Friday, October 21, 2022

बचपन के पल - The Resplendence of Friendship

बचपन के पल संग वो दोस्ताना 
खुशियों का संसार जैसे ग़म से कोसों दूर 
हर खुशी लगे अपने लिए आयी हो 
चाँद दूर रह के भी पास लगे 
जैसे चाँदनी सिर्फ मेरे लिए आयी हो 

वो संग जुगनू को रात में 
पकड़ने की होड़ यूं हाथ में 
रखना संग काँच में 
रौशनी झिलमिल सी 
देखते रात भर एकटक 
नींद सपनो में भी न आयी हो 

काँच की बोतल यूं झिलमिलाते जुगनूँ  
दोस्ती निभाती एक रात संग मेरे 
तो दूसरी रात संग मित्र को 
जुगनुओं के रूप में भी 
जैसे खुशियाँ समायी हो 

वह डब्बा और लंच का समय 
तकते यूं बेताब से एक दूसरे के डब्बे 
यूं बाँट लेना झटपट  
गर कुछ स्वादिष्ठ या 
माँ ने सहज रख दिया संग कोई मिठाई को 
सिर्फ तुम ही खाना यह कह कर 

अध्यपिका क्रोध में 
किया कोई गृहकार्य दोष में 
संग मित्र का भी छुपाना अपनी पुस्तक को 
कक्षा बाहर होते संग
फिर वो मुँह छुपा हँसना साथ में 

त्योहारों के दिन 
हँसती यादों के दिन 
पतंग कटने 
और पतंग पकड़ने के दिन 
पटाखों के संग 
चिल्लाने के दिन 
छुप छुपा कर संग 
मिठाई चुराने 
और फिर संग खाने के दिन 

चोरी से तोड़ना 
कच्चे आम या अमरूद का पेड़ों से 
वह सीटी की सूचना 
माली को देख कर 
एक दोस्ती ऐसी 
निभाते हर शरारत पर 

बारिश में भीगना संग 
कपड़े को कर गन्दा 
बहाने वह अनसुने से 
झूठ की पैरवी 
करते बेख़ौफ़ से 

तालाब के निकट 
प्रतिस्पर्धा न भूलने वाली 
कंकर को फेक 
टकराना पानी की सतह पर 
कूदना हर्ष से उस जीत पर 
ऐसी खुशी की न बयाँ करने वाली 

रूट जाना किसी बात पर 
कोई पुरानी बात कह कान में 
फिर हॅसना खिलखिला कर 
मासूमियत भरे वह पल 
ना आते क्यों लौट कर 

आज न जाने क्यों 
वह दिन आये याद 
बस बैठे बैठे सोच बहुत हुए उदास 
यो याराना बचपन का 
बहुत कुछ दे गया 
समय था सिमित 
असीमित खुशियाँ दे गया। .. 

रजनीश राय 
२८/०७/२०२२ 
१९:३९ 






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