वो मुस्कराना बस एक आदत बन गई
अंदर है न जाने कितने बवंडर
हर एक आस बनी निराशा
शायद वो एहसास एक आदत बन गई
रो लेना अंदर ही अंदर सीमित हो गया
आहत सी होती है कभी वो जानी पहचानी
परछाई जैसे कोई पुरानी
आज फिर उदास मन दिन ढला हुईं शाम
लो रात का हुआ आगमन
वो मुस्कराना तो बस आदतन
गम न जाने विरासत में थे शायद पाए
जीवन गर्म रेत पर चलते हम सदैव
और आंसु बन भाप उड़ गए जैसे
न किसी से गीला न कोई शिकवा
शायद तकदीर में यही लिखा लाए
हर खुशी संग फिर क्यों आज हम
उन्हे कहीं न देख पाते है बस यूं प्रतीत
उस हंसी को कहीं दूर भूल आए है
वो मुस्कराना बस आदतन संग लाए है
आज नहीं सब में, सिर्फ यादों में
हर लम्हात मुस्करा, अनछुए दामन में छुपाए है
वो मुस्कराना बस आदतन
हंसी को कहीं दूर भूल आए है
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