खूबियों से न की रखी नींव दोस्ती की
अनजान से मिले बस ख़ास हो गए
हो चाहे अपूर्णता का भंडार
बस जिगरी यार हो गए
आज याद की सीमा बेइंतहा हो गयी
कुछ उदासी भी संग हो गयी
याद आयी वह टोली हॉस्टल की
कुछ नोट्स वालों की
संग चाय की चुस्की
कुछ कश धुंए के
संग बनाते वह छल्ले
वह बन लीडर
अपने मुहल्ले के
कहीं लड़कियों की सुरक्षा
कहीं छोटो के बनते भाई
कहीं देते गालियाँ
कहीं बेशर्मी से खाये
कहीं वह जोश भरी लड़ाई
कहीं मिले दिल भी
कहीं मिली तन्हाई
कहीं माँ बाप संग शिकायतों के दौर
कहीं टांग खिचाई
कहीं रंग होली के
कहीं कृष्णा की मटकी
कहीं शादी में बिन न्यौता बाराती
वह हंसी, मज़ाक,
संग दोस्ती की गहराई
कभी ग़लतफ़हमी का दौर
वह रूठना मनाना पुरजोर
आज यादें के संग आँखे हुई नम
जो आये याद वादे फिर मिलने के
पर कोई न निभा पाए
अपनी राह सब गए आगे
संग न कोई आज
फ़िर भी लगे सब साथ आये हैं
पास रह कर हुए दूर
दूर हुए पर न भूला जाये
लिखी है न जाने कितनी कवितायेँ
चाह कर यारों तुम्हे न सुना पाए ...
रजनीश राय
१२/०८/२०२२
१५:५८
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