Saturday, July 30, 2022

बस सकून आया - mere humrahi

कैद वक्त की रफ्तार   
सेवा निवृत्त हुए हम भी
दिन बदले महीनों में
बदले साल पे साल
देख जी रहे आज हम ज्यादा 
था जैसे पहले वक्त के आभाव का तकाज़ा 

हुए कुछ स्वास्थ्य से हताश 
प्यार में न हुए कभी निराश 
आज हम साथ लगे हर खुशी साथ 
जैसे मिट्टी के संग बरसात 

उम्र के इस पड़ाव पर हम 
खुशकिस्मत है आज 
प्यार की जैसे उम्र नहीं होती 
जब भी हो संग  
सिर्फ अपनों सी प्रतीत होती 

माँ का क़िरदार 
करते करते न भूले हमें 
आदत को हमारी 
न किया नज़रअंदाज उन्होंने  

वक्त बिता कुछ करें इस उम्र में 
संग किया विचार
एक वृद आश्रम जेहन में आया 
लगे बस मोहब्बत बाटने 
जो हम ने संग कमाई थी 
आज जैसे परीक्षा की घड़ी आयी थी 
घड़ी के कांटे या पंचांग के पन्ने
लगे दौड़ने संग साथ हो अपने
हम हुए गुम खुशी के इस दौर में


आज सोचते होते ह्रदय हर्षित 
की हम ने ऐसा जीवन साथी पाया
जीवन के इस दौर में हमने
न खुद को किसी पे निर्भर पाया
रास्ता था चाहे कितना भी कंटीला
हमे तो बस सकून आया सकून आया

आज भी सुबह की चाय 
संग पीते है 
शेष कितने दिन उम्र के 
बस संग जीते है 

रजनीश राय
१८/०५/२०२२
१९:३५ 

समय संग हर सुख दुख के
समुंद्र को करते पार
खुशियां आई संग द्वार
पुत्र की नौकरी विदेश में
हुआ हर्षित मन सोच बार बार
चला विदेश आशिषो का ले भंडार 
मां हृदय तकता राह
कब हो पुत्र दीदार
जब साथ हो 

लगता गए सब कुछ गए हार
जमा पूंजी हुई तमाम
आज घर भी था खड़ा नीलाम

मन में आशा की ज्योत जला 
हर मोह को दिया मिटा
दोनो की नई सोच

No comments:

Post a Comment