सहम गई हुई वो बदहवास
रात आज सुहाग की
वर्तमान और भविष्य क्या
सब समक्ष आंखो के पास
सपने थे जो संग क्या हुए चकनाचूर
अब रात दिन क्या बस रहेगा संग
शायद वो सुना सुना सा अत्याचार
पल में लगे किस मोड़ पे आ खड़े
संग चलना हो जाये मुश्किल
तो छोड़ना भी होगा नामुमकिन
कुछ सोच मन में जागा एक विश्वास
पिता के कहे शब्द
उस मासूम मस्तिष्क में गूजँते बार बार
"साहसी को ही मिले सिर्फ कठिन राह"
कर के प्रण लिया संग पति का विश्वास
मात पिता की दे दुहाई
प्रेम की भाषा को शूल बनाए
क्या कमजोर आप
या मजबूर ये मद्य मोह सताए
ऐसी कुछ प्रेरणा कुछ संगत देती
संग संग गुजारे हर क्षण
प्यार से कुछ वचन कहलाती
कभी ईश को रख संग भक्तिमय कहलाए
जरूरत पर पुनर्वास केंद्र भी आए
हो कुछ भी अंजाम
पर मन में ये ठान
सब को दिया चौका
मद्यपान की आदत को भुला
दुर्बलता से दृढ़ता का रिश्ता बना
वह इंसान एक प्रगति की राह चला
चाहे कहो स्वार्थ इसे
चाहे कहो आत्मविश्वास
चाहे कहो प्यार
चाहे हो संगिनी का साथ
हुए सब मुश्किलों से पार
अंतत एक सुखमय परिवार
रजनीश राय
३१/०५/२०२२
१४:१७
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