Friday, May 11, 2018

यहीं एक अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान। ...... Post-7

ह्रदय वेदन देवो को समर्पित
यहीं एक अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान। ...... 

हर दिशा प्रकट प्रतीत रुदान।
कुछ भूतकाल कभी वर्तमान।
भविष्य का प्रति पृष्ट अनजान।
कुछ स्वपन लगे सत्य वर्तमान।
प्रति प्रयत्न ह्रदय चेतन फिर क्यों अशांत।

गीता सार सब एक है प्राण।
न पिता न माँ न भाई सब अनजान।
जीवन सार मनुष्य मन न सहमत।
मोह के दर्पण चले संग क्यों प्राण।
मुक्ति जीवन यूं  कमजोर डोर।
प्रत्येक कथन प्रतीत अनजान।
प्रति प्रयत्न ह्रदय चेतन फिर क्यों अशांत।

मूक दर्शक हम बैठे क्यों।
क्या अभिनय करना जीवन सार।
सार अभिनय तो फिर क्यों न आयु समान।
लम्बी आयु क्योंकर जीते होते परेशान।
नन्ही आयु प्रसन्न फिर क्यों लिए प्राण।
प्रत्येक प्रश्न एक प्रश्न बना।
हर क्षण प्रतीत चुभन मस्तिष्क अज्ञान।
प्रति प्रयत्न ह्रदय चेतन फिर क्यों अशांत।

कहे कृष्ण गीता सार दुःख मेरा या तेरा समान।
फिर क्यों मध्य न आये दुःख में भगवान्।
माँ को एक रूप में भगवन कहलाया।
न आता दिखा पुत्र दुःख न मन में परेशान।
कहते होता एक आभास दुःख में जब संतान।
हारे इन कथनो के हम बस रहे अनजान।  
विशाल तख्त न बिठायो बस रहने दो इंसान।
माँ जननी पुत्र दुःख असिमित, सिमित हर अल्पविराम।
यहीं एक अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान अंतिम ज्ञान। ......

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