Friday, October 21, 2022

क़िरदार ढूंढता हूँ - The Resplendence of Friendship

आज भी याद है 
सफ़र एक दिन कुछ ख़ास  था 
संग एक ऐसा दोस्ताना 
जो न भूले बस बहुत ख़ास था  
 
मध्यवर्ती शिक्षा में हुए उत्तीर्ण
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की प्रवेश परीक्षा 
आयी चिट्टी सरकारी 
परीक्षा केंद्र गुवाहाटी लिखित देख  
झटपट तमाम कार्य की सम्पूर्ण तैयारी 

आया दिन सफ़र का 
बैठे ट्रैन मैं संग परीक्षा हेतु 
छात्र तमाम न कोई मित्र उनमे 
करते सफर सब अकेले संग तैयारी 

पहुंचे परीक्षा केंद्र 
न जाने कितने छात्रों के संग 
हम भी लगे सोचने अपना भविष्य 
बनते एक सैन्य अधिकारी    

चलते चलते परीक्षा केंद्र को 
कुछ ही दुरी पर 
पाँव जा अटका घाँस में छुपी 
एक पक्की पानी की नाली पर 
दर्द का वह रूप 
आज भी नहीं भूलता 
कौन था संग किसने थामा जब 
कुछ होश न था 

संध्या को जब मूर्छा आयी वापिस 
खुद को पाया ट्रैन में वापिस 
संग एक दोस्त या रूप सुदामा 
न पहचाना न जाना  
सफर तमाम सहलाता रहा पैर को मलहम  
पानी की प्यास या कोई दवा 
खाना या पेय दिया बिना कोई ध्येय 
बिना कोई परिचय देता रहा सिर्फ सेवा

आया गंतव्य दे विदा चला वह गया किधर 
आज भी वह अनसुलझा 
सा क़िरदार ढूंढता हूँ 
न पूछा नाम न  शहर न पता 
कोसता हूँ बस खुद को क्यों न सब जान सका 
जब भी ये दिन याद करता हूँ 
काश वह पढ़ ले और एक बार तो सिर्फ मिल ले 
उस दोस्ताने तो सिर्फ सलाम करना चाहता हूँ 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१९:३४ 
 
 


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