Friday, October 21, 2022

प्रेम और अपनापन - The Resplendence of Friendship

आज न जाने क्यों मन उदास 
सोच क्यों करते है दोस्त ऐसे 
हम जिन्हे हमेशा सोचते साथ 
फिर न जाने क्या सोच 
क़दमों को कर साथ 
चले पार्क में अकेले 
बैठे वह पुराने बेंच के साथ 

देख तभी एक बुजुर्ग को 
लगा जैसे सुबह की सैर को 
कुछ वक़्त समय पारित को 
बैठ कुछ सुस्ताते 
उस पुराने बेंच के साथ 

तभी देख आये कुछ पक्षी 
यूं जोर जोर चहचहाना 
आये कुछ बंदर 
वृक्षों को हिलाते  
न जाने कुछ कुत्तों भी संग 
आये दुम हिलाते 

दाना डाला पक्षियों को 
कुछ चने बंदर खाते 
कुत्तों को रोटी के टुकड़े खिलाते 
हँसते रहे फिर एक टक निहारते  

मन की उदासी हुई काफ़ूर 
नए रंग दोस्ती के देख कर 
न उदासी इसमें 
न कोई गिला शिकवा 
न कोई कस्मे वादे 
न झूट का कोई आडंबर 
न रईसी की महानता 
है तो सिर्फ एक भोलापन 
और संग पवित्रता 
स्तब्ध दोस्ती के इस 
मेल को जान कर 

परिभाषा प्रेम की समझे 
या समझे एक दूसरे के विचार को 
न रखो कोई मतलब
रखो मघ्य सिर्फ मेल मिलाप को 

पक्षी या जानवर क्या इंसान संग 
क़िस्सा ये भूख का न समझो 
लाख कोशिश की हमने भी 
पक्षियों को खिलाने की 
न हुए क़ामयाब  
वह प्रेम और अपनापन 
की अनुभूति 
उन्हें न मिली हो शायद। .. 

रजनीश राय 
०९/०८/२०२२ 
१५:४७ 





No comments:

Post a Comment