यादो के शब्कोष से। ......... कुछ पंक्तियाँ (ऋषब )
तिलक को मस्तक की शोभा पाया। .......
एक दिन था वह शुभ मंगल आया।
किलकारी की गूँज में हर शख्श मुस्कराया।
बचपन की अटकेलियों में वक्त गया यूं आया।
बस कुछ यूं शुरू हुआ जीवन का प्रथम अध्याय।
तिलक को मस्तक की शोभा पाया। .......
एक दिन था वह शुभ मंगल आया।
किलकारी की गूँज में हर शख्श मुस्कराया।
बचपन की अटकेलियों में वक्त गया यूं आया।
बस कुछ यूं शुरू हुआ जीवन का प्रथम अध्याय।
स्वेत मस्तक पे लाल तिलक लगा यूं इतराया।
ऐसी आदत की न लगा तिलक तो कदम बढ़ाया।
यूं लगा एक पिता सी परछाई को पाया।
हर एक खुशी में बस वह था समाया।
लगा समय बीतने शिक्षा में मित्रता को पाया।
मित्र हुए विशेष हर एक को अपनाया।
बुरा क्या भला क्या भेद न पाया
न नाम मित्रो का कभी जुबान पे लाया।
लगा समय बीतने शिक्षा में मित्रता को पाया।
मित्र हुए विशेष हर एक को अपनाया।
बुरा क्या भला क्या भेद न पाया
न नाम मित्रो का कभी जुबान पे लाया।
उम्र हुई जवान पर तिलक को मस्तक से न हटाया।
वक़्त से ज्यादा परिवार से श्रेष्ठ मित्रो को पाया।
दोस्ती हो जीवन समप्रित ऐसा रास्ता अपनाया।
दोस्ती हो जीवन समप्रित ऐसा रास्ता अपनाया।
परन्तु प्यार की नाव में डगमगाया।
दोस्ती या प्यार में कुछ समन्वय न बिठा पाया।
होने लगा परेशान जब खुद को भवर में कसता पाया।
पर मन का पक्का ऐसा मित्र,प्यार सब को छुपाया ।
यूं मस्तमौला सा मित्रो में क्या दिल पे आया।
यूं चलो छोड़ दुनिया को एक निश्चय बनाया।
अधूरे ख्वाब अधूरी जिंदगी को श्रेष्ठ पाया।
यूं चलो छोड़ दुनिया को एक निश्चय बनाया।
अधूरे ख्वाब अधूरी जिंदगी को श्रेष्ठ पाया।
कुछ न सोचा उस माँ को जिस से जनम पाया।
अंत समय जब पुत्र मस्तक को माँ ने सूना पाया।
पिता से तिलक को मस्तक की शोभा फिर भी बनाया।
अंत समय जब पुत्र मस्तक को माँ ने सूना पाया।
पिता से तिलक को मस्तक की शोभा फिर भी बनाया।
शायद यही एक आदत
मात-पिता की निभा पाया निभा पाया। ..
रजनीश राय
४ मई २०१८

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