बचपन के पल संग वो दोस्ताना
खुशियों का संसार जैसे ग़म से कोसों दूर
हर खुशी लगे अपने लिए आयी हो
चाँद दूर रह के भी पास लगे
जैसे चाँदनी सिर्फ मेरे लिए आयी हो
वो संग जुगनू को रात में
पकड़ने की होड़ यूं हाथ में
रखना संग काँच में
रौशनी झिलमिल सी
देखते रात भर एकटक
नींद सपनो में भी न आयी हो
काँच की बोतल यूं झिलमिलाते जुगनूँ
दोस्ती निभाती एक रात संग मेरे
तो दूसरी रात संग मित्र को
जुगनुओं के रूप में भी
जैसे खुशियाँ समायी हो
वह डब्बा और लंच का समय
तकते यूं बेताब से एक दूसरे के डब्बे
यूं बाँट लेना झटपट
गर कुछ स्वादिष्ठ या
माँ ने सहज रख दिया संग कोई मिठाई को
सिर्फ तुम ही खाना यह कह कर
अध्यपिका क्रोध में
किया कोई गृहकार्य दोष में
संग मित्र का भी छुपाना अपनी पुस्तक को
कक्षा बाहर होते संग
फिर वो मुँह छुपा हँसना साथ में
त्योहारों के दिन
हँसती यादों के दिन
पतंग कटने
और पतंग पकड़ने के दिन
पटाखों के संग
चिल्लाने के दिन
छुप छुपा कर संग
मिठाई चुराने
और फिर संग खाने के दिन
चोरी से तोड़ना
कच्चे आम या अमरूद का पेड़ों से
वह सीटी की सूचना
माली को देख कर
एक दोस्ती ऐसी
निभाते हर शरारत पर
बारिश में भीगना संग
कपड़े को कर गन्दा
बहाने वह अनसुने से
झूठ की पैरवी
करते बेख़ौफ़ से
तालाब के निकट
प्रतिस्पर्धा न भूलने वाली
कंकर को फेक
टकराना पानी की सतह पर
कूदना हर्ष से उस जीत पर
ऐसी खुशी की न बयाँ करने वाली
रूट जाना किसी बात पर
कोई पुरानी बात कह कान में
फिर हॅसना खिलखिला कर
मासूमियत भरे वह पल
ना आते क्यों लौट कर
आज न जाने क्यों
वह दिन आये याद
बस बैठे बैठे सोच बहुत हुए उदास
यो याराना बचपन का
बहुत कुछ दे गया
समय था सिमित
असीमित खुशियाँ दे गया। ..
रजनीश राय
२८/०७/२०२२
१९:३९
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