आज कलम कहे
चलें शब्दकोष से बाहर
मित्रत्रा को रख आधार
एक ऐसा घनिष्ठ रिश्ता
ज्ञानी विद्वान् न पा सके पार
आज के उलझते रिश्तों मे
सच का एक प्रतिरूप
प्रतीत एक सच्ची सुलझन
एक ऐसी मजबूत डोर
समहित हो जैसे अपनी धड़कन
जख्म हो चाहे कितना भी गहरा
हर दर्द मिटाते बन कर दवा
दौरे ए मुसीबत संग ठहरते
जैसे बिन इब्बादत मिले दुआ
क्या नगद तो क्या उधार
हुए न कभी बंद द्वार
हर किस्से जीवन संवारते आये
हर मुसबित में सिर्फ दोस्त याद आये
अनजाने हो कर भी
जीवन का हिस्सा बन जाएँ
आज भी याद है वो एक एक लम्हा
बीते न जाने कितने वर्ष
प्रत्येक वर्षों के अनगिनित दिन
दिनों के यूं पल हजार
न थी कभी इच्छा
क्या जीत और क्या हार
भावनात्मक रिश्ता जैसे एक प्यार
रजनीश राय
२८/०७/२०२२
१७:३६
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