किसी गरीब का हाथ गरमा पाऊं
चिड़िया या गौरिया कोई संग ले चले
अपना घोंसला सजा पाएं
सपना नहीं है ये कोई
पर दुआएं तो संग पाऊंगा
अति सूक्ष्म रूप में आई
आज एक नई बात समझ
जीवन कभी जाता नहीं व्यर्थ
हमने लिया है जन्म शायद
किसी का सपना बनकर
रजनीश राय
१२/११/२०२२
२०:२१
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