कुछ पास रहकर भी दूर हो गए जैसे
आंखों में उम्मीद आस का दामन छोड़
रास्ता पहचाना सा भूल गया हो जैसे
इस भाग दौड़ भरे जीवन में
राह समीप पर गंतव्य दूर हो गए जैसे
सिर्फ अशांति है हर दिशा
मन को एकाग्र करें कैसे
अपने जहां अपनों को नहीं पहचानते
पराए बन कर जो आज हमको नहीं जानते
विश्वास का चोला ओढ़कर आए न जाने कहीं
फिर पहचान को पहचान से मिलाए कैसे
सिर्फ अशांति है हर दिशा
मन को एकाग्र करें कैसे
जलती हैं आंखे धूप के ताप से
कभी पक्की सड़क कभी किनारे से
वृक्ष की छाया भी लुप्त हो गईं जैसे
कटती है उम्र सिर्फ एक सोच पे कहीं
हंसते है सिर्फ कुछ हंसी यादों पे कहीं
कोई क़रीब या दूर सब बेमतलब लगे यूंही
अशांत है मन अशांत हर दिशा
इस मन को करे तो एकाग्र करें कैसे
रजनीश राय
२१/१०/२०२२
१७:३०
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