समय की करवट
रिश्ता लगा और गहराने
बन ख़ुशी हम साथ चले
हर कर्तव्य को संग निभाते चले
प्यार और फर्ज को संग मिलाते चले
वक्त की सौगात
चमन में एक और गुल खिला
प्रतीत ईश्वरीय असीमित कृपा
प्यार के जैसे पंख असीम
पागल पवन सा उड़ चला
कभी हुए उदास या
कुछ काम का भारी एहसास
प्यार भरी बात और बैठ कर पास
किया हर लम्हे को खास
देखते कनखियों से वो कभी हमें
और हम देखते बस उन्हें
मुस्कुराते अन्दर से
न हो कभी ये प्यार कभी कम उनसे
सुबह की धुप हो चाहे
या घनघोर रात
बारिश के दिन
या वह सर्द जाड़ों की रात
हुई जब रिश्तो की गहरायी की बात
हर मौसम सुनाते बस हमारे दिल की बात
वक्त न रहे कभी सामान
हुआ हादसा कुछ दर्द भरा
जैसे सँकरी गली आये सामने
उलझा जैसे रास्ता न कोई पाए
इस उलझन को हमराही ने सरल बनाया
कुछ भी हो हालात न हटें पीछे
मुश्किल राह को सरल पाया
काल की गर्त में क्या
कभी जो हुए हम गुम
उस सोच की भवर से हम बाहर आये
लगता हम सिर्फ ठोस शरीर से
पर ह्रदय से स्थिर हमराह
कांधे पर रख हाथ
प्यार का वचन कहते
थोड़ा संभले हम
थोड़ा संभाले आप
हुआ प्रतीत या आज जाना
साथ है गर कोई प्यार अपना
रास्ता चाहे हो लाख कठिन
मूंद आँख कट जाना
रजनीश राय
१८ /०५ /२०२२
१८:१६
लगा समय बीतने अपनी दशा
प्रारम्भिक से शिक्षा माध्यमिक
फुर्सत हुई सिमित
पुत्र कद मात पिता का
क़दम युवा युग में
हँसते हँसते न जाने
थामा कौन रास्ता
सब तरफ रोष
माँ,भाई सब बदहवास
न कोई मशवरा न सोच
लगे आज कौन परीक्षा
हुए हम असफल
सोच सोच हुए हम विफल
अश्रुयों को नेत्रो संग दबा
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