Thursday, May 3, 2018

इंतज़ार इंतज़ार बस इंतज़ार। ........ Post-1





कभी न समाप्तः होने वाली। ... एक व्यथा माँ के इंतज़ार की   (ऋषब)
इंतज़ार इंतज़ार बस इंतज़ार। ........

मस्तमोला निर्भय दिलेर सा क्यों हो गया एक प्राण में। 
कभी शान्त कभी अशांत सा । 
कभी एक स्वामी सा ध्यान में,
दोस्तों में मतवाला यूँ आज क्यों नहीं उनकी परवाह में।
किसी परेशान में या प्यार में कुछ तो कहता हम तो थे बस इंतजार में।
यारों संग हर वादा निभाया हमको भी रख लेता कहीं यादों के किनारे में।
माँ के दुलार में पिता की फटकार में,
पहचान न पाए तुमको की हमको तुम या हम रह गया यह राज बस यादों में।
एक परिंदा बन कर जिया तू हमेशा रहा बस आज़ादी में गर कुछ बंदिशे थी राह में तेरी एक बार तो कहता सिर्फ मजाक में।
पिता की परछाईं सा आज क्यों हैं छुपा सा किसी अन्धकार में।
तेरा जाना आसान होगा  सिर्फ तूने सोचा अपने हाल में, गर माँ का एक आँसु रखता अपने याद तो पल ठहर जाता माँ के इंतज़ार में।
आज माँ कुछ बोलती नहीं क्योंकि अभी भी है वह तेरे  इंतज़ार में इंतज़ार में इंतज़ार में।।।।।।

 03.05.2018



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