एक किस्सा संग याद आया
आवाज कुछ खनखनाती सी
लिए रेत का वजन सिर पे
पसीने से तरबतर बूंदे माथे टपकती सी
काम निर्माणाधीन इमारत पे
न जाने कितने पग नापती धरती
न थकान न शिकन कोई चेहरे पे
हंसी पे हंसी करती एक दूसरे से
सुबह से न जानें कब हुई शाम
पर न आए चेहरे पे कोई थकान
देख वो संपूर्ण वाक्य नज़दीक से
जाना जैसे बहुत कुछ यूं सीख के
सिर्फ बेबाकी से यूं जी के
क्या दर्द क्या दुख या कोई टीस से
हंसी आई क्या हमे कभी दिल से
हम आज तलाशते जिस हंसी को
उस हंसी में पूर्णता कहां
न जाने देखा कितने चेहरों को
कभी उदासी तो कहीं झुर्रियों को
पर न तलाश पाए खनखनाती सी
वो बेझिझक एक हंसी को
देखा को बस यूं देखा
हर वक्त हर किसी को हंसी में
छिपाते हुए कुछ देखा
रजनीश राय
२१/१०/२०२२
१७:१७
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