Thursday, May 17, 2018

क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया.... Post-9

ह्रदय वेदन
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया.... 


मीठा सा बचपन यादों में।
न भूले सी मुस्कराहटों में।
एक सुंदरता की छवि में।
कोमल ह्रदय सा कवि में। 
शरारतों के भोलेपन में अव्वल।
कभी न हो दुखी एक ऐसा पागल।
न थकने वाला ज्यों एक सागर।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

आंख बंद तो आये चेहरा सामने।
खुली आंख सोचे पुत्र को आप में।
ह्रदय समझाना प्रति पल बना जटिल।
क्या कहें किससे कहे अति मुश्किल।
चुन चुन खुशियां ले गया।
ग़मो की कड़ियाँ सौंप गया।
आंसुओं से दामन प्रतिपल जोड़ गया।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेेेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

खुशियों से दामन भरना था हमें।
मिला प्यार तोहफा अटूट।  
हर खुशी जी रहे न था कोई दुःख रूप।
स्वपन न सोचा कभी हारे यूं खुद से।
मिला आँसू जीवन तोहफा स्वरूप।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।

टुटा सब कुछ पल में हुई खुशियां यो तार तार।
लगती नज़र क्या दामन में सोचे हम बार बार।
माँ से बढ़कर कोनसी नज़र रोये माँ ज़ार ज़ार।
इतनी खुशियां क्यों पल में समेट गया।
क्या दिन क्या रात बस छोड़ गया।



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