Saturday, July 30, 2022

सँकरी गली - Mere Humrahi

समय की करवट 
रिश्ता लगा और गहराने 
बन ख़ुशी हम साथ चले 
हर कर्तव्य को संग निभाते चले 
प्यार और फर्ज को संग मिलाते चले 

वक्त की सौगात 
चमन में एक और गुल खिला 
प्रतीत ईश्वरीय असीमित कृपा 
प्यार के जैसे पंख असीम 
पागल पवन सा उड़ चला 

कभी हुए उदास या 
कुछ काम का भारी एहसास 
प्यार भरी बात और बैठ कर पास 
किया हर लम्हे को खास 

देखते कनखियों से वो कभी हमें 
और हम देखते बस उन्हें 
मुस्कुराते अन्दर से 
न हो कभी ये प्यार कभी कम उनसे 

सुबह की धुप हो चाहे 
या घनघोर रात 
बारिश के दिन 
या वह सर्द जाड़ों की रात 
हुई जब रिश्तो की गहरायी की बात  
हर मौसम सुनाते बस हमारे दिल की बात 

वक्त न रहे कभी सामान 
हुआ हादसा कुछ दर्द भरा 
जैसे सँकरी गली आये सामने
उलझा जैसे रास्ता न कोई पाए
इस उलझन को हमराही ने सरल बनाया 
कुछ भी हो हालात न हटें पीछे 
मुश्किल राह को सरल पाया

काल की गर्त में क्या 
कभी जो हुए हम गुम 
उस सोच की भवर से हम बाहर आये 
लगता हम सिर्फ ठोस शरीर से 
पर ह्रदय से स्थिर हमराह
कांधे पर रख हाथ 
प्यार का वचन कहते 
थोड़ा संभले हम 
थोड़ा संभाले आप 

हुआ प्रतीत या आज जाना 
साथ है गर कोई प्यार अपना 
रास्ता चाहे हो लाख कठिन
मूंद आँख कट जाना 

रजनीश राय
१८ /०५ /२०२२
१८:१६ 

लगा समय बीतने अपनी दशा 
प्रारम्भिक से शिक्षा माध्यमिक 
फुर्सत हुई सिमित 
पुत्र कद मात पिता का 
क़दम युवा युग में 
हँसते हँसते न जाने 
थामा कौन रास्ता
सब तरफ रोष 
माँ,भाई सब बदहवास 
न कोई मशवरा न सोच    
लगे आज कौन परीक्षा 
हुए हम असफल 
सोच सोच हुए हम विफल 
अश्रुयों को नेत्रो संग दबा

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