Friday, October 21, 2022

क्या शिक़ायत क्या गिला - The Resplendence of Friendship

दुनिया के मोह में कुछ इस क़दर खोये 
इतराते थे जिस दोस्ती पर वक्त बेवक़्त 
कल की ही बात है शायद 
आज क्यों सिर्फ याद बन रह गए 

वक्त का पहिया चलता रफ़्तार 
हम सोच रह गए इस न जाने किस पार 
कल तक थी हजारों कस्मे 
आज कौनसे पल में हुए गिरफ्तार

वो हंसी वह ठहाकों की भरमार 
हर सुख दुःख में बेधड़क 
संग जीने मरने की ललक 
किधर हुई वह खुद से ज्यादा हमारी फ़िक्र 

यक़ीन नहीं क्या हालात यूं बदल जाते है  
दोस्त क्या सिर्फ याद बन रह जाते है 
क्या शिक़ायत क्या गिला ज़िंदगी से
भूले ही सही किंतु ये भर्म पाले बैठे है
याद आये गर कभी यारों की
मिल बैठ वही पुरानी यादें संग दोहराना 
कभी खुद को तो कभी दोस्तों को संग पाते है

रजनीश राय
३०/०७/२०२२
२०:०८

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