दुनिया के मोह में कुछ इस क़दर खोये
इतराते थे जिस दोस्ती पर वक्त बेवक़्त
कल की ही बात है शायद
आज क्यों सिर्फ याद बन रह गए
वक्त का पहिया चलता रफ़्तार
हम सोच रह गए इस न जाने किस पार
कल तक थी हजारों कस्मे
आज कौनसे पल में हुए गिरफ्तार
वो हंसी वह ठहाकों की भरमार
हर सुख दुःख में बेधड़क
संग जीने मरने की ललक
किधर हुई वह खुद से ज्यादा हमारी फ़िक्र
यक़ीन नहीं क्या हालात यूं बदल जाते है
दोस्त क्या सिर्फ याद बन रह जाते है
क्या शिक़ायत क्या गिला ज़िंदगी से
भूले ही सही किंतु ये भर्म पाले बैठे है
याद आये गर कभी यारों की
मिल बैठ वही पुरानी यादें संग दोहराना
कभी खुद को तो कभी दोस्तों को संग पाते है
रजनीश राय
३०/०७/२०२२
२०:०८
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