कभी न समाप्तः होने वाली। ......... एक व्यथा पिता की (ऋषब)
आस्था के विश्वास को मिटा आया मिटा आया। .......
विचित्र संजोग, सोया वह बेखबर हैं।
न बेखबर रहने वाला आज बेखबर है।
आस्था के विश्वास को मिटा आया मिटा आया। .......
विचित्र संजोग, सोया वह बेखबर हैं।
न बेखबर रहने वाला आज बेखबर है।
दोस्तों की भी फ़िक्र नहीं जो आते हैं ।
कल तक जो नाम जुबान पर आते कतराते।
कल तक जो नाम जुबान पर आते कतराते।
एक प्रश्न चिंह सब की माथे की रेखाओ में।
क्या ऐसी मुश्किल जो चल दिया न आने वालों में।
क्यों किसलिए लोगो की जुबान बन गया।
और उत्तर सिर्फ उसकी जुबान बन गया।
खामोश है उसका चेहरा यूं की चिंता बस और नहीं।
शांत सी मुद्रा चेहरे पर की अब कुछ और नहीं और नहीं।
शांत सी मुद्रा चेहरे पर की अब कुछ और नहीं और नहीं।
अग्नि हाथ में रख स्वेत वस्त्र पहन चला पिता पुत्र की विदाई पर।
दुःख तो शायद कहीं होगा उसे अम्बर की गहराही पर।
अपना कार्य पिता को दिया दुःख होगा देख कर।
पिता का विलाप ह्रदय में बसा दर्द की तन्हाई में।
शांत समय जब वक़्त आया पंचधातु का।
वह जिद करता न दूधको बचपन चेहरा याद आया।
फिर कर कठोर मन अग्नि को समर्पित कर आया।
स्वेत से कोमल अंग को तप कर आया।
कुछ खोया या न पाया यह पिता न समझ पाया।
बस परछाई क्या। ..
हर आस्था के विश्वास को मिटा आया मिटा आया। .......
रजनीश राय
३ मई २०१८

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